हिमाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (HPSPCB) ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के लगातार उल्लंघन के लिए परवाणू नगर परिषद के कार्यकारी अधिकारी पर 11.85 लाख रुपये का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया है। यह कार्रवाई क्षेत्रीय कार्यालय, एचपीएसपीसीबी, परवाणू द्वारा बार-बार किए गए निरीक्षणों के बाद की गई है, जिसमें सेक्टर 5 में नगरपालिका अपशिष्ट प्रसंस्करण स्थल पर अनुचित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का खुलासा हुआ है। प्रमुख कमियों में मिश्रित और असंगठित कचरे का संचय, कचरे का अनियमित उठाना, इसके अलावा साइट को अनुचित तरीके से ढंकना शामिल है, जिसके परिणामस्वरूप लीचेट उत्पन्न होता है। इससे न केवल सेक्टर 5 नाले और सुखना नाले में प्रदूषण का खतरा पैदा होता है, बल्कि दोनों जल निकायों की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
निरीक्षण दल ने अपशिष्ट प्रसंस्करण स्थल पर दुर्गंध और आवारा मवेशियों के कूड़ा-करकट को खंगालते हुए भी देखा, जिससे प्रदूषण फैल रहा है और मक्खियों का खतरा बढ़ रहा है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2016 का घोर उल्लंघन करते हुए, कचरे के पृथक्करण और प्रसंस्करण जैसी विभिन्न गतिविधियों में लगे स्वच्छता कर्मचारी उचित व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों के बिना पाए गए।
एचपीएसपीसीबी द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं को संबोधित करने में नागरिक निकाय की उदासीनता नियमों के लगातार गैर-पालन में परिलक्षित होती है, हालांकि इसे कई कारण बताओ नोटिस और निर्देश जारी किए गए हैं। नागरिक निकाय ने कोई प्रभावी सुधारात्मक उपाय नहीं किया, जिसके कारण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के निर्देशों के अनुसार 11.85 लाख रुपये का पर्यावरणीय मुआवजा लगाना पड़ा, जिससे "प्रदूषक भुगतान सिद्धांत" को लागू किया गया। इस सिद्धांत के अनुसार, प्रदूषण पैदा करने वाली इकाई सफाई, रोकथाम के साथ-साथ पीड़ितों को मुआवजे के लिए शमन लागत वहन करने के लिए उत्तरदायी है। नगर परिषद को सात दिनों के भीतर मुआवजा राशि जमा करने का निर्देश दिया गया है, अन्यथा पर्यावरण कानूनों और नियमों के अनुसार आगे की कार्रवाई शुरू की जाएगी।
एचपीएसपीसीबी के क्षेत्रीय अधिकारी अनिल कुमार ने वैज्ञानिक ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, कचरे का उचित पृथक्करण और निपटान, लीचेट संदूषण की रोकथाम और सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा के महत्व को दोहराया।
एनजीटी ने जुलाई में जारी अपने विस्तृत आदेश में हिमाचल प्रदेश में ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन में कमियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। ट्रिब्यूनल ने राज्य सरकार को शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में अवैज्ञानिक अपशिष्ट निपटान को संबोधित करने के लिए समयबद्ध उपाय करने का निर्देश दिया था।
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