श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रगीत **‘वंदे मातरम्’** को लेकर सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस और उसकी सहयोगी कांग्रेस के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। श्रीनगर में जम्मू-कश्मीर के पहले अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के उद्घाटन समारोह में ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह छंद गाए जाने के बाद शुरू हुआ विवाद अब दोनों दलों के बीच राजनीतिक टकराव में बदल गया है। कांग्रेस ने पूरे गीत के गायन पर आपत्ति जताते हुए केवल पहले दो छंदों वाली ऐतिहासिक व्यवस्था का पालन करने की सलाह दी, जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने साफ कहा है कि सरकार और पार्टी की भूमिका अलग-अलग है तथा किसी व्यक्ति को गीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा।
इस पूरे विवाद में मुख्यमंत्री **उमर अब्दुल्ला** ने अपनी पार्टी के रुख का समर्थन किया है। हालांकि आपके शीर्षक में दिया गया वाक्य—**“कांग्रेस क्या चाहती है, कश्मीरी जेल जाएं?”**—ताजा उपलब्ध प्रमुख रिपोर्टों में उमर अब्दुल्ला के सीधे उद्धरण के रूप में स्पष्ट रूप से नहीं मिलता। इसलिए इसे शब्दशः उनका बयान मानने के बजाय कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच चल रही बहस की राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में देखना अधिक सटीक होगा। विवाद का पुष्ट केंद्र यह है कि कांग्रेस पूरे छह छंदों के बजाय पहले दो छंद गाने के पक्ष में है, जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकारी कार्यक्रमों में पूरे संस्करण के गायन का बचाव कर रही है।
फिल्म फेस्टिवल से शुरू हुआ विवाद
विवाद की शुरुआत 7 सितंबर को श्रीनगर में आयोजित **इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ जम्मू एंड कश्मीर** के उद्घाटन समारोह से हुई।
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला भी मौजूद थे। समारोह के दौरान ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह छंदों का गायन हुआ और दोनों अब्दुल्ला नेता पूरे गायन के दौरान सम्मान में खड़े रहे।
यही घटना बाद में राजनीतिक विवाद की वजह बन गई।
कांग्रेस ने इस पर सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई और कहा कि उसके सहयोगी दलों को उस ऐतिहासिक फैसले का सम्मान करना चाहिए जिसके तहत ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो छंदों को स्वीकार किया गया था।
केसी वेणुगोपाल ने उठाया सवाल
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने फिल्म फेस्टिवल का वीडियो साझा करते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस को सलाह दी।
उनका तर्क था कि ‘वंदे मातरम्’ के पूरे संस्करण के बजाय पहले दो छंदों को अपनाने के पीछे देश के स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं का सोच-समझकर लिया गया फैसला था।
वेणुगोपाल ने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद और दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख करते हुए कहा कि कांग्रेस उनके निर्णय को महत्वपूर्ण मानती है। उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर के परामर्श का भी जिक्र किया।
कांग्रेस का कहना है कि पहले दो छंदों को अपनाने का फैसला भारत के बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को ध्यान में रखकर किया गया था।
जम्मू-कश्मीर कांग्रेस भी नाराज
केवल राष्ट्रीय नेतृत्व ही नहीं, जम्मू-कश्मीर कांग्रेस के अध्यक्ष तारिक हमीद कर्रा ने भी पूरे छह छंदों के गायन पर चिंता जताई।
कर्रा ने कहा कि राष्ट्रीय प्रतीकों और गीतों का प्रत्येक भारतीय के दिल में विशेष स्थान है, लेकिन उनकी ताकत देश की विविधता को जोड़ने में होनी चाहिए।
उनका कहना था कि देश के स्वतंत्रता आंदोलन और बाद के संवैधानिक सफर में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जो संतुलन बनाया गया था, उसका सम्मान किया जाना चाहिए।
यहीं से मामला केवल गीत के गायन का नहीं रहा बल्कि कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के गठबंधन संबंधों का भी सवाल बन गया।
नेशनल कॉन्फ्रेंस ने दिया करारा जवाब
