विक्रांत से उड़ान की तैयारी, गोवा में राफेल मरीन का ट्रायल शुरू
गोवा में संचालन की तैयारियां तेज
नई दिल्ली: भारतीय नौसेना ने विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत से राफेल मरीन लड़ाकू विमान के संचालन की तैयारी तेज कर दी है। इसी सिलसिले में गोवा में विमान के परीक्षण किए जा रहे हैं। रक्षा अधिकारियों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, इन परीक्षणों का उद्देश्य उन बदलावों की पुष्टि करना है, जो फ्रांसीसी विमान को भारतीय विमानवाहक पोत से संचालित करने के लिए आवश्यक हैं। यह प्रक्रिया नौसेना की समुद्र आधारित हवाई युद्ध क्षमता मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, परीक्षण शुरू होने का अर्थ विमान की तत्काल परिचालन तैनाती नहीं है।
गोवा स्थित आईएनएस हंसा की तट आधारित परीक्षण सुविधा में विमानवाहक पोत जैसी परिस्थितियों में उड़ान का मूल्यांकन किया जाता है। यहां मौजूद स्की-जंप व्यवस्था भारतीय पोतों के टेकऑफ रैंप जैसी है। इससे समुद्र में वास्तविक संचालन से पहले जमीन पर विमान के प्रदर्शन और संचालन प्रक्रियाओं को परखने में मदद मिलती है। मौजूदा परीक्षणों के साथ विमान को पोत पर रखने, उसकी आवाजाही और उपलब्ध जगह के इस्तेमाल जैसे व्यावहारिक पहलुओं का भी अध्ययन किए जाने की जानकारी सामने आई है।
विक्रांत से संचालन के लिए क्यों जरूरी हैं परीक्षण
आईएनएस विक्रांत पर लड़ाकू विमानों के संचालन के लिए स्टोबार प्रणाली इस्तेमाल होती है। इसमें विमान अपेक्षाकृत छोटी दूरी में दौड़ लगाकर स्की-जंप रैंप से उड़ान भरता है। वापसी के समय डेक पर लगे अरेस्टर वायर विमान को रोकने में मदद करते हैं। टेकऑफ और लैंडिंग की यह व्यवस्था जमीन के लंबे रनवे से अलग होती है। इसलिए विमान और पोत की प्रणालियों के बीच तालमेल सुनिश्चित करना जरूरी है। परीक्षण इसी अनुकूलता को स्थापित करने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। राफेल मरीन फ्रांस के विमानवाहक पोत शार्ल द गॉल से संचालित होता है, जहां विमान को उड़ान देने के लिए कैटापॉल्ट प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता है। भारतीय विमानवाहक पोतों की स्की-जंप व्यवस्था अलग है। गोवा में राफेल मरीन का इससे पहले वर्ष 2022 में भी मूल्यांकन हुआ था। उस समय नौसेना के नए विमान के चयन की प्रक्रिया चल रही थी। वर्तमान परीक्षण खरीद समझौते के बाद भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप संचालन की तैयारी से जुड़े हैं।
26 विमानों के लिए हुआ है समझौता
भारत और फ्रांस ने 28 अप्रैल 2025 को नौसेना के लिए 26 राफेल विमानों की खरीद का अंतरसरकारी समझौता किया था। लगभग 63 हजार करोड़ रुपये के इस पैकेज में 22 एक सीट वाले और चार दो सीट वाले विमान शामिल हैं। खरीद का उद्देश्य नौसेना को आधुनिक विमानवाहक पोत आधारित लड़ाकू क्षमता उपलब्ध कराना है। समझौते में विमानों के साथ पायलटों का प्रशिक्षण, सिम्युलेटर, हथियार, संबंधित उपकरण और रखरखाव सहायता भी शामिल है। इससे विमान प्राप्त करने के साथ उसके संचालन की आवश्यक व्यवस्था तैयार करने पर भी जोर दिया गया है।
