शिमला। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविंदर गुप्ता ने शुक्रवार को कहा कि स्वराज और स्वदेशी से आत्मनिर्भर भारत तक की यात्रा देश में आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और समावेशी विकास की दिशा में लगातार आगे बढ़ने वाले राष्ट्रीय प्रयास को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग-थलग होना नहीं है, बल्कि अपनी क्षमताओं को मजबूत करते हुए वैश्विक ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, व्यापार और सहयोग के लिए खुले रहना है।राज्यपाल शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS) में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे। संगोष्ठी 24 और 25 सितंबर को “The Quest for Atmanirbhar Bharat: From the Past, Through the Present, to the Future” विषय पर आयोजित की गई। इसमें देश के शिक्षाविदों, चिंतकों, शोधकर्ताओं और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा के ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक आयामों पर चर्चा की।
राज्यपाल ने अपने संबोधन में कहा कि संगोष्ठी का विषय केवल एक अकादमिक चर्चा तक सीमित नहीं है। यह भारत की विकास यात्रा, सभ्यतागत चेतना, सामाजिक और आर्थिक आकांक्षाओं तथा भविष्य के विजन से गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने स्वराज और स्वदेशी की ऐतिहासिक अवधारणाओं को वर्तमान आत्मनिर्भर भारत की सोच से जोड़ते हुए देश की विकास यात्रा पर अपनी बात रखी।उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को संकीर्ण अर्थों में नहीं देखा जाना चाहिए। आत्मनिर्भरता का मतलब यह नहीं है कि भारत खुद को वैश्विक अर्थव्यवस्था या दुनिया में हो रहे वैज्ञानिक और तकनीकी बदलावों से अलग कर ले। इसके विपरीत देश को अपनी घरेलू क्षमताओं, उत्पादन, नवाचार, कौशल और संस्थानों को मजबूत करते हुए दुनिया के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए।
राज्यपाल के मुताबिक भारत को वैश्विक ज्ञान, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, व्यापार और सहयोग के लिए खुला रहना चाहिए। साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि देश की अपनी क्षमताएं इतनी मजबूत हों कि वह अपनी आवश्यकताओं और विकास की प्राथमिकताओं को पूरा करने में सक्षम हो सके। उन्होंने इसे आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता से जुड़ी व्यापक विकास दृष्टि के रूप में प्रस्तुत किया।संगोष्ठी में आत्मनिर्भर भारत को केवल आर्थिक या तकनीकी आत्मनिर्भरता के नजरिए से नहीं देखा गया। इसके विषयों में भारतीय ज्ञान परंपरा, शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीकी प्रगति, सतत और समावेशी विकास, महिला नेतृत्व वाला विकास और सामाजिक असमानताओं जैसे मुद्दे भी शामिल रहे। संगोष्ठी के वैचारिक ढांचे में स्वराज और स्वदेशी से लेकर विकसित भारत@2047 तक की यात्रा को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझने का प्रयास किया गया।
राज्यपाल कविंदर गुप्ता ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ और ‘अंत्योदय’ के विचारों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ये विचार व्यक्ति के सर्वांगीण विकास और समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण को केंद्र में रखने पर जोर देते हैं। उनके अनुसार विकास की प्रक्रिया का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचना चाहिए।उन्होंने समावेशी विकास को आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। राज्यपाल के संबोधन में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि विकास को केवल आर्थिक आंकड़ों या उत्पादन क्षमता तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके साथ सामाजिक कल्याण, अवसरों की उपलब्धता, मानव विकास और समाज के कमजोर वर्गों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है।IIAS में आयोजित इस दो दिवसीय संगोष्ठी में भारतीय ज्ञान परंपरा और विकसित भारत, एकात्म मानववाद, शिक्षा और आत्मनिर्भर भारत, भारतीय संविधान की मूल भावना तथा आत्मनिर्भरता से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तक जैसे विषयों पर भी विचार-विमर्श किया गया था।
