रोहतक के PGIMS में रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग की सीनियर रेजिडेंट, डॉ. ग्रंथिका शर्मा के एक शोध को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। इस शोध में एक ऐसी दुर्लभ स्थिति के बारे में बताया गया है, जिसमें छाती के अंदर भूरे रंग की मवाद (pus) जमा हो जाती है। यह शोध इस बात पर जोर देता है कि बुखार, छाती में दर्द और भूरे रंग के बलगम जैसे लक्षणों को केवल टीबी (तपेदिक) मान लेने की गलती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ये 'थोरेसिक अमीबियासिस' (thoracic amoebiasis) के एक दुर्लभ रूप का संकेत हो सकते हैं। समय रहते सही पहचान होने पर, मरीज बिना किसी बड़ी सर्जरी के पूरी तरह ठीक हो सकते हैं।
रोहतक स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज के वाइस-चांसलर, डॉ. एच.के. अग्रवाल ने डॉ. ग्रंथिका को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। उन्होंने इस शोध को चिकित्सा विज्ञान और जन जागरूकता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। डॉ. अग्रवाल ने कहा, "आंतों से शुरू होने वाला अमीबियासिस कभी-कभी छाती तक फैल सकता है, जिससे प्ल्यूरल कैविटी (pleural cavity) में मवाद जमा हो जाती है। इस स्थिति को 'एम्पायमा' (empyema) कहा जाता है। शोध के अनुसार, ऐसे मामले बहुत ही दुर्लभ होते हैं—लगभग 250,000 लोगों में से किसी एक को ही ऐसा हो सकता है।"
रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख, डॉ. प्रेम प्रकाश गुप्ता ने इस बात पर जोर दिया कि बीमारी की जल्द पहचान और सही इलाज बहुत जरूरी है। इसके इलाज में आमतौर पर एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं और लगभग 10 दिनों तक एक ट्यूब के जरिए मवाद को बाहर निकाला जाता है। उन्होंने सलाह दी कि जिन लोगों को भूरे रंग का बलगम आए, छाती में दर्द हो या बुखार हो, उन्हें तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। डॉ. ग्रंथिका ने हाल ही में जयपुर में आयोजित 'NAPCON 2026' में अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया, जिसका शीर्षक था— "थोरेसिक अमीबियासिस का दुर्लभ रूप, जिससे एम्पायमा और पेट संबंधी जटिलताएं हो सकती हैं।"
Tags: