SRINAGAR श्रीनगर: कश्मीर स्मॉल स्केल इंडस्ट्रियल एसोसिएशन (KSSIA), बागी अली मरदान खान ने 'ग्रुप ऑफ़ कंसर्न्ड सिटिज़न्स' (GCC) की उन आशंकाओं का कड़ा विरोध किया है जो हाल ही में लागू 'जम्मू-कश्मीर ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस एक्ट, 2026' को लेकर जताई गई थीं। एसोसिएशन ने इन आशंकाओं को जल्दबाजी में उठाया गया कदम और जनता के बीच बेवजह शक पैदा करने वाला बताया है, जबकि इन सुधारों का मकसद उद्यमियों को दशकों से चले आ रहे नौकरशाही के नियंत्रण से मुक्त करना है। KSSIA की एग्जीक्यूटिव काउंसिल की बैठक एसोसिएशन के ऑफिस में प्रेसिडेंट सैयद फ़ज़ल इलाही की अध्यक्षता में हुई, जिसमें बड़ी संख्या में सदस्य शामिल हुए। बैठक में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा लाए गए इस कानून का सर्वसम्मति से स्वागत किया गया। KSSIA ने एक बयान में कहा कि सदस्यों ने इसे उद्यमियों का सम्मान बहाल करने, निवेश को बढ़ावा देने और रोज़गार पैदा करने की दिशा में एक बहुत ज़रूरी कदम बताया है।
मंज़ूरी, सहमति और 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) के लिए एक ऑफिस से दूसरे ऑफिस भागने को मजबूर उद्यमियों की मुश्किलों को याद करते हुए, काउंसिल ने अफ़सोस जताया कि जिन लोगों ने अपना जीवन भर की कमाई, खून-पसीना लगाकर कारोबार और रोज़गार के साधन बनाए, उन्हें अक्सर उन अधिकारियों के सामने याचिकाकर्ता बनकर रहना पड़ता था, जिनकी ज़िम्मेदारी असल में उनकी मदद करना होनी चाहिए थी।
काउंसिल ने कहा कि 'ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस' सिर्फ़ J&K सरकार की पहल नहीं है, बल्कि भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे देशव्यापी सुधार कार्यक्रम का हिस्सा है जिसे धीरे-धीरे सभी राज्यों में अपनाया जा रहा है। दशकों तक आर्थिक उथल-पुथल और औद्योगिक ठहराव झेलने के बाद, जम्मू-कश्मीर पुराने पड़ चुके प्रशासनिक तौर-तरीकों में फंसा नहीं रह सकता। GCC की टिप्पणियों पर निराशा जताते हुए सदस्यों ने सवाल उठाया कि सरकार द्वारा लागू करने के नियम और गाइडलाइंस जारी करने से पहले ही इतनी जल्दबाजी में बड़ी-बड़ी आशंकाएं क्यों जताई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि इस एक्ट में पर्यावरण संरक्षण, जन सुरक्षा और अन्य जायज़ हितों से जुड़े सुरक्षा उपाय पहले से ही शामिल हैं, जिन्हें सही नियमों के ज़रिए और मज़बूत किया जाएगा।
काउंसिल ने ज़ोर देकर कहा कि गैर-ज़रूरी मंज़ूरियों को खत्म करने का मतलब पर्यावरण, प्लानिंग या सुरक्षा से जुड़े नियमों को खत्म करना नहीं है। नौकरशाही की परेशानी से आज़ादी की तुलना कानूनी जवाबदेही से आज़ादी से नहीं की जा सकती। सदस्यों ने GCC से अपील की कि वे कानून की हर धारा की बारीकी से जांच करें, न कि ऐसी धारणा बनाएं कि कारोबार को आसान बनाने से कश्मीर के नाज़ुक पर्यावरण को खतरा हो सकता है। एसोसिएशन ने GCC को याद दिलाया कि उद्यमी खुद इस पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाके के रहने वाले हैं और वे भी इसके जंगलों, जलाशयों, प्राकृतिक दृश्यों और सांस्कृतिक विरासत को लेकर उतने ही चिंतित हैं। विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक होने चाहिए।
काउंसिल ने पिछले तीन दशकों में हुए पर्यावरण के नुकसान, खासकर पहलगाम, गुलमर्ग और सोनमर्ग जैसे पर्यटन स्थलों के अनियोजित विकास और करण नगर, बालगार्डन, जवाहर नगर और राजबाग जैसे रिहायशी इलाकों के बढ़ते कमर्शियलाइज़ेशन पर चुप्पी पर भी सवाल उठाए। सदस्यों ने हैरानी जताई कि ऐसे विकास कार्यों की वैसी जांच-पड़ताल क्यों नहीं हुई, जबकि GCC से जुड़े कई अनुभवी प्रशासक पहले अहम सरकारी पदों पर रह चुके हैं। उनका कहना था कि पर्यावरण के प्रति जवाबदेही सिर्फ़ प्रस्तावित सुधारों तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि पिछले प्रशासनिक फैसलों पर भी लागू होनी चाहिए।
फिर भी, GCC सदस्यों के अनुभव और विशेषज्ञता को मानते हुए, एसोसिएशन ने उनसे कानून की कमियों की पहचान करने और सरकार तथा उद्योग प्रतिनिधियों के साथ मिलकर काम करने का आग्रह किया, ताकि सुधारों के मकसद को नुकसान पहुंचाए बिना ज़रूरी सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जा सकें। एग्जीक्यूटिव काउंसिल ने उद्यमियों की लंबे समय से चली आ रही मांगों को पूरा करने के लिए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनकी सरकार का आभार जताया और उनसे साफ़-सुथरे, व्यावहारिक नियमों की जल्द घोषणा करने का आग्रह किया, जो कानून की मूल भावना को बनाए रखते हुए पर्यावरण और अन्य जनहितों की रक्षा करें। एसोसिएशन ने ज़ोर देकर कहा, "जम्मू-कश्मीर न तो लापरवाह विकास का बोझ उठा सकता है और न ही कभी न खत्म होने वाली प्रशासनिक रुकावटों का। हमारे उद्यमी सम्मान के हकदार हैं, हमारे पढ़े-लिखे युवा घर पर ही मौकों के हकदार हैं और हमारा पर्यावरण सुरक्षा का हकदार है। सुशासन को ये तीनों चीज़ें सुनिश्चित करनी चाहिए।"
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