हिमाचल प्रदेश के पक्ष में BBMB बिजली-बंटवारे के लंबे समय से लंबित विवाद के समाधान की ओर बढ़ने के साथ ही, मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने राज्य के जलविद्युत संसाधनों पर उसके अधिकारों से जुड़े एक और अहम मुद्दे की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया है। यह मुद्दा जोगिंदर नगर (यहाँ से लगभग 40 किमी दूर) में स्थित ऐतिहासिक 'शानन जलविद्युत परियोजना' (Shanan Hydroelectric Power House) के स्वामित्व और नियंत्रण से जुड़ा है। 'पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966' के तहत, यह परियोजना लीज (पट्टे) समझौते की अवधि खत्म होने तक पंजाब को सौंप दी गई थी।
शानन परियोजना की शुरुआत 1925 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। इसके लिए मंडी रियासत के तत्कालीन शासक राजा जोगिंदर सेन और ब्रिटिश इंजीनियर कर्नल बी.सी. बैटी के बीच 99 साल का लीज समझौता हुआ था। यह लीज मार्च 2024 में खत्म हो गई, जिसके बाद परियोजना के स्वामित्व और नियंत्रण को लेकर कानूनी विवाद शुरू हो गया है। हिमाचल प्रदेश का तर्क है कि लीज की अवधि खत्म होने के बाद यह परियोजना राज्य को वापस मिल जानी चाहिए थी। वहीं, पंजाब ने इस परियोजना पर अपना दावा पेश करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, जिससे इन पड़ोसी राज्यों के बीच एक और कानूनी टकराव की स्थिति बन गई है।
सुक्खू ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी सरकार इस मामले को पूरी मजबूती से आगे बढ़ाएगी और हिमाचल प्रदेश के जायज अधिकारों से जुड़े किसी भी मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करेगी। उन्होंने इस ऐतिहासिक पावर हाउस की बिगड़ती हालत पर भी चिंता जताई है। उनका आरोप है कि उचित रखरखाव न होने के कारण यहाँ की धरोहर इमारतें, सड़कें, ट्रैक और विशेष 'हॉलेज सिस्टम' (सामान ढोने की प्रणाली) उपेक्षा का शिकार हुए हैं।
दशकों पुराने BBMB बिजली-बंटवारे के मामले में 6 नवंबर को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, शानन विवाद का राजनीतिक महत्व और भी बढ़ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अगले 20 वर्षों में हिमाचल प्रदेश को लगभग 11,973 मिलियन यूनिट बिजली देने का निर्देश दिया है। इससे भाखड़ा-नांगल और ब्यास परियोजनाओं से उत्पन्न बिजली में अपने जायज हिस्से की हिमाचल प्रदेश की लंबे समय से चली आ रही मांग को एक बड़ा बल मिला है।
पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार, जिन्होंने 1990 में पहली बार शानन का मुद्दा उठाया था, ने 'द ट्रिब्यून' को बताया कि यह परियोजना केवल बिजली पैदा करने वाली संपत्ति नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र की इंजीनियरिंग और औद्योगिक विरासत का एक जीवंत स्मारक है। एक सदी पुरानी यह परियोजना, अपनी अनोखी पहाड़ी रेलवे और ढुलाई के बुनियादी ढांचे के साथ, पश्चिमी हिमालय में जलविद्युत विकास के इतिहास का एक उल्लेखनीय अध्याय है। उन्होंने कहा कि राज्य का दावा केवल मालिकाना हक के सवाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके ऐतिहासिक बुनियादी ढांचे का संरक्षण भी एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है। उन्होंने आरोप लगाया कि 1996 में राज्यों के पुनर्गठन के दौरान, हिमाचल प्रदेश को इस परियोजना पर उसके वैध मालिकाना हक से वंचित कर दिया गया था।
BBMB मामले में अनुकूल परिणाम मिलने के बाद, अब 'शानन' मुख्यमंत्री के राजनीतिक संकल्प की अगली बड़ी परीक्षा बनकर उभरा है। यदि फैसला पक्ष में आता है, तो इससे न केवल रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस जलविद्युत संपत्ति पर हिमाचल प्रदेश का दावा मजबूत होगा, बल्कि राज्य के सबसे विशिष्ट इंजीनियरिंग स्थलों में से एक के जीर्णोद्धार और संरक्षण का रास्ता भी साफ हो जाएगा।
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