गुजरात UCC बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी, अब लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी
अहमदाबाद। गुजरात में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर चल रही प्रक्रिया में अहम कदम पूरा हो गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गुजरात यूनिफॉर्म सिविल कोड बिल, 2026 को 17 सितंबर 2026 को अपनी मंजूरी दे दी थी। राष्ट्रपति भवन की आधिकारिक सूची में इस विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त राज्य विधेयकों में दर्ज किया गया है।
गुजरात विधानसभा ने मार्च 2026 में UCC विधेयक पारित किया था। इसके साथ गुजरात उत्तराखंड के बाद आधुनिक समान नागरिक संहिता से संबंधित कानून पारित करने वाला देश का दूसरा राज्य बना था। विधानसभा में मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इस विधेयक को पेश किया था। विधेयक में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत और लिव-इन संबंधों जैसे व्यक्तिगत नागरिक मामलों के लिए समान कानूनी ढांचा प्रस्तावित किया गया है।
राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने से विधेयक के लिए संवैधानिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हो गया है। हालांकि कानून के वास्तविक प्रभावी होने के लिए राज्य सरकार की ओर से आवश्यक अधिसूचना और लागू करने की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। उपलब्ध विधायी दस्तावेजों के अनुसार कानून के प्रभावी होने की तारीख राज्य सरकार की ओर से अधिसूचना के जरिए तय की जानी है। इसलिए राष्ट्रपति की स्वीकृति और कानून के जमीन पर लागू होने के बीच की प्रशासनिक प्रक्रिया को अलग-अलग समझना जरूरी है।
गुजरात UCC का उद्देश्य अलग-अलग समुदायों में व्यक्तिगत कानूनों के तहत आने वाले कुछ नागरिक मामलों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। विधेयक में विवाह और तलाक के नियमों के साथ उत्तराधिकार, विरासत और दत्तक ग्रहण जैसे विषय भी शामिल किए गए हैं। लिव-इन संबंधों के पंजीकरण को लेकर भी प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं।
विधेयक की एक महत्वपूर्ण विशेषता अनुसूचित जनजाति समुदाय से जुड़ी छूट है। अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को UCC के दायरे से बाहर रखा गया है। यह प्रावधान जनजातीय समुदायों की पारंपरिक सामाजिक और वैवाहिक प्रथाओं को ध्यान में रखकर शामिल किया गया है। विधानसभा से पारित विधेयक के प्रमुख प्रावधानों में यह छूट स्पष्ट रूप से दर्ज है।
महिला अधिकारों को लेकर भी UCC की चर्चा हुई है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने विधानसभा में विधेयक पेश करते हुए इसे समान कानूनी अधिकारों की दिशा में कदम बताया था। विधेयक में व्यक्तिगत कानून से जुड़े मामलों को एक समान कानूनी ढांचे में लाने की बात है। इसका असर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और विरासत जैसे मामलों में महिलाओं के कानूनी अधिकारों पर भी पड़ सकता है।
विधेयक में विवाह के पंजीकरण को लेकर भी प्रावधान किए गए हैं। उपलब्ध विवरण के मुताबिक सभी समुदायों के विवाहों के लिए पंजीकरण व्यवस्था प्रस्तावित है। इसका उद्देश्य विवाह से जुड़े आधिकारिक रिकॉर्ड को व्यवस्थित करना और कानूनी प्रक्रियाओं में स्पष्टता लाना है। इसके अलावा बहुविवाह जैसे मुद्दों पर भी समान नियमों की व्यवस्था का उल्लेख विधेयक में किया गया है।
लिव-इन संबंधों का नियमन गुजरात UCC के उन प्रावधानों में शामिल है, जिन पर कानून के मसौदे और विधानसभा चर्चा के दौरान विशेष ध्यान दिया गया था। ऐसे संबंधों के पंजीकरण और उनसे संबंधित कुछ कानूनी प्रक्रियाओं के लिए साझा व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। इसका उद्देश्य व्यक्तिगत संबंधों से जुड़े मामलों को एक निश्चित कानूनी ढांचे के भीतर लाना बताया गया है।
गुजरात सरकार ने UCC तैयार करने से पहले एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई ने की। समिति ने विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों, न्यायिक फैसलों और दूसरे क्षेत्रों में अपनाई गई व्यवस्थाओं का अध्ययन किया। इसके बाद उसने राज्य सरकार को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी, जिसके आधार पर विधेयक तैयार किया गया।
