125 साल पुरानी समेला सुरंग अब बनेगी इतिहास, ट्विन टनल लेगी पुराने रास्ते की जगह
कांगड़ा। शिमला-मटौर फोरलेन परियोजना के कच्छियारी-भंगवार हिस्से का निर्माण पूरा होने के साथ ही ब्रिटिश शासनकाल की करीब 125 वर्ष पुरानी समेला सुरंग इतिहास का हिस्सा बनने जा रही है। कांगड़ा घाटी में दशकों तक यातायात की महत्वपूर्ण कड़ी रही यह सुरंग अब पुराने संपर्क मार्ग के रूप में रह जाएगी। इसकी जगह आधुनिक ट्विन टनल के माध्यम से वाहनों को आवाजाही की सुविधा मिलेगी।
समेला सुरंग ने अपने लंबे सफर में न केवल हजारों-लाखों वाहनों को रास्ता दिया, बल्कि कांगड़ा क्षेत्र के लोगों की बदलती जरूरतों और यातायात के बढ़ते दबाव को भी देखा है। करीब सवा सौ वर्षों के दौरान इस सुरंग ने भूकंप और विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं के झटके झेले, लेकिन इसके बावजूद इसका अस्तित्व और उपयोग लगातार बना रहा। आज भी सुरंग से कई स्थानों पर पानी का रिसाव होता है, लेकिन इससे इसकी मूल संरचना की मजबूती पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा है।
कांगड़ा से शिमला मार्ग की अहम कड़ी
समेला सुरंग कांगड़ा से दौलतपुर, रानीताल और आगे शिमला की ओर जाने वाले मार्ग का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। जब क्षेत्र में आधुनिक सड़क नेटवर्क और परिवहन सुविधाएं विकसित नहीं हुई थीं, तब इस सुरंग ने पहाड़ी भूभाग में आवागमन को आसान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कठिन पहाड़ी क्षेत्र में बनी यह सुरंग लंबे समय तक स्थानीय लोगों, यात्रियों और मालवाहक वाहनों के लिए प्रमुख रास्ता रही। समय के साथ वाहनों की संख्या बढ़ी और सड़क को फोरलेन में बदलने की जरूरत महसूस हुई। इसी के तहत अब नए फोरलेन मार्ग और ट्विन टनल का निर्माण किया जा रहा है।
नई परियोजना पूरी होने के बाद वाहनों का बड़ा हिस्सा आधुनिक मार्ग से होकर गुजरेगा। इससे पुराने मार्ग और समेला सुरंग पर यातायात का दबाव कम होने की संभावना है।
1910 से 1915 के बीच हुआ था निर्माण
समेला सुरंग का निर्माण करीब 1910 से 1915 के बीच ब्रिटिश शासनकाल में कराया गया था। उस समय कांगड़ा घाटी को प्रमुख प्रशासनिक केंद्रों से बेहतर तरीके से जोड़ना एक बड़ी आवश्यकता थी। पहाड़ी और ऊबड़-खाबड़ भूभाग के कारण सड़क और सुरंग निर्माण आज की तुलना में बेहद चुनौतीपूर्ण था।
सबसे खास बात यह है कि उस दौर में सुरंग के निर्माण के लिए आधुनिक मशीनरी और आज की तरह उन्नत निर्माण तकनीक उपलब्ध नहीं थी। इसके बावजूद इंजीनियरों और मजदूरों ने कठिन पहाड़ी क्षेत्र में इस सुरंग को तैयार किया।
चूना, सुर्खी, उड़द और गुड़ से तैयार हुआ गारा
समेला सुरंग के निर्माण की तकनीक भी अपने आप में खास है। बताया जाता है कि सुरंग की संरचना में पत्थरों और ईंटों को जोड़ने के लिए पारंपरिक गारे का इस्तेमाल किया गया था। इस गारे में चूना, सुर्खी, उड़द की दाल और गुड़ जैसे पदार्थों का मिश्रण किया जाता था।
आज जब निर्माण कार्य में आधुनिक सीमेंट, स्टील और अत्याधुनिक मशीनरी का इस्तेमाल होता है, ऐसे समय में 125 वर्ष पहले पारंपरिक सामग्री और तकनीक से बनी सुरंग का इतने लंबे समय तक टिके रहना अपने आप में उल्लेखनीय है।
