अखंड भारत के निर्माता : फौलादी इरादे, लोहे सा जिगर और 565 रियासतों को जोड़ने वाले राष्ट्रनेता
Delhi दिल्ली। 1910 के दशक के अहमदाबाद में एक तेज-तर्रार वकील पश्चिमी सूट-बूट में सजा, सिगार का धुआँ उड़ाता और ब्रिज खेल रहा था। उस समय, यह व्यक्ति महात्मा गांधी के विचारों को अव्यावहारिक मानता और स्वतंत्रता आंदोलन को दूर का सपना समझता था। यह कहानी किसी साधारण नेता की नहीं, बल्कि सरदार वल्लभभाई पटेल की है, जिन्होंने भारत के बिखरे हुए 560 से अधिक टुकड़ों को जोड़कर अखंड राष्ट्र का निर्माण किया। 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में जन्मे पटेल का बचपन संघर्ष और कठिनाइयों से भरा था। उन्होंने 22 साल की उम्र में मैट्रिक पास की और वकालत में सफलता पाई। 1917 में महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद पटेल ने वकालत छोड़ दी और किसानों के हक की लड़ाई में कूद पड़े।
पटेल का नेतृत्व सबसे स्पष्ट रूप में 1928 के बारडोली सत्याग्रह में देखा गया। अंग्रेजी सरकार ने अकाल के बावजूद किसानों पर 22 प्रतिशत टैक्स बढ़ा दिया था। पटेल ने पूरे इलाके को छावनियों में बदलकर किसानों को संगठित किया। उनके कुशल संगठन और खुफिया तंत्र ने अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। इसी जीत के उपलक्ष्य में बारडोली की महिलाओं ने उन्हें 'सरदार' की उपाधि दी। 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन देश 565 टुकड़ों में बिखरा हुआ था। रियासतें अलग-अलग दिशा चाहती थीं। ऐसे समय में भारत को एक यथार्थवादी 'लौह पुरुष' की आवश्यकता थी। पटेल ने अपने नेतृत्व में राजाओं को कभी समझाया, कभी प्रिवी पर्स के लालच में रखा और कभी सख्त चेतावनी दी।
जूनागढ़ और हैदराबाद के विलय में उनका योगदान अहम रहा। जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान जाने की घोषणा की थी, लेकिन पटेल ने जनमत संग्रह कराकर उसे भारत में मिलाया। हैदराबाद में निजाम और रजाकार सेना ने चुनौती दी, तब पटेल ने ऑपरेशन पोलो आदेश देकर चार दिनों में रियासत को भारत में विलय कर दिया। सरदार पटेल केवल राजनीतिक रणनीतिकार ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) और पुलिस सेवा (आईपीएस) की नींव रखकर देश में स्थायी प्रशासनिक ढांचा तैयार किया। उनका 'स्टील फ्रेम' विचार यही सुनिश्चित करता था कि राजनीतिज्ञ आएंगे और जाएंगे, लेकिन प्रशासन देश को जोड़कर रखेगा।
7 नवंबर 1950 को उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू को तिब्बत और चीन की सुरक्षा चुनौतियों पर ऐतिहासिक पत्र लिखा। 15 दिसंबर 1950 को उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन उन्होंने अपने पीछे एक सशक्त और अखंड भारत छोड़ा। आज गुजरात के नर्मदा के तट पर उनकी 182 मीटर ऊंची 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है। यह सिर्फ कंक्रीट और लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की याद दिलाती है जिसने लोहे जैसी इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता से भारत को एक सूत्र में बांधा। जब भी हम कश्मीर से कन्याकुमारी तक बिना रोक-टोक यात्रा करते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि यह एकता और अखंडता सरदार पटेल की जिद, त्याग और दूरदर्शिता का परिणाम है।