हिसार: गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से ‘हिंदी का मनोविज्ञान’ विषय पर एक दिवसीय व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में हिंदी विभाग के अध्यक्ष एवं साइकोलॉजी विभाग के प्रो. राकेश कुमार बहमनी ने मुख्य वक्ता के रूप में भाषा, मन और संस्कृति के अंतर्संबंध पर विस्तार से विचार रखे।

प्रो. बहमनी ने शुक्रवार को कहा कि हिंदी केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक अनुभव है। भाषा मस्तिष्क में ध्वनि से अर्थ, संदर्भ, भावना और प्रतिक्रिया तक की प्रक्रिया से गुजरती है। उन्होंने मातृभाषा में भावनाओं की तीव्रता, हिंदी में आप, तुम और तू जैसे संबोधनों के माध्यम से सामाजिक दूरी एवं संबंधों की अभिव्यक्ति तथा चाचा, मामा, जेठ, देवर आदि रिश्तों के समृद्ध शब्दकोश से सामाजिक संज्ञान के निर्माण को समझाया।

उन्होंने हिंदी के मुहावरों को लोक-मनोविज्ञान का खजाना बताते हुए कहा कि दिल टूटना, नाक कटना और कलेजा मुंह को आना जैसे मुहावरे भावनात्मक अनुभवों को शारीरिक रूपकों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। उन्होंने मन शब्द को भावना, इच्छा, विचार, स्मृति और चेतना के लोक-मानसिक प्रतिनिधित्व के रूप में प्रस्तुत किया।

साहित्य के मनोवैज्ञानिक पक्ष पर चर्चा करते हुए उन्होंने कबीर के आत्म-जागरूकता संबंधी विचारों, तुलसीदास के रामचरितमानस में प्रेम, कर्तव्य एवं नैतिक संघर्ष तथा प्रेमचंद के साहित्य में सामाजिक असमानता, पारिवारिक संबंधों और ग्रामीण मनोविज्ञान का उल्लेख किया। उन्होंने कविता को भावनात्मक स्मृति का ट्रिगर बताते हुए कहा कि आनंद, उल्लास, विषाद और वेदना जैसे हिंदी के भावनात्मक शब्द भावनात्मक बुद्धिमत्ता के विकास में सहायक हैं।

आधुनिक संदर्भ में प्रो. बहमनी ने डिजिटल युग, हिंग्लिश, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि एआई भाषा के पैटर्न समझ सकता है, लेकिन मानवीय अनुभूति का अनुभव नहीं कर सकता। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े संचार में संवेदनशील भाषा के इस्तेमाल पर भी उन्होंने जोर दिया। उन्होंने विद्यार्थियों को हिंदी के मनोविज्ञान को समझने के लिए दो छोटे प्रयोग सुझाए और इसके संज्ञानात्मक, भावनात्मक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं तकनीकी पांच आयाम बताए। उन्होंने कहा कि भाषा मनुष्य के मन का दर्पण ही नहीं, बल्कि मन के निर्माण का माध्यम भी है। हिंदी को केवल व्याकरण और साहित्य के रूप में नहीं, बल्कि सोच, भावना, पहचान और अनुभव की अभिव्यक्ति के रूप में समझने की आवश्यकता है।

प्रो. बहमनी ने इस अंतर्विषयी क्षेत्र में शोध की संभावनाओं पर चर्चा करते हुए मातृभाषा और भावना, भाषा एवं पहचान, संबोधन के मनोवैज्ञानिक निहितार्थ तथा हिंदी साहित्य के मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप के रूप में उपयोग जैसे विषयों पर विद्यार्थियों से विचार-विमर्श किया। इस अवसर पर विभाग की प्रभारी डॉ. गीतू, डॉ. शर्मीला, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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