Ladakh लद्दाख की मांगों को लेकर केंद्र सरकार के साथ बातचीत कर रहे दो समूहों में से एक, 'कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस' (KDA) ने सरकार के उस हालिया फैसले पर आपत्ति जताई है, जिसमें केंद्र शासित प्रदेश की 'ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल' (स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद) से जुड़ी कानूनी शब्दावली, प्रशासनिक ढांचे और चुनावी प्रावधानों में बदलाव किया गया है। KDA के सह-अध्यक्ष सज्जाद कारगिली ने 'X' (ट्विटर) पर लिखा, "ऐसे समय में जब लद्दाख के लिए एक समाधान निकालने को लेकर बातचीत चल रही है - जिसमें संवैधानिक दर्जे की मांग और 'लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल' (LAHDC) के लिए मजबूत सुरक्षा की मांग शामिल है - यह बेहद चिंताजनक है कि सरकार ने लद्दाख के लोगों और संबंधित पक्षों से सलाह लिए बिना ही इन परिषदों की संरचना, शक्तियों और कामकाज में बड़े बदलाव कर दिए हैं।"
उन्होंने कहा, "ये बदलाव सीधे तौर पर उन संस्थाओं को प्रभावित करते हैं जिनके जरिए स्थानीय स्वशासन चलाया जाता है। ऐसे में, जब लद्दाख की राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था के भविष्य पर चर्चा चल रही हो, तो लोगों से सलाह लेना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।" "सरकार असल में उस संस्थागत ढांचे को ही बदल रही है, जिस पर बातचीत की जानी है। साथ ही, वह केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन को इन परिषदों की संरचना और कामकाज पर और अधिक नियंत्रण दे रही है।"
कारगिली ने कहा, "इससे सरकार की उस प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं जो वह बातचीत को लेकर दिखा रही है। साथ ही यह भी सवाल उठता है कि क्या अंत में होने वाला समझौता लद्दाख को वास्तविक स्वायत्तता देगा, या फिर वहां की प्रतिनिधि संस्थाएं पूरी तरह से प्रशासन की मर्जी पर निर्भर होकर रह जाएंगी?" केंद्र सरकार ने हाल ही में लद्दाख की 'ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल' से जुड़ी कानूनी शब्दावली, प्रशासनिक ढांचे और चुनावी प्रावधानों में बदलाव किया है, ताकि इन्हें 'जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019' के अनुरूप बनाया जा सके।
'लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल (संशोधन) विनियमन' के तहत, प्रत्येक परिषद में चुनी जाने वाली सीटों की संख्या लद्दाख प्रशासन तय करेगा। इसमें कम से कम 7 और अधिकतम 24 सीटें हो सकती हैं। विनियमन के अनुसार, प्रशासन महिलाओं और उन समुदायों में से अधिकतम 4 सदस्यों को नामित कर सकता है जिनका प्रतिनिधित्व नहीं है। हालांकि, यह संख्या कुल आबादी के छठे हिस्से (1/6) से अधिक नहीं होनी चाहिए।
लद्दाख के नेताओं का लगातार यह कहना रहा है कि जब तक चल रही बातचीत पूरी नहीं हो जाती, तब तक सरकार को केंद्र शासित प्रदेश से जुड़े बड़े नीतिगत फैसले लेने से बचना चाहिए। वहीं, अधिकारियों का कहना है कि वे "लोगों की सामान्य जरूरतों और मुश्किलों को दूर करने का काम नहीं रोक सकते।" "हमें यहां उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए ही नियुक्त किया गया है।" "हम बस सब कुछ ताले में बंद करके नहीं जा सकते। संविधान के तहत उपराज्यपाल राष्ट्रपति का प्रतिनिधित्व करते हैं और उन्हें अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करना होता है," लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने पिछले हफ्ते कहा।
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