धर्मशाला/प्राग: अगले दलाई लामा के उत्तराधिकार को लेकर निर्वासित तिब्बती नेतृत्व ने चीन को स्पष्ट संदेश दिया है। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के प्रमुख पेंपा सेरिंग ने कहा कि अगले दलाई लामा का जन्म स्वतंत्र विश्व में होगा और उनकी पहचान की प्रक्रिया में बीजिंग को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन धार्मिक परंपरा को राजनीतिक नियंत्रण का माध्यम बनाना चाहता है। सेरिंग ने यह बात चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में अपनी आधिकारिक यात्रा के दौरान कही। 

पेंपा सेरिंग ने 14 अक्टूबर को प्राग में मीडिया से बातचीत के दौरान दलाई लामा के पुनर्जन्म और तिब्बत में धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया। उन्होंने दोहराया कि इस प्रक्रिया का अधिकार दलाई लामा और गादेन फोडरंग ट्रस्ट के पास है। उनके मुताबिक, चीन की ओर से उत्तराधिकारी नियुक्त करने की कोशिश धार्मिक विषय में राजनीतिक दखल है। सेरिंग ने स्वतंत्र विश्व में अगले दलाई लामा के जन्म की बात कहते हुए तिब्बती नेतृत्व का रुख फिर स्पष्ट किया। 
इससे पहले प्राग में आयोजित 30वें फोरम 2000 सम्मेलन के दौरान भी उन्होंने उत्तराधिकार का प्रश्न उठाया था। धार्मिक स्वतंत्रता और अधिनायकवाद पर केंद्रित चर्चा में सेरिंग ने कहा कि भारत में पंजीकृत गादेन फोडरंग ट्रस्ट को अगले दलाई लामा की पहचान करने का अधिकार है। उन्होंने लोकतांत्रिक देशों, बौद्ध समुदायों और विदेशों में बसे तिब्बतियों के बीच संपर्क मजबूत करने की जरूरत बताई, ताकि धार्मिक परंपराओं में बाहरी हस्तक्षेप का विरोध किया जा सके। 
सेरिंग ने चीन की कम्युनिस्ट व्यवस्था के धार्मिक उत्तराधिकार तय करने के दावे पर सवाल उठाया। उनका तर्क था कि नास्तिक विचारधारा वाली सरकार बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म की प्रक्रिया को निर्देशित नहीं कर सकती। उन्होंने चीन की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि तिब्बती समुदाय की आस्था और उसकी धार्मिक संस्थाओं का भविष्य संबंधित धार्मिक परंपराओं के अनुसार निर्धारित होना चाहिए। सम्मेलन में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से दलाई लामा की पुनर्जन्म प्रक्रिया की सुरक्षा के समर्थन में मजबूत प्रस्ताव अपनाने की अपील भी की। 
अपने पक्ष के समर्थन में उन्होंने 11वें पंचेन लामा गेदुन चोएक्यी न्यिमा के 1995 में लापता होने का मामला उठाया। सेरिंग ने इसे धार्मिक उत्तराधिकार में सरकारी हस्तक्षेप के खतरों की चेतावनी बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजिंग नियमों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के जरिए तिब्बती बौद्ध परंपराओं पर नियंत्रण स्थापित करना चाहता है। उनके मुताबिक, इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जरूरी है, क्योंकि इसका संबंध तिब्बती समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान दोनों से है। 
‘स्वतंत्र विश्व’ में जन्म का उल्लेख दलाई लामा पहले भी कर चुके हैं। अपनी पुस्तक ‘वॉइस फॉर द वॉइसलेस’ में उन्होंने कहा था कि उनके उत्तराधिकारी का जन्म चीन के बाहर होगा। पुस्तक में इसका संबंध उनके पूर्ववर्ती कार्यों और आध्यात्मिक दायित्वों की निरंतरता से जोड़ा गया है। इनमें सार्वभौमिक करुणा का संदेश देना, तिब्बती बौद्ध धर्म का आध्यात्मिक नेतृत्व और तिब्बती लोगों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व शामिल है। वर्तमान 14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो 1959 में तिब्बत से भारत आए थे। 
दलाई लामा ने जुलाई 2025 में भी स्पष्ट किया था कि उनकी संस्था आगे जारी रहेगी और पुनर्जन्म की पहचान की जिम्मेदारी गादेन फोडरंग ट्रस्ट संभालेगा। दूसरी ओर, चीन का रुख है कि उत्तराधिकारी की मान्यता में उसकी केंद्रीय सरकार की मंजूरी आवश्यक है। इसी अधिकार को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद हैं। तिब्बती नेतृत्व धार्मिक प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप का विरोध करता रहा है। 
प्राग यात्रा के दौरान सेरिंग ने तिब्बती भाषा, शिक्षा और सांस्कृतिक पहचान का विषय भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन की समावेशन संबंधी नीतियां तिब्बती पहचान को कमजोर कर रही हैं। साथ ही लोकतांत्रिक देशों से आर्थिक दबाव के सामने धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के मुद्दों पर एकजुट रहने का आग्रह किया। हालांकि, उन्होंने संवाद की संभावना बनाए रखते हुए वास्तविक स्वायत्तता के लिए केंद्रीय तिब्बती प्रशासन की ‘मध्य मार्ग’ नीति के प्रति प्रतिबद्धता भी दोहराई।
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