जम्मू। जम्मू-कश्मीर में बिजली की बढ़ती मांग ने पावर सिस्टम पर दबाव बढ़ा दिया है। वित्तीय वर्ष 2026-27 में जुलाई तक केंद्र शासित प्रदेश में बिजली की अधिकतम मांग 3063 मेगावाट तक पहुंच गई, जबकि इस दौरान उपलब्ध बिजली आपूर्ति 2899 मेगावाट रही। इस तरह पीक डिमांड और उपलब्ध बिजली के बीच 164 मेगावाट का अंतर दर्ज किया गया। इस कमी को शॉर्ट टर्म व्यवस्थाओं के माध्यम से पूरा किया गया।

सरकार ने यह जानकारी विधानसभा में विधायक सुनील कुमार शर्मा द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में दी। पावर डेवलपमेंट डिपार्टमेंट की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों में जम्मू-कश्मीर में बिजली की बढ़ती मांग और विभिन्न क्षेत्रों में दर्ज पीक डिमांड की जानकारी दी गई है।

विभाग के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2026-27 में जुलाई तक जम्मू-कश्मीर में सबसे अधिक पीक डिमांड 27 मई 2026 को सुबह सात बजे दर्ज की गई। इस दौरान केंद्र शासित प्रदेश में बिजली की मांग बढ़कर 3063 मेगावाट तक पहुंच गई थी। इसके मुकाबले उपलब्ध बिजली आपूर्ति 2899 मेगावाट थी। यानी उस समय मांग उपलब्ध आपूर्ति से 164 मेगावाट अधिक थी।

बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच पैदा हुए इस अंतर को पूरा करने के लिए शॉर्ट टर्म व्यवस्थाओं का सहारा लिया गया। बिजली की खपत में अचानक होने वाली बढ़ोतरी के दौरान ऐसी व्यवस्थाओं के माध्यम से अतिरिक्त जरूरत पूरी की जाती है, ताकि उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति बनाए रखी जा सके।

विधानसभा में दिए गए जवाब में क्षेत्रवार बिजली मांग के आंकड़े भी सामने रखे गए। कश्मीर संभाग में सबसे अधिक बिजली की मांग 27 मई को सुबह सात बजे दर्ज की गई। इस समय कश्मीर में पीक डिमांड 1845 मेगावाट तक पहुंच गई थी। यह आंकड़ा बताता है कि सुबह के समय भी क्षेत्र में बिजली की खपत काफी ऊंचे स्तर पर पहुंची।

दूसरी तरफ जम्मू संभाग में बिजली की सर्वाधिक मांग 16 जुलाई 2026 को शाम छह बजे दर्ज की गई। इस दौरान जम्मू संभाग की पीक डिमांड 1623 मेगावाट रही। दोनों संभागों में अलग-अलग तारीख और समय पर अधिकतम मांग दर्ज होने से बिजली की खपत के बदलते स्वरूप का भी पता चलता है।

जम्मू-कश्मीर में मौसम के अनुसार बिजली की मांग में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। गर्मी और सर्दी के दौरान घरेलू तथा व्यावसायिक स्तर पर बिजली की खपत बढ़ने से पावर सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। अलग-अलग क्षेत्रों में मौसम और उपभोक्ताओं की जरूरतों के आधार पर बिजली की मांग में उतार-चढ़ाव होता रहता है।

पावर डेवलपमेंट डिपार्टमेंट के सामने बड़ी चुनौती पीक डिमांड के दौरान पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराने की है। सामान्य परिस्थितियों में बिजली की उपलब्धता मांग के करीब रहती है, लेकिन खपत अचानक बढ़ने पर उपलब्ध बिजली और मांग के बीच अंतर पैदा हो सकता है। वित्तीय वर्ष 2026-27 में जुलाई तक सामने आए आंकड़ों में भी यही स्थिति दिखाई दी।

3063 मेगावाट की अधिकतम मांग के मुकाबले 2899 मेगावाट की उपलब्धता होने के कारण विभाग को 164 मेगावाट की अतिरिक्त जरूरत को दूसरी व्यवस्थाओं से पूरा करना पड़ा। इससे स्पष्ट है कि पीक समय में बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त संसाधनों और शॉर्ट टर्म बिजली प्रबंधन की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है।

विधानसभा में रखे गए आंकड़े इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि जम्मू-कश्मीर में बिजली की मांग लगातार पावर इंफ्रास्ट्रक्चर और आपूर्ति व्यवस्था के लिए चुनौती बनी हुई है। बिजली की मांग बढ़ने के साथ ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम पर भी अतिरिक्त भार पड़ता है। ऐसे में मांग का सही आकलन और उसके अनुरूप बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी हो जाता है।

कश्मीर और जम्मू संभाग की पीक डिमांड के आंकड़ों से दोनों क्षेत्रों में बिजली की जरूरतों का अलग-अलग स्वरूप भी सामने आया है। कश्मीर में 27 मई की सुबह सात बजे 1845 मेगावाट की अधिकतम मांग दर्ज की गई, जबकि जम्मू में 16 जुलाई की शाम छह बजे मांग 1623 मेगावाट तक पहुंची।

बिजली की अधिकतम मांग केवल उत्पादन या खरीद से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि इसके लिए मजबूत ट्रांसमिशन और वितरण नेटवर्क भी आवश्यक होता है। अधिक मांग के समय पावर सिस्टम को स्थिर बनाए रखते हुए उपभोक्ताओं तक बिजली पहुंचाना विभाग के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है।

सरकार की ओर से विधानसभा में दिए गए जवाब से यह भी सामने आया है कि बिजली की उपलब्धता में कमी होने की स्थिति में शॉर्ट टर्म व्यवस्थाओं के जरिए अंतर को पूरा किया जा रहा है। इससे पीक डिमांड के समय बिजली आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिलती है।

फिलहाल वित्तीय वर्ष 2026-27 में जुलाई तक जम्मू-कश्मीर की अधिकतम बिजली मांग 3063 मेगावाट दर्ज की गई है। इसके मुकाबले 2899 मेगावाट बिजली उपलब्ध रही और 164 मेगावाट के अंतर को शॉर्ट टर्म व्यवस्थाओं से पूरा किया गया। आने वाले समय में बिजली की मांग में होने वाले बदलाव के आधार पर पावर सिस्टम और आपूर्ति प्रबंधन की चुनौती भी बदलती रहेगी।

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