24 हफ्ते की सीमा पार होने पर भी नाबालिग को गर्भपात की अनुमति, हाई कोर्ट का अहम फैसला
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न की शिकार 11 वर्षीय नाबालिग की गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दे दी है। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर नाबालिग को संवैधानिक सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता कि गर्भावस्था मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) कानून के तहत निर्धारित 24 सप्ताह की अवधि को पार कर चुकी है। यह आदेश न्यायमूर्ति वसीम सादिक नरगल ने 22 सितंबर को सुनाया।
अदालत के सामने याचिका 11 वर्षीय बच्ची की ओर से उसके पिता ने दाखिल की थी। बच्ची कथित यौन उत्पीड़न के बाद गर्भवती हुई थी। हाई कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों, बच्ची की कम उम्र और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी। अदालत ने अधिकारियों को आवश्यक चिकित्सकीय प्रक्रिया जल्द से जल्द शुरू करने का निर्देश दिया।
मामले में मेडिकल बोर्ड ने 11 सितंबर को नाबालिग की जांच की थी। उस समय गर्भावस्था लगभग 22 सप्ताह और पांच दिन की थी। मेडिकल बोर्ड ने जांच के बाद बताया था कि बच्ची शारीरिक और मानसिक रूप से गर्भावस्था समाप्त कराने की प्रक्रिया के लिए फिट है। हालांकि, अदालत में मामले पर विचार और मेडिकल प्रक्रिया के दौरान समय बीतने से 22 सितंबर को फैसला सुनाए जाने तक गर्भावस्था करीब 24 सप्ताह और दो दिन की हो गई थी।
यही स्थिति मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल बन गई। MTP कानून और उससे जुड़े नियमों में यौन उत्पीड़न या दुष्कर्म की पीड़िताओं और नाबालिगों जैसी विशेष श्रेणियों के लिए कुछ परिस्थितियों में 24 सप्ताह तक गर्भावस्था समाप्त करने की व्यवस्था है। लेकिन इस मामले में जब अदालत का फैसला आया, तब यह समय-सीमा पार हो चुकी थी।
हाई कोर्ट ने कहा कि मामले की विशेष परिस्थितियों में केवल 24 सप्ताह की अवधि पार हो जाने को अलग से देखकर नाबालिग को संवैधानिक संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि गर्भावस्था की अवधि बढ़ने में बच्ची या उसके परिवार की जानबूझकर की गई देरी नहीं थी। समय मेडिकल राय प्राप्त करने और अदालत में मामले पर विचार के दौरान बीता था।
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट को प्राप्त अधिकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि वैधानिक व्यवस्था को संवैधानिक अधिकारों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। अदालत ने इस मामले में बच्ची की उम्र, उसकी परिस्थितियों और गर्भावस्था के कारण उसके जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को महत्वपूर्ण माना।
मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में गर्भावस्था समाप्त करना चिकित्सकीय रूप से संभव बताया था। साथ ही यह भी स्पष्ट किया था कि गर्भावस्था की इस अवस्था में प्रक्रिया के दौरान रक्तस्राव, संक्रमण और रक्त चढ़ाने की जरूरत जैसे जोखिम बढ़ सकते हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रक्रिया मेडिकल बोर्ड की सिफारिशों और इलाज करने वाले विशेषज्ञों की चिकित्सकीय राय के अनुसार की जाए।
अदालत ने गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज बारामूला से जुड़े अस्पताल के प्रिंसिपल या मेडिकल सुपरिंटेंडेंट को गर्भावस्था समाप्त करने के लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रक्रिया के दौरान बच्ची की मां या कानूनी अभिभावक को उसके साथ रहने की अनुमति दी जाए। इसके अलावा नाबालिग को प्रक्रिया से पहले और बाद में जरूरी मनोवैज्ञानिक परामर्श और सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए।
मामले की जांच को ध्यान में रखते हुए अदालत ने भ्रूण के ऊतक या अन्य आवश्यक सामग्री को सुरक्षित रखने और DNA प्रोफाइलिंग सहित जरूरी जांच के लिए भेजने का भी निर्देश दिया। फैसला आने तक कथित आरोपी की पहचान और गिरफ्तारी नहीं हुई थी। अदालत ने जांच से जुड़े साक्ष्यों को सुरक्षित रखने पर भी जोर दिया।
मामले के अनुसार बच्ची अपने परिवार के साथ इसी वर्ष मार्च में बारामूला आई थी। बाद में उसे बुखार, उल्टी, खांसी और पेट दर्द जैसी स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हुई। जांच के दौरान अल्ट्रासाउंड में उसके गर्भवती होने की जानकारी सामने आई। इसके बाद बच्ची ने डॉक्टरों को बताया कि उसके साथ कथित रूप से जबरन यौन संबंध बनाया गया था। मामला पुलिस तक पहुंचा और बच्ची को संरक्षण में लेकर शेल्टर होम में रखा गया।
हाई कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे मामलों में कानून की समय-सीमा के साथ पीड़िता के संवैधानिक अधिकारों और परिस्थितियों पर भी विचार जरूरी है। अदालत के मुताबिक, 11 साल की बच्ची को कथित यौन उत्पीड़न के परिणामस्वरूप हुई गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इसी आधार पर तत्काल आवश्यक चिकित्सकीय कदम उठाने का आदेश दिया।