शिमला। हिमाचल प्रदेश के शिमला स्थित केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान यानी सीपीआरआई की विकसित उन्नत आलू तकनीक अब ताजिकिस्तान तक पहुंचने की दिशा में आगे बढ़ रही है। भारत और ताजिकिस्तान के बीच आलू अनुसंधान, उत्पादन, गुणवत्तापूर्ण बीज तैयार करने और वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई है। इस संबंध में सीपीआरआई शिमला और ताजिकिस्तान की एलसीसी एकोमा के प्रतिनिधियों के बीच वर्चुअल बैठक आयोजित की गई।

बैठक में नई दिल्ली स्थित ताजिकिस्तान दूतावास के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। चर्चा का मुख्य उद्देश्य यह तय करना था कि दोनों देशों के बीच आलू उत्पादन और बीज तकनीक के क्षेत्र में सहयोग को किस तरह आगे बढ़ाया जाए। खासतौर पर हिमाचल प्रदेश में विकसित बीज आलू उत्पादन की वैज्ञानिक पद्धतियों को ताजिकिस्तान में अपनाने की संभावनाओं पर विचार किया गया।

सीपीआरआई लंबे समय से आलू की उन्नत किस्मों, बीज उत्पादन तकनीक और रोग नियंत्रण पर काम कर रहा है। संस्थान ने हिमाचल प्रदेश की जलवायु के अनुरूप ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे बेहतर गुणवत्ता वाला बीज आलू तैयार किया जा सके। अब इसी अनुभव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा करने की तैयारी है।

ताजिकिस्तान के प्रतिनिधियों ने भारत में विकसित आलू उत्पादन तकनीक में रुचि दिखाई। उन्होंने गुणवत्तापूर्ण बीज, रोगमुक्त रोपण सामग्री, उत्पादन बढ़ाने और वैज्ञानिक प्रशिक्षण से जुड़े विषयों पर सहयोग की इच्छा जताई।

वर्चुअल बैठक में वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों ने यह भी चर्चा की कि ताजिकिस्तान की स्थानीय जलवायु, मिट्टी और खेती की परिस्थितियों के अनुसार कौन-सी तकनीक अधिक उपयोगी हो सकती है। दोनों देशों के बीच भविष्य में तकनीकी दस्तावेज, प्रशिक्षण कार्यक्रम और अनुसंधान अनुभव साझा किए जाने की संभावना है।

आलू उत्पादन में बीज की गुणवत्ता सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक मानी जाती है। यदि किसानों को रोगमुक्त और प्रमाणित बीज उपलब्ध हो तो उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार हो सकता है। इसी कारण बैठक में बीज उत्पादन तकनीक को प्रमुख विषय बनाया गया।

सीपीआरआई की तकनीक का उपयोग भारत के कई हिस्सों में आलू उत्पादक किसानों द्वारा किया जाता है। हिमाचल प्रदेश की ठंडी जलवायु गुणवत्तापूर्ण बीज आलू उत्पादन के लिए उपयुक्त मानी जाती है। संस्थान ने इस प्राकृतिक अनुकूलता को वैज्ञानिक तकनीक के साथ जोड़कर बेहतर बीज उत्पादन मॉडल विकसित किए हैं।

ताजिकिस्तान में भी आलू महत्वपूर्ण खाद्य फसल है। वहां उत्पादन बढ़ाने और किसानों को बेहतर बीज उपलब्ध कराने के लिए वैज्ञानिक सहयोग की जरूरत महसूस की जा रही है। ऐसे में भारत के अनुभव का उपयोग ताजिकिस्तान की कृषि प्रणाली के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।

बैठक के दौरान वैज्ञानिक प्रशिक्षण पर भी विशेष जोर दिया गया। प्रस्ताव है कि ताजिकिस्तान के वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ भारत आकर सीपीआरआई की अनुसंधान प्रयोगशालाओं, बीज उत्पादन केंद्रों और खेतों में प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं।

इसी तरह भारतीय वैज्ञानिक भी ताजिकिस्तान की स्थानीय खेती व्यवस्था का अध्ययन कर वहां के लिए अनुकूल तकनीक सुझा सकते हैं। इससे दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक वैज्ञानिक सहयोग का रास्ता खुल सकता है।

आलू अनुसंधान में रोग नियंत्रण भी बड़ा विषय है। बीज आलू में वायरस और अन्य रोग उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं। सीपीआरआई की ओर से विकसित रोगमुक्त बीज उत्पादन और परीक्षण तकनीक ताजिकिस्तान के लिए उपयोगी हो सकती है।

इसके अलावा नई किस्मों के चयन, उत्पादन लागत कम करने, भंडारण और बाजार तक पहुंच जैसे विषयों पर भी भविष्य में सहयोग बढ़ाया जा सकता है।

बैठक में यह भी संकेत मिला कि यदि प्रारंभिक स्तर का तकनीकी सहयोग सफल रहता है तो इसे व्यापक कृषि अनुसंधान साझेदारी में बदला जा सकता है। इसके तहत संयुक्त परियोजनाएं, वैज्ञानिक आदान-प्रदान और प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जा सकते हैं।

हिमाचल प्रदेश के लिए यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे राज्य में विकसित कृषि तकनीक को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल सकती है। शिमला स्थित संस्थान की विशेषज्ञता यदि विदेशों में अपनाई जाती है तो यह भारतीय कृषि अनुसंधान की उपलब्धि के रूप में देखा जाएगा।

सीपीआरआई की ओर से वर्षों से आलू की विभिन्न किस्मों, बीज उत्पादन और रोग प्रबंधन पर अनुसंधान किया जा रहा है। किसानों की जरूरतों के अनुसार तकनीक विकसित करना संस्थान के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।

ताजिकिस्तान के साथ संभावित सहयोग से वहां के किसानों को बेहतर बीज और तकनीक मिल सकती है, जबकि भारतीय वैज्ञानिकों को भी अलग जलवायु और खेती परिस्थितियों में अपनी तकनीक को परखने का अवसर मिलेगा।

इस प्रकार का अंतरराष्ट्रीय सहयोग कृषि अनुसंधान को नए स्तर पर ले जा सकता है। किसी एक देश में विकसित तकनीक को दूसरे देश की परिस्थितियों के अनुसार संशोधित कर उपयोग करना वैज्ञानिक सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।

बैठक में शामिल प्रतिनिधियों ने इस दिशा में आगे भी संवाद जारी रखने पर सहमति जताई। आने वाले समय में तकनीकी सहयोग का विस्तृत प्रारूप तैयार किया जा सकता है।

फिलहाल शिमला में विकसित आलू बीज उत्पादन की उन्नत वैज्ञानिक तकनीक ताजिकिस्तान तक पहुंचने की दिशा में पहला बड़ा कदम उठा चुकी है। यदि प्रस्तावित सहयोग आगे बढ़ता है तो यह न केवल दोनों देशों के कृषि संबंधों को मजबूत करेगा, बल्कि गुणवत्तापूर्ण बीज, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और आलू उत्पादन बढ़ाने के क्षेत्र में भी नई संभावनाएं खोलेगा।

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