कांग्रेस की सलाह नेशनल कॉन्फ्रेंस को पसंद नहीं आई।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के करीबी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुख्य प्रवक्ता तनवीर सादिक ने पार्टी का पक्ष रखते हुए कहा कि **सरकार और राजनीतिक पार्टी दो अलग चीजें हैं।**
सादिक के मुताबिक पार्टी का रुख यह है कि जो व्यक्ति ‘वंदे मातरम्’ गाना चाहता है, वह गा सकता है और जो नहीं गाना चाहता, उसे मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। वहीं सरकारी कार्यक्रमों में सरकार को लागू नियमों और संवैधानिक व्यवस्था का पालन करना होता है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी सोशल मीडिया पर सादिक के इस पक्ष को साझा किया, जिससे साफ हुआ कि वह अपनी पार्टी के जवाब के साथ खड़े हैं।
कांग्रेस के अपने मुख्यमंत्रियों का वीडियो दिखाया
नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कांग्रेस पर पलटवार करने के लिए उसके अपने नेताओं के उदाहरण सामने रखे।
तनवीर सादिक ने तेलंगाना और कर्नाटक में कांग्रेस नेताओं से जुड़े ऐसे वीडियो साझा किए, जिनमें पूरे ‘वंदे मातरम्’ के दौरान नेता खड़े दिखाई दिए।
सादिक का सवाल था कि अगर कांग्रेस के अपने नेताओं के कार्यक्रमों में ऐसा हो सकता है तो जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस को इस मुद्दे पर क्यों निशाना बनाया जा रहा है।
हालांकि कांग्रेस ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
तारिक हमीद कर्रा ने जवाब दिया कि जिन पुराने वीडियो का उदाहरण दिया जा रहा है, वे कांग्रेस कार्यसमिति की हालिया चर्चा और पार्टी द्वारा अपना रुख दोहराए जाने से पहले के हैं।
कांग्रेस ने अगस्त में दोहराया था पुराना रुख
यह विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ है।
अगस्त 2026 में कांग्रेस कार्यसमिति में भी ‘वंदे मातरम्’ के मुद्दे पर चर्चा हुई थी और पार्टी ने पहले दो छंदों से जुड़ी अपनी ऐतिहासिक स्थिति को दोहराया था।
कांग्रेस इस मुद्दे को धार्मिक विरोध के बजाय ऐतिहासिक और संवैधानिक परंपरा के रूप में पेश कर रही है।
पार्टी का तर्क है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही गीत के शुरुआती हिस्से और बाद के छंदों को लेकर विवाद सामने आया था और 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने सामान्य सार्वजनिक गायन के लिए शुरुआती हिस्से को प्राथमिकता देने की व्यवस्था बनाई थी।
जवाहरलाल नेहरू के फरवरी 1938 के एक भाषण में भी इस ऐतिहासिक विवाद और कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले का उल्लेख मिलता है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस बोली कांग्रेस हमें निर्देश नहीं दे सकती
नेशनल कॉन्फ्रेंस की नाराजगी का एक बड़ा कारण कांग्रेस की तरफ से सहयोगी दलों को दी गई सार्वजनिक सलाह भी है।
एनसी का कहना है कि गठबंधन में शामिल होने का अर्थ यह नहीं है कि कांग्रेस दूसरे राजनीतिक दलों की हर नीति निर्धारित करेगी।
पार्टी ने संकेत दिया कि राष्ट्रीय और सरकारी कार्यक्रमों को लेकर उसकी अपनी राजनीतिक तथा प्रशासनिक समझ है।
यही वजह है कि कांग्रेस की आपत्ति के बावजूद नेशनल कॉन्फ्रेंस अपने रुख से पीछे नहीं हटी।
फिर पूरे वंदे मातरम् के दौरान खड़े रहे उमर
दिलचस्प बात यह है कि फिल्म फेस्टिवल के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ।
बुधवार को जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के शपथ ग्रहण समारोह में भी मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की मौजूदगी में ‘वंदे मातरम्’ का पूरा संस्करण बजाया गया।
इससे यह संकेत मिला कि कांग्रेस की आपत्ति के बावजूद जम्मू-कश्मीर सरकार ने तत्काल अपनी व्यवस्था में बदलाव नहीं किया।
यही बात दोनों सहयोगी दलों के बीच मतभेद को और स्पष्ट करती है।
15 अगस्त को अलग थी स्थिति
इस विवाद में एक और दिलचस्प घटनाक्रम 15 अगस्त से जुड़ा है।
रिपोर्ट के मुताबिक स्वतंत्रता दिवस के एक कार्यक्रम में जब उमर अब्दुल्ला को महसूस हुआ था कि गायक शुरुआती दो छंदों से आगे जा रहे हैं तो उन्होंने उन्हें रोकने का इशारा किया था। लेकिन सितंबर के फिल्म फेस्टिवल में पूरा गीत बजने के दौरान वह सम्मान में खड़े रहे।
इस बदलाव को लेकर भी राजनीतिक सवाल उठे हैं।
नेशनल कॉन्फ्रेंस का मौजूदा स्पष्टीकरण यही है कि सरकारी कार्यक्रम और पार्टी की वैचारिक स्थिति को अलग-अलग समझना चाहिए।
क्या किसी को पूरा गीत गाने के लिए मजबूर किया जाएगा?
इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस ने साफ किया है कि उसकी पार्टी किसी व्यक्ति को ‘वंदे मातरम्’ गाने के लिए मजबूर करने के पक्ष में नहीं है।
तनवीर सादिक के मुताबिक जो गाना चाहता है, वह गाए और जो नहीं चाहता उसे मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
इसलिए मौजूदा विवाद को यह कहकर पेश करना कि जम्मू-कश्मीर में हर व्यक्ति के लिए पूरे छह छंद गाना अनिवार्य कर दिया गया है, उपलब्ध तथ्यों से पुष्ट नहीं होता।
बहस मुख्य रूप से **सरकारी कार्यक्रमों में पूरे संस्करण के गायन** को लेकर है।
सहयोगी लेकिन मुद्दे पर आमने-सामने
कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस राजनीतिक सहयोगी हैं, लेकिन ‘वंदे मातरम्’ विवाद ने दिखा दिया है कि राष्ट्रीय प्रतीकों और वैचारिक मुद्दों पर दोनों दलों की सोच अलग हो सकती है।
कांग्रेस का कहना है कि केवल पहले दो छंदों वाली ऐतिहासिक व्यवस्था भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता के अनुकूल है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस दूसरी तरफ सरकारी कार्यक्रमों में पूरे गीत के गायन का बचाव कर रही है और साथ ही व्यक्तिगत स्तर पर किसी को मजबूर नहीं करने की बात कह रही है।
भाजपा भी विवाद में कूदी
कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस की इस बहस में भाजपा ने भी एंट्री कर ली है।
भाजपा ने कांग्रेस के रुख पर तीखा हमला करते हुए इसे राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति पार्टी की सोच से जोड़ा। कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसका रुख नया नहीं बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से चली आ रही ऐतिहासिक व्यवस्था पर आधारित है।
इस तरह गठबंधन के अंदर शुरू हुआ विवाद अब राष्ट्रीय राजनीतिक बहस बन गया है।
INDIA गठबंधन के लिए भी असहज स्थिति
यह विवाद राजनीतिक तौर पर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस दोनों विपक्षी गठबंधन में सहयोगी हैं।
आमतौर पर दोनों दल भाजपा के खिलाफ कई मुद्दों पर एक साथ दिखाई देते हैं। लेकिन ‘वंदे मातरम्’ के सवाल पर दोनों ने सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे की बात काटी है।
कांग्रेस ने सहयोगी को ऐतिहासिक फैसले का सम्मान करने की सलाह दी तो नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कांग्रेस के अपने मुख्यमंत्रियों के उदाहरण सामने रख दिए।
इससे दोनों दलों के बीच वैचारिक दूरी खुलकर सामने आई है।
विवाद अभी थमने के आसार नहीं
फिलहाल नेशनल कॉन्फ्रेंस अपने रुख से पीछे हटती दिखाई नहीं दे रही है और कांग्रेस भी पहले दो छंदों वाली अपनी नीति पर कायम है।
उमर अब्दुल्ला द्वारा तनवीर सादिक का जवाब साझा करना भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इससे संकेत मिलता है कि मुख्यमंत्री ने कांग्रेस की आपत्ति के बाद अपनी पार्टी के सार्वजनिक बचाव को समर्थन दिया है।
हालांकि **“कांग्रेस क्या चाहती है, कश्मीरी जेल जाएं?”** जैसी लाइन को उमर अब्दुल्ला का सत्यापित सीधा बयान बताना फिलहाल उचित नहीं होगा। उपलब्ध ताजा रिपोर्टों में उनका पुष्ट रुख इतना है कि उन्होंने एनसी प्रवक्ता की उस दलील को साझा किया जिसमें सरकारी दायित्व और पार्टी की स्थिति में अंतर बताया गया तथा कहा गया कि किसी व्यक्ति को गीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
‘वंदे मातरम्’ के छह छंद बनाम दो छंद की यह बहस अब केवल सांस्कृतिक मुद्दा नहीं रही। इसने जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के रिश्तों, गठबंधन की वैचारिक सीमाओं और राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर दोनों दलों की अलग-अलग राजनीतिक सोच को भी सामने ला दिया है।