Jammu.जम्मू: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि दशकों तक मजदूरों का शोषण करने के बाद उन्हें एड हॉक (अस्थायी) श्रमिक कह देना न्यायसंगत नहीं है। न्यायालय ने यह निर्णय मज़दूरों के अधिकारों और उनके न्यायपूर्ण वेतन तथा सुरक्षा सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से दिया।
सुनवाई के दौरान मज़दूरों की ओर से पेश वकील ने बताया कि कई दशकों से राज्य में कार्यरत मजदूरों को स्थायी रूप से नियुक्त नहीं किया गया और उन्हें लगातार अस्थायी श्रमिक के रूप में रखा गया। उन्होंने कहा कि इससे न केवल उनका आर्थिक और सामाजिक हित प्रभावित हुआ है, बल्कि उनके मूल अधिकार भी सीमित रहे।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार दशकों तक मजदूरों का शोषण करती रही, और इस शोषण के बाद उन्हें केवल एड हॉक श्रमिक कह देना उचित नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे कर्मचारियों को उनके अनुभव, सेवा और योगदान के आधार पर स्थायी या दीर्घकालिक लाभ दिया जाना चाहिए।
न्यायाधीश ने कहा, “यदि राज्य दशकों तक किसी श्रमिक का रोजगार करता रहा है और उसका श्रम उपयोग करता रहा है, तो उसे इस श्रमिक को केवल अस्थायी श्रमिक कहकर उनकी मूलभूत सुरक्षा और अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता।” उन्होंने यह भी जोर दिया कि इस तरह की स्थिति सामाजिक न्याय और श्रमिक कल्याण के सिद्धांतों के खिलाफ है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वे सभी ऐसे श्रमिकों की सूची तैयार करें, जिन्होंने लंबे समय तक सेवा दी है और जिन्हें अस्थायी श्रमिक के रूप में रखा गया है। इसके साथ ही न्यायालय ने निर्देश दिए कि उनकी सेवा और योगदान के आधार पर उन्हें उचित वेतन, भत्ते और अन्य लाभ दिए जाएं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय मजदूरों के अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे राज्य सरकार को स्पष्ट संकेत मिलता है कि दशकों तक किए गए शोषण और अनिश्चित रोजगार को न्यायपूर्ण तरीके से समाप्त किया जाना चाहिए।
मजदूरों और उनके परिवारों ने हाईकोर्ट के निर्णय का स्वागत किया। उनका कहना है कि अब उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद है और उनकी सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित होगी।