हिमाचल के फार्मा उद्योग पर महंगाई की मार, कच्चे माल के दाम 150% तक उछले
कच्चे माल के दाम 150 प्रतिशत तक चढ़े
सोलन: हिमाचल प्रदेश के फार्मा सेक्टर की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ गई हैं। दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स यानी API, जरूरी केमिकल और पैकिंग सामग्री की कीमतों में 40 से 150 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी का दावा किया गया है। इससे दवा कंपनियों की उत्पादन लागत तेजी से बढ़ी है और छोटे-मध्यम उद्योगों पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ रहा है।
इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से जुड़े सुमित सिंगला ने केंद्र सरकार से इस स्थिति में हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि कच्चे माल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के साथ ढुलाई खर्च भी बढ़ा है। इससे पहले से तय कीमतों पर दवाओं का उत्पादन और समय पर ऑर्डर पूरा करना कंपनियों के लिए मुश्किल होता जा रहा है।
फार्मा उद्योग में इस्तेमाल होने वाले एसीटोन, मेथनॉल और आइसोप्रोपिल अल्कोहल जैसे कई प्रमुख रसायनों की कीमतों में भी तेज वृद्धि की बात कही जा रही है। इसके अलावा पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाली सामग्री महंगी होने से दवा निर्माण की कुल लागत और बढ़ गई है। उद्योग जगत का कहना है कि लगातार महंगे हो रहे इनपुट का सीधा असर उत्पादन व्यवस्था पर पड़ रहा है।
हिमाचल प्रदेश देश के प्रमुख फार्मा उत्पादन केंद्रों में से एक है। यहां सैकड़ों दवा निर्माण इकाइयां संचालित हैं और राज्य में तैयार होने वाली दवाओं की देशभर में आपूर्ति होती है। ऐसे में कच्चे माल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी सिर्फ स्थानीय उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर दवाओं की सप्लाई चेन पर भी पड़ सकता है। मार्च 2026 में भी हिमाचल के फार्मा निर्माताओं ने कच्चे माल की कमी और बढ़ती लागत को लेकर चिंता जताई थी।
उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि कच्चे माल की उपलब्धता और कीमतों की स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई तो पैरासिटामोल, मेटफार्मिन और हृदय रोगों में इस्तेमाल होने वाली कुछ जरूरी दवाओं के उत्पादन और आपूर्ति पर असर पड़ सकता है। तय समय पर सरकारी सप्लाई और बड़े ऑर्डर पूरे नहीं होने की स्थिति में कंपनियों पर आर्थिक और अनुबंध संबंधी दबाव भी बढ़ सकता है।
एक बड़ी चुनौती यह भी है कि दवाओं की कीमतों पर कई मामलों में नियामकीय नियंत्रण रहता है। ऐसे में कंपनियां कच्चे माल की बढ़ी हुई लागत को सीधे ग्राहकों पर नहीं डाल सकतीं। इससे विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम फार्मा इकाइयों के मार्जिन पर दबाव बढ़ता है। पहले भी हिमाचल के दवा निर्माताओं ने इस तरह की परिस्थितियों में केंद्र सरकार से कीमतों और सप्लाई पर नियंत्रण के लिए हस्तक्षेप की मांग की थी।
भारत अभी भी कई महत्वपूर्ण API और दवा इंटरमीडिएट के लिए आयात पर निर्भर है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, चीन से API और इंटरमीडिएट आयात में भारत की निर्भरता अभी भी काफी अधिक है। ऐसे में वैश्विक सप्लाई चेन में किसी भी तरह का दबाव घरेलू दवा उद्योग की लागत पर असर डाल सकता है।
फार्मा उद्योग ने सरकार से प्रमुख कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने, जमाखोरी और कृत्रिम कमी पर नजर रखने तथा आवश्यक इनपुट की कीमतों को स्थिर करने के लिए कदम उठाने की मांग की है। उद्योग जगत का कहना है कि यदि लागत का दबाव लंबे समय तक बना रहा तो उत्पादन क्षमता, आपूर्ति और छोटी इकाइयों की वित्तीय स्थिति प्रभावित हो सकती है।