जम्मू। जम्मू में जमीन के इस्तेमाल से जुड़े अभियान ने कई बस्तियों में रह रहे रोहिंग्या परिवारों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। खेती वाली जमीन पर बने निर्माणों को हटाने के लिए जमीन मालिकों को नोटिस मिलने के बाद कुछ परिवारों ने अपने उन घरों को खुद ही तोड़ना शुरू कर दिया है, जहां वे लंबे समय से रह रहे थे।
स्थानीय लोगों के अनुसार, कार्रवाई की आशंका के बीच कई परिवारों में चिंता का माहौल है। जिन घरों को उन्होंने वर्षों की मेहनत और सीमित संसाधनों से बनाया था, उन्हें अब हटाने की स्थिति बन गई है। हालांकि प्रशासन की ओर से जारी प्रक्रिया और नोटिस से जुड़े सभी पहलुओं को लेकर स्थिति अलग-अलग स्थानों पर अलग हो सकती है।
रोहिंग्या समुदाय मूल रूप से म्यांमार के रखाइन राज्य से जुड़ा मुस्लिम और बिना देश वाला (स्टेटलेस) जातीय अल्पसंख्यक समुदाय है। दशकों से भेदभाव, हिंसा और असुरक्षा के कारण बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा। वर्ष 2017 में म्यांमार में सैन्य कार्रवाई के बाद बड़ी संख्या में लोग बांग्लादेश पहुंचे थे।
संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अनुसार, 2017 के बाद 7.5 लाख से अधिक रोहिंग्या लोगों ने म्यांमार छोड़कर बांग्लादेश में शरण ली थी। इसके अलावा कुछ लोग भारत के अलग-अलग हिस्सों में भी पहुंचे, जिनमें जम्मू भी शामिल है।
जम्मू में कैसे बनीं रोहिंग्या बस्तियां
जम्मू में रोहिंग्या परिवारों के बसने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। स्थानीय स्तर पर पहले से मौजूद सामुदायिक नेटवर्क, रोजगार की उपलब्धता और कम आय वाले कामों के अवसरों के कारण कई परिवार यहां रहने लगे।
इनमें से कई लोग दिहाड़ी मजदूरी, कबाड़ इकट्ठा करने, घरेलू काम और छोटे-मोटे श्रमिक कार्यों से अपनी आजीविका चलाते हैं। सीमित आर्थिक संसाधनों के कारण कई परिवार कम सुविधाओं वाले इलाकों में रहने को मजबूर रहे हैं।
जमीन के इस्तेमाल को लेकर कार्रवाई
जम्मू में जमीन के उपयोग से जुड़े नियमों को लेकर चल रही कार्रवाई के दौरान कुछ इलाकों में खेती की जमीन पर बने निर्माणों को लेकर सवाल उठे हैं। जमीन मालिकों को ऐसे निर्माण हटाने के लिए नोटिस मिलने के बाद वहां रहने वाले परिवारों पर भी इसका असर पड़ा है।
कुछ परिवारों ने प्रशासनिक कार्रवाई से पहले ही अपने घरों को हटाना शुरू कर दिया। उनका कहना है कि वे अचानक बेघर होने की स्थिति से चिंतित हैं और उनके पास वैकल्पिक व्यवस्था सीमित है।
परिवारों के सामने बढ़ी चिंता
प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्होंने लंबे समय से इन स्थानों पर रहकर जीवन बिताया है। कई लोगों के बच्चों की पढ़ाई, रोजगार और रोजमर्रा की जिंदगी इन्हीं इलाकों से जुड़ी हुई है।
उनका कहना है कि यदि उन्हें वहां से हटाया जाता है तो उनके सामने रहने और रोजगार दोनों की समस्या खड़ी हो सकती है। हालांकि जमीन के स्वामित्व और निर्माण की वैधता से जुड़े मामलों में प्रशासनिक प्रक्रिया अलग-अलग नियमों के अनुसार चलती है।
सुरक्षा और पहचान का मुद्दा
रोहिंग्या समुदाय को लेकर भारत में सुरक्षा और पहचान से जुड़े मुद्दे भी समय-समय पर चर्चा में रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारें अवैध प्रवास से जुड़े मामलों को लेकर अलग-अलग समय पर अपनी चिंताएं व्यक्त करती रही हैं।
वहीं, मानवाधिकार संगठनों का कहना रहा है कि विस्थापित लोगों के साथ मानवीय आधार पर व्यवहार किया जाना चाहिए और उनके मूल अधिकारों का ध्यान रखा जाना चाहिए।
स्थानीय स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं
जम्मू में रोहिंग्या बस्तियों को लेकर स्थानीय लोगों की राय भी अलग-अलग रही है। कुछ लोग सुरक्षा और संसाधनों पर दबाव को लेकर चिंता जताते हैं, जबकि कुछ लोग वहां रहने वाले परिवारों की आजीविका और मानवीय स्थिति को देखते हुए समाधान की बात करते हैं।
जमीन से जुड़े मामलों में प्रशासन के सामने कानून के पालन के साथ-साथ मानवीय पहलुओं को संतुलित करने की चुनौती भी रहती है।
आगे की स्थिति पर नजर
फिलहाल जमीन इस्तेमाल अभियान के तहत प्रभावित इलाकों में स्थिति पर नजर रखी जा रही है। जिन परिवारों के घर प्रभावित हो रहे हैं, वे भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
रोहिंग्या परिवारों का कहना है कि वे लंबे समय से जम्मू में रह रहे हैं और अचानक विस्थापन उनके लिए बड़ी समस्या बन सकता है। वहीं प्रशासनिक स्तर पर जमीन उपयोग नियमों और निर्माण की वैधता के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
जम्मू में चल रही यह प्रक्रिया एक बार फिर विस्थापन, जमीन अधिकार, प्रवासन और मानवीय जरूरतों से जुड़े मुद्दों को सामने ला रही है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन और संबंधित पक्ष इस मामले को किस तरह आगे बढ़ाते हैं।