मंडी। दशकों तक बिछड़े रहने के बाद एक परिवार को फिर से मिलाने की उम्मीद जगी है। वर्षों की धुंधली पड़ चुकी यादों, एक टैटू और संवेदनशील प्रयासों की मदद से ओडिशा की रहने वाली प्रमिला अब 35 साल बाद अपने परिवार के पास लौटने की तैयारी कर रही हैं।

‘मिशन अपनों तक’ अभियान के तहत एक और बिछड़े परिवार को मिलाने में सफलता मिली है। इससे पहले पंजाब की ममता, तमिलनाडु की सायरा बानो और कर्नाटक के रामन्ना जैसे मामलों में भी इस अभियान ने परिवारों को फिर से जोड़ने का काम किया था।

इस बार ओडिशा के केंद्रापड़ा जिले की अलुपुआ पंचायत निवासी प्रमिला की पहचान सामने आई है। संस्थागत रिकॉर्ड में उनका नाम रामकली मलिक दर्ज था। लंबे समय तक अलग-अलग संस्थानों में रहने के बाद अब वह अपने परिवार के बीच लौटने की उम्मीद कर रही हैं।

शिमला से शुरू हुई तलाश

जानकारी के अनुसार, प्रमिला वर्ष 2011 से 2018 तक शिमला के मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में रहीं। इसके बाद उन्हें नारी निकेतन और फिर मंडी जिले के भंगरोटू स्थित वृद्ध आश्रम में रखा गया।

वर्षों तक वह अपने अतीत और परिवार से दूर रहीं। समय बीतने के साथ पुरानी यादें भी धुंधली होती गईं, लेकिन कुछ संकेत ऐसे थे जिन्होंने उनके परिवार तक पहुंचने का रास्ता खोल दिया।

भंगरोटू वृद्ध आश्रम के दौरे के दौरान एसडीएम बल्ह स्मृतिका नेगी और तहसील कल्याण अधिकारी धर्मशीला ने प्रमिला से बातचीत की। अधिकारियों ने उनके जीवन और पुराने संबंधों के बारे में जानकारी जुटाने का प्रयास किया।

टैटू बना पहचान का जरिया

बातचीत के दौरान प्रमिला की बाजू पर बना एक टैटू अधिकारियों की नजर में आया। टैटू पर ओड़िया भाषा में लिखा नाम जांच के लिए महत्वपूर्ण सुराग साबित हुआ।

इसके अलावा प्रमिला ने बातचीत के दौरान कटक और अपने पुराने जीवन से जुड़ी कुछ यादों का जिक्र किया। इन्हीं संकेतों के आधार पर अधिकारियों ने उनकी पहचान और परिवार की तलाश शुरू की।

जांच के दौरान ओडिशा के केंद्रापड़ा जिले से जुड़े सुराग मिले। इसके बाद संबंधित विभागों और स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाई गई।

परिवार से जुड़ने की उम्मीद

प्रमिला की पहचान सामने आने के बाद अब उन्हें उनके परिवार से मिलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। 35 साल लंबे इंतजार के बाद परिवार के सदस्यों को अपने अपनों से मिलने की उम्मीद जगी है।

परिवार से दूर रहने के दौरान प्रमिला ने कई संस्थानों में समय बिताया। अब उन्हें अपने घर और पुराने रिश्तों से दोबारा जुड़ने का मौका मिलेगा।

संवेदनशील पहल से मिली सफलता

‘मिशन अपनों तक’ जैसे प्रयास उन लोगों को उनके परिवारों तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं, जो किसी कारणवश अपने घर से दूर हो गए हैं। मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों, आश्रमों और संस्थानों में रहने वाले कई लोगों की पहचान और उनके परिवारों की तलाश इस तरह के अभियानों के माध्यम से की जा रही है।

अधिकारियों का कहना है कि ऐसे मामलों में धैर्य, संवेदनशील बातचीत और छोटे-छोटे संकेतों को समझना बेहद जरूरी होता है। कई बार वर्षों पुरानी यादें, किसी स्थान का नाम या शरीर पर बने निशान परिवार तक पहुंचने में मददगार साबित होते हैं।

प्रमिला के मामले में भी टैटू और कटक से जुड़ी यादों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हीं संकेतों के आधार पर उनकी पहचान संभव हो सकी।

नई शुरुआत की उम्मीद

35 साल बाद परिवार से मिलने की खबर प्रमिला के लिए नई शुरुआत लेकर आई है। लंबे समय तक अकेले जीवन बिताने के बाद अब वह अपने लोगों के बीच लौट सकेंगी।

इस मामले ने एक बार फिर साबित किया है कि सही प्रयास और संवेदनशील सोच के जरिए वर्षों से बिछड़े लोगों को भी उनके परिवारों से मिलाया जा सकता है।

फिलहाल प्रमिला को परिवार तक पहुंचाने की औपचारिक प्रक्रिया पूरी की जा रही है। उम्मीद है कि जल्द ही वह अपने अपनों के बीच होंगी और 35 साल का लंबा इंतजार खत्म होगा।

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