हिमाचल में प्राकृतिक खेती का असर रासायनिक खाद का घटा इस्तेमाल
हिमाचल के किसान रसायनिक खाद से दूरी
शिमला: हिमाचल प्रदेश में किसान अब धीरे-धीरे रासायनिक खादों पर निर्भरता कम कर प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं। राज्य में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिलने से रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। आंकड़ों के अनुसार किसानों के इस बदलाव के कारण उर्वरकों की खपत में करीब 17,636 टन की कमी आई है।
राज्य सरकार लंबे समय से किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इसके तहत किसानों को रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बजाय गोबर, गोमूत्र, जैविक खाद और स्थानीय संसाधनों के इस्तेमाल के लिए प्रेरित किया जा रहा है। प्राकृतिक खेती से मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने के साथ खेती की लागत कम करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
बढ़ रहा प्राकृतिक खेती का दायरा
हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती का दायरा लगातार बढ़ रहा है। बड़ी संख्या में किसान अब गेहूं, मक्का, सब्जियों और अन्य फसलों में प्राकृतिक तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। सरकार की प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के तहत किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी जानकारी और बाजार उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। कृषि विभाग के अनुसार प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। राज्य के कई पंचायत क्षेत्रों तक यह अभियान पहुंच चुका है। किसानों का कहना है कि प्राकृतिक खेती से उन्हें कम खर्च में उत्पादन करने का मौका मिल रहा है और मिट्टी की उर्वरता भी बेहतर हो रही है।
रासायनिक खाद पर निर्भरता में कमी
पहले किसान उत्पादन बढ़ाने के लिए बड़ी मात्रा में यूरिया, डीएपी और अन्य रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल करते थे। लेकिन लगातार बढ़ती लागत और मिट्टी की खराब होती गुणवत्ता को देखते हुए अब कई किसान प्राकृतिक विकल्पों को अपना रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक रासायनिक उर्वरकों के अधिक इस्तेमाल से मिट्टी की संरचना प्रभावित हो सकती है। प्राकृतिक खेती मिट्टी में जैविक तत्वों को बनाए रखने और पर्यावरण संरक्षण में मददगार साबित हो सकती है।
किसानों को मिल रहा आर्थिक लाभ
प्राकृतिक खेती से जुड़े किसानों का कहना है कि शुरुआत में बदलाव के लिए मेहनत और प्रशिक्षण की जरूरत होती है, लेकिन धीरे-धीरे लागत कम होने लगती है। इसके अलावा प्राकृतिक उत्पादों की मांग बढ़ने से किसानों को बेहतर बाजार मिलने की उम्मीद भी रहती है। हिमाचल सरकार प्राकृतिक खेती से जुड़े उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य और खरीद व्यवस्था पर भी काम कर रही है। इससे किसानों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य मिलने की संभावना बढ़ी है।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम
प्राकृतिक खेती केवल किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। रासायनिक पदार्थों के कम इस्तेमाल से जमीन, पानी और जैव विविधता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। हिमाचल में किसानों का यह बदलाव खेती के क्षेत्र में एक नई दिशा दिखा रहा है। सरकार और किसानों के संयुक्त प्रयासों से राज्य में प्राकृतिक खेती का मॉडल मजबूत हो रहा है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता लगातार घट रही है।