सीवन। देश में बढ़ती महंगाई के बीच आम आदमी की रसोई पर एक बार फिर अतिरिक्त बोझ पड़ने लगा है। रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली सब्जियों की कीमतों में तेजी से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों का घरेलू बजट प्रभावित हो रहा है। विभिन्न स्थानीय बाजारों में पिछले कुछ दिनों के दौरान कई सब्जियों के दाम 10 से 30 रुपये प्रति किलोग्राम तक बढ़ने की जानकारी सामने आई है। इससे पहले चीनी की कीमतों में भी भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला था। कुछ बाजारों में 45 से 50 रुपये प्रति किलो मिलने वाली चीनी 70 रुपये तक पहुंच गई थी। अब सब्जियों की कीमतें बढ़ने से घर का खर्च संभालना और मुश्किल हो गया है। खासतौर पर सीमित आय वाले परिवारों के लिए रोजाना सब्जी खरीदना भी महंगा पड़ रहा है। बाजार में ग्राहकों का कहना है कि पहले जितने पैसों में पर्याप्त सब्जियां मिल जाती थीं, अब उसी रकम में कम सामान खरीदना पड़ रहा है।

सब्जियों के दामों में 10 से 30 रुपये तक की बढ़ोतरी

रोजमर्रा की जरूरतों में शामिल हरी सब्जियों की कीमतों में अचानक तेजी देखने को मिल रही है।

स्थानीय बाजारों से मिली जानकारी के अनुसार, कई सब्जियां कुछ दिनों के भीतर 10 से 30 रुपये प्रति किलो तक महंगी हुई हैं।

इसका सीधा असर परिवारों के दैनिक खर्च पर पड़ रहा है।

खासकर उन घरों में परेशानी बढ़ी है, जहां प्रतिदिन ताजी सब्जियां खरीदी जाती हैं।

सब्जियों के दाम बढ़ने से ग्राहकों को अपनी जरूरत के अनुसार खरीदारी सीमित करनी पड़ रही है।

हालांकि, सब्जियों की कीमतें अलग-अलग शहरों, मंडियों और दुकानों में अलग हो सकती हैं।

इसलिए किसी एक बाजार की दरों को पूरे देश की कीमत नहीं माना जा सकता।

चीनी के बाद अब सब्जियों ने बढ़ाई परेशानी

सब्जियों की बढ़ती कीमतों से पहले चीनी ने भी उपभोक्ताओं को महंगाई का झटका दिया था।

सितंबर में बिहार के हाजीपुर से प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, चीनी की कीमत करीब 45 रुपये से बढ़कर 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई थी।

वहीं, अक्टूबर में हरियाणा के कैथल में दस दिनों के दौरान चीनी के दाम 51 रुपये से बढ़कर 70 रुपये प्रति किलो होने की खबर सामने आई थी।

हालांकि, चीनी की कीमतों में बाद में कुछ बाजारों में गिरावट भी दर्ज की गई।

त्योहारी मांग और आपूर्ति से जुड़ी परिस्थितियों के कारण कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखा गया है।

प्याज और टमाटर की कीमतों का भी असर

सब्जियों की महंगाई में प्याज और टमाटर जैसे रोजमर्रा के उत्पादों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

इनका उपयोग अधिकांश घरों में भोजन तैयार करने के लिए किया जाता है।

अक्टूबर के दौरान प्याज की कीमतों में सालाना आधार पर तेज वृद्धि की खबरें सामने आई हैं।

28 अक्टूबर को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में प्याज का औसत मूल्य एक वर्ष पहले की तुलना में करीब 89 प्रतिशत अधिक था।

इसी तरह टमाटर की आपूर्ति भी कुछ प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में मौसम संबंधी समस्याओं से प्रभावित हुई।

अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में कई बाजारों में टमाटर की खुदरा कीमत लगभग 50 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की जानकारी सामने आई थी।

खराब मौसम और कम आवक से बढ़ रहे दाम

सब्जियों के दाम बढ़ने के पीछे कई कारण हो सकते हैं।

मौसम में बदलाव, अधिक बारिश, कम वर्षा, फसल को नुकसान और मंडियों में कम आवक से कीमतों पर दबाव पड़ता है।

अक्टूबर की शुरुआत में लखनऊ के सब्जी बाजारों में बारिश के कारण हरी सब्जियों की आपूर्ति प्रभावित होने की खबर सामने आई थी।

वहीं, नागपुर में कम बारिश और उत्पादन प्रभावित होने के कारण सब्जियों की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया।

कृषि उत्पादों की आपूर्ति कम होने पर बाजार में उपलब्ध सामान की कीमत बढ़ सकती है।

इसके अतिरिक्त परिवहन और भंडारण संबंधी खर्च भी खुदरा कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं।

गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की बढ़ी चिंता

सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा असर सीमित आय वाले परिवारों पर पड़ता है।