संगोष्ठी के आयोजन का उद्देश्य आत्मनिर्भरता की समकालीन चर्चा को भारत की लंबी बौद्धिक और विकास यात्रा के संदर्भ में देखना था। IIAS के निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने कार्यक्रम से पहले कहा था कि समकालीन आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वराज और स्वदेशी की सोच से लेकर विकसित भारत@2047 की आकांक्षा तक व्यापक संदर्भ में समझने का प्रयास किया जाएगा।राष्ट्रीय संगोष्ठी में बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच भारत की विकास रणनीति पर भी विमर्श हुआ। इसमें यह समझने की कोशिश की गई कि आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी बदलावों के बीच भारत किस तरह अपनी क्षमताओं को बढ़ाते हुए वैश्विक व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभा सकता है।राज्यपाल ने भी इसी संदर्भ में वैश्विक सहयोग और राष्ट्रीय क्षमता के बीच संतुलन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत को अपने संसाधनों और क्षमताओं को मजबूत करने के साथ दुनिया में उपलब्ध ज्ञान और तकनीकी प्रगति से भी जुड़ा रहना चाहिए। इस तरह आत्मनिर्भरता को उन्होंने आत्मविश्वास और क्षमता निर्माण से जोड़कर प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी में विकसित भारत के लक्ष्य पर भी चर्चा हुई। भारत सरकार ने 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य रखा है और आत्मनिर्भरता को इस व्यापक विकास दृष्टि के एक हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। संगोष्ठी में इस लक्ष्य को शिक्षा, तकनीक, स्वास्थ्य, सामाजिक समावेशन और टिकाऊ विकास जैसे अलग-अलग क्षेत्रों के संदर्भ में समझने की कोशिश की गई।कार्यक्रम में चार पुस्तकों के विमोचन और संगोष्ठी की रिपोर्ट प्रस्तुत करने का कार्यक्रम भी निर्धारित था। एशियाटिक सोसाइटी, मुंबई के अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे का समापन संबोधन ऑनलाइन माध्यम से निर्धारित किया गया था, जबकि भारत प्रकाशन से जुड़े प्रफुल्ल केतकर के विचार भी कार्यक्रम का हिस्सा थे।राज्यपाल कविंदर गुप्ता का संबोधन दो दिवसीय अकादमिक विमर्श के समापन सत्र का हिस्सा रहा। उन्होंने स्वराज, स्वदेशी, आत्मनिर्भर भारत, एकात्म मानववाद और अंत्योदय की अवधारणाओं को भारत की विकास यात्रा के अलग-अलग पहलुओं से जोड़ते हुए कहा कि देश को अपनी क्षमताओं पर भरोसा बढ़ाना होगा।
उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आत्मनिर्भर भारत को वैश्विक दुनिया से दूरी बनाने की अवधारणा के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। इसके बजाय भारत को अपनी घरेलू क्षमताओं को मजबूत करते हुए वैश्विक ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और व्यापार में सक्रिय भागीदारी जारी रखनी चाहिए।दो दिवसीय संगोष्ठी का व्यापक विषय भी इसी सवाल पर केंद्रित रहा कि भारत अपने ऐतिहासिक अनुभवों और बौद्धिक परंपराओं से सीख लेते हुए वर्तमान चुनौतियों का सामना कैसे करे और भविष्य के विकास की दिशा किस तरह तय करे। राज्यपाल ने समापन संबोधन में आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और समावेशी विकास को इस यात्रा के प्रमुख आधार के रूप में रेखांकित किया।संगोष्ठी के कार्यक्रम में राज्यपाल कविंदर गुप्ता की समापन सत्र में अध्यक्षता, चार पुस्तकों का विमोचन, संगोष्ठी रिपोर्ट और अन्य अकादमिक संबोधन निर्धारित थे। ([himachalheadlines.com][2])