नेशनल रूरल लाइवलीहुड मिशन (NRLM) के तहत 39 लाख रुपये की लागत से शुरू की गई यह पहल टमाटर उगाने वालों को अपनी उपज को प्रोसेस करने का एक मंच देगी और ग्रामीण महिलाओं को रोज़गार भी प्रदान करेगी। सोलन ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (BDO) मंजुला कंवर की मदद से, महिलाओं ने 30 सितंबर को सफलतापूर्वक एक ट्रायल किया, जिससे प्रोडक्ट को लॉन्च करने का रास्ता साफ हो गया।
यह यूनिट शुरू में हर दिन 25 से 40 किलोग्राम टमाटर प्रोसेस कर रही है, हालांकि इसकी क्षमता हर दिन 500 किलोग्राम तक है। कंवर ने कहा कि ब्रांड की क्वालिटी और निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए मार्केटिंग और ब्रांडिंग जैसे अहम मुद्दों पर काम चल रहा है। इस यूनिट को सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स (SHGs) और CLF की महिलाएं चलाती और मैनेज करती हैं। वे न केवल अतिरिक्त टमाटरों को प्यूरी, पेस्ट और केचप में बदलती हैं, बल्कि लोकल मार्केटिंग भी संभालती हैं।
हाल ही में हुए एक ट्रेनिंग प्रोग्राम ने महिलाओं को टमाटर प्रोसेस करने की अलग-अलग तकनीकों - जैसे प्यूरी, केचप और सॉस बनाना और वैल्यू एडिशन - की बारीकियां सीखने में मदद की। महिला उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के मकसद से आयोजित इस ट्रेनिंग में ग्रामीण महिलाओं ने काफी दिलचस्पी दिखाई। कंवर ने कहा कि एक ऐप बनाने के लिए शूलिनी यूनिवर्सिटी से मदद ली जा रही है, जो प्रोडक्ट्स को मार्केटिंग सपोर्ट दे सके और प्रमोशन से जुड़े अन्य पहलुओं को भी कवर कर सके।
उन्होंने कहा कि टमाटर उगाने वालों को एक तय शुल्क पर अपनी उपज प्रोसेस करने की सुविधा भी दी जाएगी, ताकि कम कीमत मिलने पर उन्हें नुकसान न हो। इस यूनिट का जल्द ही उद्घाटन किया जाएगा, जिससे इसके औपचारिक लॉन्च का रास्ता साफ हो जाएगा। सोलन, जिसे राज्य में टमाटर की खेती के सबसे बड़े क्षेत्र और सबसे ज़्यादा पैदावार के कारण "लाल सोने का शहर" (city of red gold) कहा जाता है, को इस पहल से फायदा होगा। उम्मीद है कि इससे ग्रामीण महिलाओं के बीच रोज़गार बढ़ेगा।
हालांकि यह एक छोटी शुरुआत है, लेकिन यह पहल किसानों को अपनी उपज प्रोसेस करने और कीमतें गिरने पर मजबूरी में कम दाम पर बेचने (distress sale) से बचने का विकल्प देती है। इनपुट कॉस्ट तेज़ी से बढ़ने और मुनाफ़ा कम होने के कारण टमाटर की खेती का आकर्षण कम होता जा रहा है। सोलन में टमाटर प्रोसेसिंग यूनिट की ज़रूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी, और विधानसभा चुनावों से पहले कई राजनीतिक पार्टियों ने ऐसी यूनिट बनाने की घोषणा भी की थी। पिछली बीजेपी सरकार ने भी "एक ज़िला, एक उत्पाद" पहल के तहत इस संभावना पर विचार किया था, लेकिन ज़्यादा लागत एक बड़ी बाधा साबित हुई।
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