गुजरात विधानसभा में विधेयक पर लंबी चर्चा के बाद इसे पारित किया गया था। कानून पारित होने के बाद केंद्र स्तर पर राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए प्रक्रिया आगे बढ़ी। राष्ट्रपति भवन के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार 17 सितंबर 2026 को इस विधेयक को स्वीकृति दे दी गई। यही तारीख अब गुजरात UCC की संवैधानिक यात्रा में महत्वपूर्ण पड़ाव बन गई है।
गुजरात के मामले को उत्तराखंड के UCC से अलग चरण में समझना भी जरूरी है। उत्तराखंड देश का पहला राज्य है जिसने आधुनिक UCC को लागू किया और वहां यह कोड जनवरी 2025 में प्रभावी हुआ। गुजरात ने मार्च 2026 में विधानसभा से अपना UCC कानून पारित किया और सितंबर में राष्ट्रपति की मंजूरी प्राप्त की।
इसी दौरान असम ने भी अपना UCC कानून विधानसभा से पारित किया और उसे राष्ट्रपति की मंजूरी 29 सितंबर 2026 को मिली। राष्ट्रपति भवन के रिकॉर्ड में असम के Uniform Civil Code, Assam, 2026 की मंजूरी भी दर्ज है। इसलिए गुजरात को उत्तराखंड के बाद UCC कानून पारित करने वाला दूसरा राज्य कहना सही है, जबकि वर्तमान में राष्ट्रपति की मंजूरी प्राप्त करने वाले राज्यों की क्रमिक स्थिति अलग हो चुकी है।
UCC को लेकर देश में लंबे समय से बहस होती रही है। संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। हालांकि व्यक्तिगत कानूनों का विषय धर्म, परंपरा, सामाजिक विविधता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा होने के कारण इस पर अलग-अलग पक्षों से अलग-अलग तर्क सामने आते रहे हैं।
गुजरात सरकार की ओर से विधेयक को समान कानूनी ढांचे और नागरिक अधिकारों से जोड़कर प्रस्तुत किया गया था। वहीं विधानसभा की चर्चा के दौरान विपक्ष की ओर से इसके विभिन्न प्रावधानों और प्रभाव को लेकर सवाल उठाए गए थे। विधेयक पारित होने के बाद भी UCC को लेकर सार्वजनिक और राजनीतिक बहस जारी रही।
अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अगला महत्वपूर्ण चरण राज्य सरकार की अधिसूचना और कार्यान्वयन संबंधी नियमों का है। किस तारीख से कानून प्रभावी होगा, किन विभागों को क्या जिम्मेदारी दी जाएगी और पंजीकरण तथा अन्य प्रक्रियाओं का संचालन किस तरह होगा, इसकी तस्वीर राज्य सरकार की आगे की अधिसूचनाओं से स्पष्ट होगी।
प्रशासनिक स्तर पर विवाह पंजीकरण, उत्तराधिकार, विरासत और लिव-इन संबंधों से जुड़े रिकॉर्ड के लिए नई प्रक्रियाओं की जरूरत पड़ सकती है। संबंधित अधिकारियों और विभागों को नए कानूनी प्रावधानों के अनुरूप व्यवस्था तैयार करनी होगी। नागरिकों के लिए भी यह महत्वपूर्ण होगा कि कानून लागू होने के बाद किस मामले में कौन-सी प्रक्रिया अपनानी होगी।
महिलाओं से जुड़े मामलों में भी कानून के प्रभाव का आकलन उसके लागू होने के बाद सामने आएगा। विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार से संबंधित अधिकारों में समान नियम लागू होने की स्थिति में अदालतों और प्रशासनिक संस्थाओं के सामने मामलों को नए कानूनी ढांचे के अनुसार देखने की जरूरत होगी।
अनुसूचित जनजातियों को कानून से बाहर रखने के प्रावधान के कारण गुजरात में UCC का स्वरूप राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता के अनुरूप बनाया गया है। इसका अर्थ है कि राज्य के सभी लोगों पर एक समान नियम लागू होने के बजाय कानून में स्पष्ट रूप से निर्धारित अपवाद भी मौजूद हैं।
फिलहाल गुजरात UCC की संवैधानिक प्रक्रिया का एक अहम चरण पूरा हो चुका है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 17 सितंबर को विधेयक को मंजूरी दी और अब राज्य सरकार के सामने इसे लागू करने से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी करने की जिम्मेदारी है।
गुजरात के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य ने उत्तराखंड के बाद UCC संबंधी कानून पारित किया था। अब राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद कानून को प्रभावी बनाने की अगली प्रक्रिया शुरू होगी। इसमें अधिसूचना, नियम और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े फैसले शामिल होंगे। आने वाले समय में इन्हीं कदमों से स्पष्ट होगा कि गुजरात में समान नागरिक संहिता किस तारीख और किस व्यवस्था के तहत पूरी तरह लागू होती है।