यह सुरंग ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों और कठिन भूभाग के बीच बनाई गई थी। उस समय निर्माण के दौरान मजदूरों को बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ा होगा। सीमित संसाधनों के बावजूद तैयार की गई इस संरचना ने एक सदी से अधिक समय तक अपनी उपयोगिता बनाए रखी।
भूकंप और आपदाओं के बावजूद कायम रही मजबूती
कांगड़ा क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। इस इलाके ने अतीत में कई बड़े भूकंपों का सामना किया है। प्राकृतिक आपदाओं के झटकों के बावजूद समेला सुरंग लंबे समय तक उपयोग में बनी रही।
सुरंग के भीतर आज भी पानी का रिसाव देखने को मिलता है। पहाड़ी क्षेत्रों में इस तरह का रिसाव सामान्य चुनौती माना जाता है। इसके बावजूद सुरंग की मूल संरचना ने इतने लंबे समय तक मजबूती बनाए रखी है।
सुरंग का इतिहास इस बात का उदाहरण भी है कि पुराने दौर में तैयार की गई कई निर्माण संरचनाएं स्थानीय परिस्थितियों और पारंपरिक निर्माण तकनीकों के अनुरूप तैयार की जाती थीं।
ट्विन टनल से बदलेगा यातायात का स्वरूप
शिमला-मटौर फोरलेन परियोजना के तहत आधुनिक सड़क नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। कच्छियारी-भंगवार हिस्सा भी इसी परियोजना का महत्वपूर्ण भाग है। इसके शुरू होने के साथ ही यातायात के लिए नई ट्विन टनल का इस्तेमाल किया जाएगा।
नई टनल आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीक और वर्तमान यातायात जरूरतों के अनुरूप तैयार की जा रही है। इससे वाहन चालकों को बेहतर सड़क सुविधा मिलने और पुराने मार्ग पर यातायात का दबाव कम होने की उम्मीद है।
हालांकि, नई सड़क और टनल के आने से समेला सुरंग की व्यावहारिक भूमिका कम हो जाएगी, लेकिन क्षेत्र के इतिहास में इसका महत्व बना रहेगा।
विकास के बीच विरासत को सहेजने की जरूरत
समेला सुरंग का इतिहास केवल एक पुराने सड़क मार्ग की कहानी नहीं है। यह उस दौर की इंजीनियरिंग क्षमता, श्रम और निर्माण तकनीक का प्रमाण भी है। करीब 125 वर्षों तक लगातार उपयोग में रहने वाली इस सुरंग ने कांगड़ा क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास में भी योगदान दिया है।
फोरलेन बनने के बाद जब यह सुरंग मुख्य यातायात से अलग हो जाएगी, तब इसके संरक्षण को लेकर भी विचार किया जाना जरूरी होगा। यदि इसे ऐतिहासिक धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा जाता है तो आने वाली पीढ़ियां ब्रिटिश कालीन निर्माण तकनीक और उस समय की परिवहन व्यवस्था को करीब से समझ सकेंगी।
पुराने रास्ते से नई राह तक का सफर
समेला सुरंग ने एक सदी से अधिक समय तक पहाड़ों के बीच लोगों को रास्ता दिया। अब आधुनिक ट्विन टनल और फोरलेन परियोजना के साथ यातायात का नया दौर शुरू होने जा रहा है। पुरानी सुरंग भले ही मुख्य मार्ग से बाहर हो जाए, लेकिन इसकी कहानी कांगड़ा की सड़क यात्रा के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रहेगी।
125 वर्ष पुराने इस निर्माण का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सीमित संसाधनों और पारंपरिक तकनीक के बावजूद तैयार की गई मजबूत संरचनाएं समय की कसौटी पर लंबे समय तक टिक सकती हैं। आधुनिक विकास के बीच समेला सुरंग अब यातायात की जरूरत से ज्यादा एक ऐतिहासिक पहचान के रूप में याद की जाएगी।