ऐसे परिवार अपनी मासिक आय का बड़ा हिस्सा भोजन, किराया, बच्चों की पढ़ाई और अन्य जरूरी खर्चों पर लगाते हैं।

जब सब्जियों, दालों, तेल और अन्य खाद्य पदार्थों के दाम एक साथ बढ़ते हैं, तो घरेलू बजट पर दबाव बढ़ जाता है।

लोगों का कहना है कि पहले कम पैसों में पूरे परिवार के लिए सब्जी खरीदी जा सकती थी।

अब उसी बजट में सीमित मात्रा में सामान मिल रहा है।

कुछ परिवार महंगी सब्जियों की जगह अपेक्षाकृत सस्ते विकल्प खरीदने को प्राथमिकता दे रहे हैं।

आधा किलो सब्जी खरीदकर चलाना पड़ रहा काम

बाजारों में बढ़ती महंगाई के कारण ग्राहकों की खरीदारी की आदतों में भी बदलाव देखा जा रहा है।

लखनऊ से प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया कि पहले एक किलो सब्जी खरीदने वाले कुछ ग्राहक अब आधा किलो खरीदकर काम चला रहे हैं।

इस तरह की स्थिति सीमित बजट वाले परिवारों के लिए चुनौती बन सकती है।

हरी सब्जियों की कीमतें बढ़ने पर ग्राहकों को भोजन की योजना में बदलाव करना पड़ता है।

हालांकि, कीमतों में तेजी का असर सभी परिवारों पर समान नहीं होता।

आय, परिवार के सदस्यों की संख्या और स्थानीय बाजारों की उपलब्धता के अनुसार खर्च का दबाव अलग-अलग होता है।

भोजन की थाली भी हुई महंगी

बढ़ती खाद्य कीमतों का असर केवल सब्जियों की खरीदारी तक सीमित नहीं है।

भोजन बनाने में इस्तेमाल होने वाले चावल, खाद्य तेल और रसोई गैस की कीमतें भी घरेलू खर्च को प्रभावित करती हैं।

क्रिसिल इंटेलिजेंस के मासिक आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 में घर पर तैयार शाकाहारी थाली की अनुमानित लागत 30.80 रुपये रही।

यह एक साल पहले के 28.10 रुपये के मुकाबले करीब 10 प्रतिशत अधिक थी।

इसी अवधि में मांसाहारी थाली की अनुमानित लागत भी सालाना आधार पर लगभग छह प्रतिशत बढ़कर 59.50 रुपये पहुंच गई।

इन आंकड़ों से पता चलता है कि खाद्य महंगाई का असर पूरे भोजन की लागत पर पड़ रहा है।

सितंबर में खाद्य महंगाई 7.74 प्रतिशत पहुंची

खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों का प्रभाव महंगाई के व्यापक आंकड़ों में भी दिखाई दिया है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 में खाद्य महंगाई की दर 7.74 प्रतिशत दर्ज की गई।

अगस्त में यह दर 5.97 प्रतिशत थी।

इसी दौरान कुल खुदरा महंगाई 4.83 प्रतिशत से बढ़कर 5.54 प्रतिशत हो गई।

ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई की दर 8.06 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 7.18 प्रतिशत दर्ज की गई।

ये आंकड़े बताते हैं कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के उपभोक्ता प्रभावित हुए हैं।

त्योहारों की मांग भी कीमतों को कर सकती है प्रभावित

त्योहारी मौसम के दौरान बाजारों में खाद्य सामग्री की मांग बढ़ सकती है।

अधिक मांग और सीमित आपूर्ति की स्थिति में कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

हालांकि, सभी सब्जियों के दाम केवल त्योहारों की वजह से नहीं बढ़ते।

मौसम, उत्पादन, परिवहन और स्थानीय उपलब्धता जैसे कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सब्जियों की कीमतों में राहत के लिए मंडियों में नई फसल की नियमित आवक जरूरी होती है।

आपूर्ति बेहतर होने पर कुछ उत्पादों की कीमतों में नरमी आ सकती है।

लेकिन यह राहत कब और कितनी मिलेगी, इसका अनुमान स्थानीय बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

अब कीमतों में राहत का इंतजार

सब्जियों और अन्य जरूरी खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों ने आम परिवारों की चिंता बढ़ा दी है।

विशेष रूप से रोजाना मजदूरी करने वाले और सीमित वेतन पाने वाले परिवारों के लिए अतिरिक्त खर्च संभालना कठिन हो सकता है।

उपभोक्ताओं को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में मंडियों में सब्जियों की आवक बढ़ने से कीमतों में राहत मिलेगी।

इसके लिए आपूर्ति व्यवस्था और बाजार में उपलब्धता महत्वपूर्ण होगी।

फिलहाल कई स्थानीय बाजारों में सब्जियों की बढ़ती कीमतें घरेलू बजट पर भारी पड़ रही हैं। चीनी के बाद अब सब्जियों की महंगाई ने आम आदमी की रसोई का खर्च और बढ़ा दिया है।

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