Srinagar श्रीनगर,  जम्मू-कश्मीर क्राइम ब्रांच ने सोमवार को श्रीनगर के टैगोर हॉल में 'मानव तस्करी विरोधी' (एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग) विषय पर केंद्र शासित प्रदेश-स्तरीय सम्मेलन आयोजित किया। इस दौरान, IGP (क्राइम) सारा रिज़वी ने मानव तस्करी के खिलाफ एक व्यापक, समन्वित और पीड़ित-केंद्रित (विक्टिम-सेंट्रिक) कार्रवाई करने का निर्देश दिया। उन्होंने साइबर-माध्यम से होने वाले शोषण और 'साइबर गुलामी' को उभरते हुए खतरों के रूप में चिह्नित किया, जिनसे निपटने के लिए मजबूत संस्थागत क्षमता की आवश्यकता है।
यह सम्मेलन गृह मंत्रालय और पुलिस मुख्यालय, जम्मू-कश्मीर के निर्देशों पर आयोजित किया गया था। इसका उद्देश्य मानव तस्करी के खिलाफ संस्थागत प्रतिक्रिया को मजबूत करना, विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाना और जांच, बचाव, पुनर्वास तथा समाज में पुनः एकीकरण (रीइंटीग्रेशन) के लिए पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण को बढ़ावा देना था। सम्मेलन का उद्घाटन जम्मू-कश्मीर की IGP (क्राइम) सारा रिज़वी (IPS) ने किया, जबकि शेख जुनैद महमूद (IPS, CEO-JK4C) इसमें 'गेस्ट ऑफ ऑनर' (विशिष्ट अतिथि) के रूप में शामिल हुए।
सम्मेलन में जम्मू-कश्मीर क्राइम ब्रांच के DIG-P और सभी SSP, न्यायपालिका तथा समाज कल्याण विभाग के सदस्य (जिनमें बाल विकास परियोजना अधिकारी भी शामिल थे), पूरे जम्मू-कश्मीर में 'मानव तस्करी विरोधी इकाइयों' (Anti-Human Trafficking Units) के पुलिस नोडल अधिकारी, क्राइम ब्रांच के राजपत्रित अधिकारी, अर्धसैनिक बलों के अधिकारी, NGO के प्रतिनिधि, और महिला कॉलेज (MA रोड), महिला कॉलेज (नवाकदल) तथा पुलिस पब्लिक स्कूल (बेमिना) के छात्र शामिल हुए।
अपने मुख्य संबोधन में, रिज़वी ने कहा कि मानव तस्करी विरोधी प्रयासों की सफलता को केवल पीड़ितों के बचाव या मामले दर्ज करने के आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए। इसके बजाय, इसे पीड़ितों की सुरक्षा, गरिमा, न्याय तक पहुंच, पुनर्वास और समाज में उनके स्थायी रूप से पुनः एकीकरण के आधार पर आंका जाना चाहिए। उन्होंने इस अपराध के बदलते स्वरूप से निपटने के लिए संस्थागत क्षमताओं को मजबूत करने पर जोर दिया।
तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञ वक्ताओं ने अपने विचार रखे। कश्मीर विश्वविद्यालय में कानून विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. अनीदा जान ने "मानव तस्करी: कानूनी ढांचा, उभरते रुझान और चुनौतियां" विषय पर बात की। उन्होंने कानूनी प्रावधानों, शोषण के बदलते तरीकों और मानव तस्करी के अपराधों का पता लगाने तथा उनकी जांच करने में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के सामने आने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डाला। जम्मू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ. सविता नायर ने "भारत में लापता व्यक्तियों से संबंधित SOP (मानक संचालन प्रक्रिया), और मानव तस्करी के मामलों में आपराधिक कानून तथा न्यायिक हस्तक्षेप" विषय पर एक सत्र लिया। उन्होंने लापता व्यक्तियों के मामलों में त्वरित और व्यवस्थित कार्रवाई करने, तथा जांच एजेंसियों के बीच प्रभावी समन्वय बनाए रखने पर जोर दिया।
समाज कल्याण विभाग की 'एकीकृत बाल संरक्षण योजना' (Integrated Child Protection Scheme) के प्रोग्राम मैनेजर डॉ. फारूक अहमद खान ने "पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण: पहचान, बचाव, पुनर्वास और समाज में पुनः एकीकरण" विषय पर बात की। उन्होंने पीड़ितों की पहचान संवेदनशीलता के साथ करने, बचाव कार्यों में समन्वय, मनोवैज्ञानिक-सामाजिक सहायता और निरंतर पुनर्वास की आवश्यकता पर बल दिया।
IPS और SSP (JK4C) कमल पाल सिंह मल्होत्रा ​​ने "साइबर गुलामी" (Cyber ​​Slavery) के मुद्दे पर चर्चा की। उन्होंने मानव तस्करी से जुड़े अपराधों में डिजिटल प्लेटफॉर्म की बढ़ती भूमिका और तकनीक के जरिए होने वाले शोषण की ओर ध्यान दिलाया। साथ ही, उन्होंने साइबर क्षमताओं को मजबूत करने, डिजिटल जांच को बेहतर बनाने और विभिन्न एजेंसियों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया।
इस सम्मेलन ने पुलिस अधिकारियों, न्यायपालिका के सदस्यों, सरकारी विभागों, नागरिक समाज संगठनों और छात्रों को एक ऐसा मंच प्रदान किया, जहां वे अपने अनुभव साझा कर सकें और मानव तस्करी के मामलों की रोकथाम, पहचान तथा जांच को मजबूत करने के व्यावहारिक उपायों पर विचार-विमर्श कर सकें। चर्चाओं में समय पर जांच करने, 'मानव तस्करी विरोधी इकाइयों' (Anti-Human Trafficking Units) और अन्य संबंधित पक्षों के बीच प्रभावी समन्वय, पीड़ितों के अधिकारों की सुरक्षा, तथा कानून प्रवर्तन एजेंसियों, सरकारी संस्थानों और नागरिक समाज के बीच निरंतर सहयोग के महत्व को रेखांकित किया गया। जम्मू-कश्मीर क्राइम ब्रांच ने मानव तस्करी के खिलाफ संस्थागत प्रतिक्रिया को मजबूत करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। इसके लिए पेशेवर क्षमता निर्माण, एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय, तकनीक-आधारित जांच और एक मानवीय, पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया गया।
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