पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने क्षेत्रीय पासपोर्ट प्राधिकरण की "घोर प्रशासनिक उदासीनता" की कड़ी आलोचना की है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को ऐसी कठोर बाधाओं में नहीं बदला जा सकता, जो नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों से "अनिश्चित काल" के लिए वंचित कर दें। यह मामला पासपोर्ट रिन्यूअल (नवीनीकरण) के एक ऐसे आवेदक से जुड़ा है, जिसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चल रहा है। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि उसने आवेदक के विदेश जाने पर कोई रोक नहीं लगाई है, फिर भी पासपोर्ट प्राधिकरण ने स्पष्ट अनुमति या 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) न होने का हवाला देकर उसके आवेदन पर कार्रवाई करने से इनकार कर दिया।
हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि यदि किसी न्यायिक आदेश का मूल उद्देश्य स्पष्ट है, तो पासपोर्ट प्राधिकरण उसमें इस्तेमाल किए गए विशिष्ट शब्दों या वाक्यांशों पर जोर नहीं दे सकता। दूसरे शब्दों में, किसी नागरिक को केवल इसलिए परेशानी नहीं उठाई जानी चाहिए क्योंकि कोई प्राधिकरण अदालत के आदेश के मूल भाव को नजरअंदाज करके केवल उसके शाब्दिक अर्थ पर अड़ा रहे। पासपोर्ट रिन्यूअल की याचिका को स्वीकार करते हुए जस्टिस कुलदीप तिवारी ने कहा, "इस अदालत के लिए इससे ज्यादा दुखद और क्या हो सकता है कि याचिकाकर्ता को पासपोर्ट प्राधिकरण और ट्रायल कोर्ट के बीच एक पेंडुलम की तरह झूलने के लिए मजबूर कर दिया गया, जबकि इसमें उसकी कोई गलती भी नहीं थी।"
जस्टिस कुलदीप तिवारी ने कहा कि ट्रायल कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणियों के बावजूद, पासपोर्ट प्राधिकरण ने एक "अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण" अपनाया। प्राधिकरण ने अदालत के आदेश को केवल इसलिए नजरअंदाज कर दिया क्योंकि उसमें अनुमति देने वाले स्पष्ट शब्द नहीं लिखे थे। कोर्ट ने यह भी बताया कि प्राधिकरण ने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि ट्रायल कोर्ट ने कहीं भी याचिकाकर्ता के आवेदन को खारिज नहीं किया था।
अदालत को प्राधिकरण का रवैया गलत क्यों लगा?
याचिकाकर्ता ने अपने वकील बीएस बेनीवाल के जरिए हिसार के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के पास जाकर पासपोर्ट रिन्यूअल के लिए अनुमति या NOC मांगी थी। 5 फरवरी, 2025 के अपने आदेश में, ट्रायल कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि आवेदक के भारत में कहीं भी या विदेश जाने पर कोई रोक नहीं लगाई गई है, इसलिए अलग से स्पष्ट अनुमति देने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
जस्टिस तिवारी ने माना कि ट्रायल कोर्ट को अनुमति या 'नो ऑब्जेक्शन' के बारे में अपनी राय और अधिक स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करनी चाहिए थी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि आदेश को पूरी तरह से और सही परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जाए, तो इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि "याचिकाकर्ता को अपना पासपोर्ट रिन्यू कराने की अनुमति देने का स्पष्ट इरादा" था। संवैधानिक सिद्धांत जस्टिस तिवारी ने कहा कि प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का उद्देश्य कानून का पालन सुनिश्चित करना है, और "इन्हें इस तरह से नहीं बदला जा सकता कि नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाए, और वह भी अनिश्चित काल के लिए"। बेंच ने आगे कहा कि न्यायिक आदेशों के बारे में यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे "अधिकारियों की इच्छा के अनुसार या उनकी पसंद की भाषा में जारी किए जाएं"।
अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए, जस्टिस तिवारी ने कहा कि अनुमति मिलने के बावजूद पासपोर्ट रिन्यूअल (नवीनीकरण) से इनकार करना एक अनुचित और अत्यधिक प्रतिबंध माना जाएगा।
पृष्ठभूमि और राहत
याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज चार FIR में से तीन में उसे बरी कर दिया गया था। अब केवल 28 जनवरी 2020 की एक FIR बची है, जो NDPS एक्ट की धारा 21 के तहत हिसार सिटी पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी। ट्रायल कोर्ट के 5 फरवरी 2025 के आदेश के बावजूद, उसके पासपोर्ट रिन्यूअल का आवेदन डेढ़ साल से अधिक समय बीत जाने पर भी किसी नतीजे तक नहीं पहुंच पाया था। उसे कानूनी कार्यवाही के एक और दौर के लिए वापस ट्रायल कोर्ट भेजने के बजाय, जस्टिस तिवारी ने पासपोर्ट अथॉरिटी को निर्देश दिया कि वे आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के चार सप्ताह के भीतर उसके आवेदन पर फैसला लें। यदि आवेदन स्वीकार कर लिया जाता है, तो पासपोर्ट जारी करने से पहले जांच अधिकारी, ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन और ट्रायल कोर्ट को सूचित करने का निर्देश दिया गया। जस्टिस तिवारी ने स्पष्ट किया कि चूंकि ट्रायल कोर्ट ने पासपोर्ट की वैधता अवधि तय नहीं की थी, इसलिए रिन्यू किया गया पासपोर्ट एक साल के लिए वैध होगा।