भिवानी। प्रदेश में लम्पी वायरस का बढ़ता प्रकोप पशुपालकों के साथ आम नागरिकों के लिए भी चिंता का कारण बन गया है। बीमारी अब गोशालाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि बेसहारा गोवंश के माध्यम से शहरों की कालोनियों और गलियों तक पहुंचती दिखाई दे रही है। अलग-अलग इलाकों से प्रतिदिन लम्पी से पीड़ित गायों के मिलने और उनकी मौत की सूचनाएं सामने आ रही हैं। स्थानीय स्तर पर अब तक 150 से अधिक गायों की मौत होने का दावा किया जा रहा है, जबकि सैकड़ों गोवंश के संक्रमित होने की आशंका जताई गई है।

स्थिति की गंभीरता के बावजूद पशुपालन विभाग की सक्रियता दिखाई नहीं देने का आरोप लगाया जा रहा है। पशुपालकों और गोसेवा से जुड़े लोगों का कहना है कि संक्रमित पशुओं की पहचान, उन्हें स्वस्थ पशुओं से अलग करने तथा समय पर उपचार उपलब्ध कराने के लिए व्यापक अभियान चलाने की जरूरत है। यदि बीमारी इसी तरह कालोनियों और गलियों में फैलती रही तो संक्रमित गायों की संख्या में और वृद्धि हो सकती है।

शहर की विभिन्न कालोनियों में बेसहारा गायों की बड़ी संख्या मौजूद रहती है। इनमें किसी गाय के संक्रमित होने पर उसकी नियमित निगरानी और उपचार की व्यवस्था नहीं हो पाती। संक्रमित गोवंश एक स्थान से दूसरे स्थान तक घूमता रहता है। इससे अन्य गायों तक बीमारी पहुंचने की आशंका बनी रहती है। सड़क पर घूमने वाली गायों की देखभाल के लिए कोई व्यक्ति सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं होने के कारण स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण बन रही है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, कई इलाकों में बीमार गायें सड़कों के किनारे, खाली भूखंडों और गलियों में पड़ी दिखाई दे रही हैं। कुछ गायों की हालत गंभीर होने के बावजूद समय पर पशु चिकित्सा सहायता नहीं पहुंचने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। लोगों का आरोप है कि संबंधित विभाग को सूचना देने के बाद भी सहायता मिलने में देरी होती है। हालांकि इन शिकायतों पर विभाग की विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

गोशालाओं में रहने वाले पशुओं की नियमित निगरानी संभव होती है, लेकिन बेसहारा गोवंश की पहचान और उपचार करना बड़ी चुनौती है। एक क्षेत्र में बीमार गाय की सूचना मिलने के बाद उसे सुरक्षित स्थान पर ले जाना, चिकित्सकीय जांच कराना और दूसरे पशुओं से अलग रखना जरूरी होता है। इसके लिए पशुपालन विभाग, नगर निकाय और गोसेवा संगठनों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है।

लम्पी से प्रभावित गायों की संख्या को लेकर अलग-अलग स्तर पर आंकड़े सामने आ रहे हैं। स्थानीय लोगों और गोसेवकों का दावा है कि सैकड़ों गाय बीमारी की चपेट में हैं और अब तक 150 से अधिक गोवंश दम तोड़ चुके हैं। इन आंकड़ों की विभागीय स्तर पर पुष्टि और सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध कराना आवश्यक है। आधिकारिक सर्वे होने पर संक्रमण की वास्तविक स्थिति और सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों की पहचान हो सकेगी।

पशुपालकों की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि गायों के बीमार होने से उनकी आजीविका प्रभावित हो सकती है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में परिवार दूध उत्पादन एवं पशुपालन पर निर्भर हैं। पशु की बीमारी से दूध उत्पादन कम होने के साथ उपचार का आर्थिक बोझ भी परिवार पर पड़ता है। संक्रमित पशु की मौत होने पर पशुपालक को बड़ी आर्थिक क्षति उठानी पड़ सकती है।

प्रभावित क्षेत्रों में पशुपालक अपने स्वस्थ पशुओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। वे चाहते हैं कि पशु चिकित्सा विभाग की टीमें घर-घर या गोशालाओं तक पहुंचकर पशुओं की जांच करें। बीमारी के लक्षण वाले पशुओं को तत्काल उपचार मिले और स्वस्थ गायों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। पशुपालकों को बीमारी की पहचान और संक्रमित पशु की देखभाल से संबंधित सही जानकारी उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है।

शहर में बेसहारा गोवंश के कारण संक्रमण पर नियंत्रण अधिक कठिन हो रहा है। सड़कों पर घूमने वाले पशुओं का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं होता। बीमार गाय एक कालोनी से दूसरी कालोनी तक पहुंच सकती है। ऐसे पशुओं को चिह्नित कर सुरक्षित आश्रय स्थल पर ले जाने और पशु चिकित्सकों की निगरानी में रखने की व्यवस्था की मांग उठ रही है।

मृत गायों के सुरक्षित निस्तारण का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। कालोनी या सार्वजनिक स्थान पर किसी गाय की मौत होने के बाद उसे जल्द हटाया जाना आवश्यक है। शव लंबे समय तक पड़ा रहने से आसपास के लोगों को परेशानी होती है और वातावरण भी प्रभावित होता है। स्थानीय निकाय और पशुपालन विभाग को ऐसी सूचनाओं पर तत्काल प्रतिक्रिया देने के लिए संयुक्त व्यवस्था बनानी होगी।

गोशालाओं में भी सतर्कता बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है। वहां आने वाले नए पशुओं की जांच, बीमार पशुओं को अलग रखने और परिसर में नियमित साफ-सफाई की व्यवस्था सुनिश्चित करना आवश्यक है। एक ही स्थान पर बड़ी संख्या में गायें रहने के कारण बीमारी फैलने की स्थिति में नुकसान अधिक हो सकता है।

स्थिति से निपटने के लिए प्रभावित क्षेत्रों का सर्वे, मोबाइल पशु चिकित्सा दलों की तैनाती और शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रभावी संपर्क व्यवस्था की मांग की जा रही है। प्रत्येक सूचना का रिकॉर्ड तैयार होने से यह पता लगाया जा सकेगा कि किस क्षेत्र में कितने पशु संक्रमित हैं, कितनों का उपचार किया गया और कितनी गायों की मौत हुई है।

पशुपालकों और गोसेवकों का आरोप है कि गंभीर स्थिति के बावजूद विभाग अनभिज्ञ बना हुआ है। उनका कहना है कि केवल शिकायत मिलने पर टीम भेजना पर्याप्त नहीं होगा। संक्रमण रोकने के लिए योजनाबद्ध अभियान, नियमित निगरानी और विभागीय अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। बीमारी से जुड़ी वास्तविक जानकारी सार्वजनिक होने से अफवाहों पर भी रोक लग सकेगी।

फिलहाल लम्पी से पीड़ित गायों की लगातार सामने आ रही मौतों ने व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि 150 से अधिक गायों की मौत और सैकड़ों पशुओं के संक्रमित होने के दावे सही हैं तो तत्काल बड़े स्तर पर कदम उठाने की आवश्यकता है। पशुपालन विभाग की ओर से विस्तृत सर्वे और आधिकारिक आंकड़े जारी होने के बाद ही बीमारी की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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