PG एडमिशन नीति पर डॉक्टरों का विरोध, सुक्खू सरकार से पुनर्विचार की मांग
शिमला। हिमाचल प्रदेश में मेडिकल अधिकारियों की उच्च शिक्षा और पोस्टग्रेजुएट पाठ्यक्रमों में प्रवेश से जुड़ी नई नीति को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। हिमाचल मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन (HMOA) ने राज्य सरकार से 28 अक्टूबर को घोषित पोस्टग्रेजुएट और सुपर स्पेशियलिटी (PG/SS) नीति में प्रस्तावित बदलावों पर पुनर्विचार करने की मांग की है। एसोसिएशन का कहना है कि नई व्यवस्था लागू करते समय स्वास्थ्य विभाग में पहले से कार्यरत जनरल ड्यूटी ऑफिसर्स (GDOs) के अनुभव, सेवा अवधि और उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। संगठन ने मांग की है कि पोस्टग्रेजुएट मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए सभी पात्र चिकित्सकों को समान और न्यायसंगत अवसर उपलब्ध कराए जाएं। यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने हाल ही में स्वास्थ्य विभाग को जॉब ट्रेनी मेडिकल ऑफिसर्स के लिए पीजी पाठ्यक्रमों में प्रवेश आसान बनाने के निर्देश दिए हैं। प्रस्तावित बदलावों के बाद वरिष्ठ चिकित्सकों के हितों और नए नियुक्त डॉक्टरों को मिलने वाले अवसरों के बीच संतुलन बनाने का सवाल महत्वपूर्ण हो गया है।
जानकारी के अनुसार, हिमाचल प्रदेश सरकार मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से पीजी/एसएस नीति में संशोधन की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है। इसके तहत जॉब ट्रेनी मेडिकल ऑफिसर्स को भी पोस्टग्रेजुएट पाठ्यक्रमों में प्रवेश के अवसर देने की योजना है। सरकार का उद्देश्य सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में कार्यरत चिकित्सकों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा उपलब्ध कराना और प्रदेश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ाना है।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने बुधवार, 28 अक्टूबर को नव नियुक्त मेडिकल ऑफिसर्स और सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के साथ बातचीत के दौरान स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग को पीजी/एसएस नीति की समीक्षा करने के निर्देश दिए थे। उन्होंने कहा था कि जॉब ट्रेनी मेडिकल ऑफिसर्स को एमडी, एमएस और एमडीएस जैसे स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में प्रवेश का अवसर मिलना चाहिए।
सरकार की प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, जॉब ट्रेनी मेडिकल ऑफिसर्स को सेवारत जनरल ड्यूटी ऑफिसर्स के लिए निर्धारित 66.6 प्रतिशत कोटे के अंतर्गत पीजी पाठ्यक्रमों में प्रवेश की पात्रता देने की योजना है। मुख्यमंत्री ने विभाग से इस संबंध में आवश्यक संशोधन करने को कहा है।
हालांकि हिमाचल मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन ने इस प्रस्ताव को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। एसोसिएशन का कहना है कि लंबे समय से सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में सेवाएं दे रहे चिकित्सकों के हितों का संरक्षण करना आवश्यक है। किसी भी नई नीति के कारण पुराने चिकित्सकों को मिलने वाले अवसर प्रभावित नहीं होने चाहिए।
संगठन के अनुसार, राज्य के कई डॉक्टर वर्षों से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में काम करने वाले इन चिकित्सकों ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने में योगदान दिया है। ऐसे में उच्च शिक्षा के अवसर निर्धारित करते समय उनकी सेवा अवधि और अनुभव का उचित मूल्यांकन होना चाहिए।
एचएमओए ने इस बात पर जोर दिया है कि पोस्टग्रेजुएट पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए ऐसी व्यवस्था तैयार की जाए, जिससे पुराने और नए दोनों वर्गों के पात्र चिकित्सकों के साथ न्याय हो सके। संगठन चाहता है कि नीति में किए जाने वाले किसी भी बदलाव से पहले संबंधित नियमों और सेवा शर्तों की विस्तृत समीक्षा की जाए।
राज्य सरकार की प्रस्तावित व्यवस्था में जॉब ट्रेनी मेडिकल ऑफिसर्स को पीजी पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद अपनी नियुक्ति की शेष सेवा अवधि पूरी करनी होगी। मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग को यह सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं कि प्रदेश के भीतर पढ़ाई करने वाले इन चिकित्सकों के वेतन और अन्य वित्तीय लाभों के संबंध में उपयुक्त प्रावधान किए जाएं।
इसके अलावा मुख्यमंत्री ने कहा है कि जॉब ट्रेनी मेडिकल ऑफिसर्स को उनकी नियुक्ति की तारीख से जनरल ड्यूटी ऑफिसर्स के समान निर्धारित लाभ उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाएगी। उन्होंने नियमितीकरण के लिए दोबारा परीक्षा देने से छूट के मुद्दे पर भी सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया है।
सरकार की इन घोषणाओं का उद्देश्य नए नियुक्त चिकित्सकों को बेहतर शैक्षणिक और पेशेवर अवसर प्रदान करना है। हालांकि पहले से कार्यरत डॉक्टरों के लिए यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि उनकी वरिष्ठता और सेवा के आधार पर मिलने वाले अवसर प्रभावित न हों।
मेडिकल अधिकारियों के लिए पोस्टग्रेजुएट शिक्षा उनके पेशेवर विकास का महत्वपूर्ण माध्यम है। एमबीबीएस करने के बाद डॉक्टर एमडी या एमएस जैसे पाठ्यक्रमों के माध्यम से चिकित्सा के अलग-अलग क्षेत्रों में विशेषज्ञता प्राप्त करते हैं। इसके बाद वे सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ सेवाएं उपलब्ध कराने के साथ मेडिकल कॉलेजों में शैक्षणिक जिम्मेदारियां भी संभाल सकते हैं।
हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता विशेष महत्व रखती है। प्रदेश के कई दूरस्थ क्षेत्रों में लोगों को उच्चस्तरीय चिकित्सा सेवाएं प्राप्त करने के लिए जिला अस्पतालों या बड़े मेडिकल कॉलेजों तक जाना पड़ता है। ऐसे में सरकारी सेवा में कार्यरत चिकित्सकों को विशेषज्ञ प्रशिक्षण उपलब्ध कराना स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए उपयोगी हो सकता है।
हालांकि इस प्रक्रिया में चिकित्सकों की वरिष्ठता, सेवा अनुभव और प्रवेश पात्रता से जुड़े नियम स्पष्ट होना आवश्यक है। यदि नियमों में बदलाव के कारण विभिन्न श्रेणियों के डॉक्टरों के बीच असमानता की स्थिति पैदा होती है, तो इससे प्रशासनिक और कानूनी विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
प्रदेश में पहले से लागू पीजी/एसएस नीति के अंतर्गत दूरदराज, जनजातीय और कठिन क्षेत्रों में सेवा देने वाले चिकित्सकों के लिए अनुभव आधारित प्रोत्साहन का प्रावधान भी रहा है। नीति के पुराने दस्तावेजों के अनुसार, निर्धारित क्षेत्रों में सेवा के आधार पर पात्र चिकित्सकों को नीट-पीजी में प्राप्त अंकों पर प्रोत्साहन दिया जा सकता है। इसकी अधिकतम सीमा 30 प्रतिशत तक निर्धारित रही है।
ऐसे में एचएमओए की मांग को सेवा अनुभव और उच्च शिक्षा के अवसरों के बीच संतुलन स्थापित करने के संदर्भ में देखा जा रहा है। संगठन चाहता है कि पहले से कार्यरत डॉक्टरों के अनुभव को नई व्यवस्था में उचित महत्व दिया जाए।
इसी बीच राज्य सरकार ने मेडिकल कॉलेजों में सीनियर रेजिडेंट और ट्यूटर स्पेशलिस्ट के रिक्त पदों पर नियुक्ति से संबंधित व्यवस्था में भी बदलाव करने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा है कि पीजीआई चंडीगढ़ और एम्स नई दिल्ली से पोस्टग्रेजुएट की पढ़ाई पूरी करने वाले चिकित्सकों को राज्य के मेडिकल कॉलेजों में नियुक्ति का अवसर उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, ऐसे उम्मीदवारों की नियुक्ति सीधी भर्ती के लिए निर्धारित 33.33 प्रतिशत कोटे के अंतर्गत की जा सकेगी। इसके लिए एमबीबीएस और पोस्टग्रेजुएट परीक्षाओं में प्राप्त अंकों के आधार पर मेरिट तैयार करने तथा लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के बिना चयन करने का प्रस्ताव है।
मुख्यमंत्री ने शिमला स्थित इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज और टांडा मेडिकल कॉलेज में जेरियाट्रिक मेडिसिन विभाग स्थापित करने की घोषणा भी की है। इन विभागों का उद्देश्य बुजुर्ग मरीजों के लिए विशेष चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार करना है।
फिलहाल हिमाचल मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन की मांग है कि राज्य सरकार नीति संशोधन के संभावित प्रभावों का आकलन करे और वरिष्ठ चिकित्सकों के हितों को ध्यान में रखकर निर्णय ले। संगठन की ओर से उठाई गई चिंताओं में सेवा अवधि, पात्रता और उच्च शिक्षा के समान अवसर प्रमुख विषय हैं।
अब स्वास्थ्य विभाग के सामने जॉब ट्रेनी डॉक्टरों के लिए नए अवसर उपलब्ध कराने के साथ पहले से सेवाएं दे रहे चिकित्सकों के अधिकारों और पात्रता को संतुलित करने की चुनौती है। सरकार की ओर से नीति के अंतिम प्रावधान स्पष्ट होने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि विभिन्न श्रेणियों के डॉक्टरों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
प्रदेश की चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था में प्रस्तावित यह बदलाव डॉक्टरों के पेशेवर भविष्य के साथ सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में विशेषज्ञ सेवाओं की उपलब्धता को भी प्रभावित कर सकता है। ऐसे में सरकार और चिकित्सक संगठनों के बीच संवाद को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फिलहाल एचएमओए ने राज्य सरकार से अपनी मांगों पर गंभीरता से विचार करने और ऐसी व्यवस्था बनाने का आग्रह किया है, जिसमें लंबे समय से सेवाएं दे रहे डॉक्टरों के योगदान का सम्मान हो तथा सभी पात्र चिकित्सकों को उच्च शिक्षा के न्यायसंगत अवसर मिल सकें।