आपूर्ति की समयसीमा को लेकर ताजा रिपोर्टों में 2028 के अंत अथवा 2029 की शुरुआत का उल्लेख है। वहीं, समझौते के समय रक्षा मंत्रालय ने सभी विमानों की डिलीवरी 2030 तक पूरी होने की जानकारी दी थी। इसलिए शुरुआती आपूर्ति, पूरे बेड़े की प्राप्ति और परिचालन तैनाती को अलग चरणों के रूप में समझना आवश्यक है। किसी विमान की परीक्षण उड़ान और नौसेना की नियमित सेवा में उसके शामिल होने के बीच प्रशिक्षण तथा तकनीकी स्वीकृतियों की प्रक्रिया भी होती है।
समुद्री अभियानों के लिए विकसित विमान
राफेल मरीन फ्रांस की दसॉ एविएशन द्वारा निर्मित राफेल लड़ाकू विमान का नौसैनिक संस्करण है। दो इंजन वाला यह विमान विभिन्न प्रकार के सैन्य अभियानों के लिए विकसित किया गया है। निर्माता के अनुसार, राफेल परिवार हवाई रक्षा, दुश्मन के विमानों के विरुद्ध कार्रवाई, टोही, जमीनी ठिकानों पर प्रहार और जहाज रोधी अभियानों जैसी भूमिकाएं निभा सकता है। फ्रांसीसी नौसेना में राफेल ने वर्ष 2004 में सेवा शुरू की थी। समुद्री वातावरण में संचालन का इसका अनुभव भारतीय नौसेना के लिए उपयोगी आधार उपलब्ध कराता है।
नौसैनिक विमान के लिए उड़ान क्षमता के साथ डेक पर सुरक्षित वापसी भी महत्वपूर्ण होती है। राफेल मरीन में विमानवाहक पोत पर उतरने के अनुरूप मजबूत लैंडिंग गियर और अरेस्टर हुक जैसे प्रावधान हैं। इसके उपकरणों में उन्नत रडार और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली शामिल हैं। यह विभिन्न प्रकार की हवा से हवा, हवा से जमीन और जहाज रोधी मिसाइलें ले जाने में सक्षम है। हालांकि, किसी अभियान में वास्तविक हथियार विन्यास मिशन की जरूरत और स्वीकृत परिचालन व्यवस्था के अनुसार तय होता है।
स्वदेशी विमानवाहक पोत की बढ़ेगी उपयोगिता
आईएनएस विक्रांत भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत है। इसे भारतीय नौसेना के युद्धपोत डिजाइन ब्यूरो ने डिजाइन किया और कोचीन शिपयार्ड ने बनाया है। दो सितंबर 2022 को इसे नौसेना में शामिल किया गया था। करीब 262 मीटर लंबे इस पोत का निर्माण भारत की युद्धपोत निर्माण क्षमता की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अब नए लड़ाकू विमान के साथ उसका एकीकरण पोत की हवाई भूमिका को आगे बढ़ाने की तैयारी है। विमानवाहक पोत की प्रभावशीलता उसके विमान, चालक दल और सहायक प्रणालियों के संयुक्त संचालन पर निर्भर करती है।
प्रशिक्षण और देश में रखरखाव पर भी जोर
राफेल समझौते में भारतीय हथियारों के एकीकरण के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का प्रावधान है। इसके अलावा विमान के ढांचे के उत्पादन तथा इंजन, सेंसर और हथियारों के रखरखाव, मरम्मत एवं ओवरहॉल सुविधाएं भारत में विकसित करने की व्यवस्था शामिल है। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, वायुसेना के राफेल और नौसेना के संस्करण में समानताओं से प्रशिक्षण तथा रसद प्रबंधन में लाभ मिल सकता है। चालक दल का प्रशिक्षण भारत और फ्रांस में होना है। इस प्रकार कार्यक्रम का दायरा विमान खरीदने से आगे तकनीकी सहायता और दीर्घकालीन संचालन तक फैला हुआ है।
गोवा के परीक्षण विमान और भारतीय विमानवाहक पोत के बीच आवश्यक तालमेल सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण चरण हैं। उपलब्ध जानकारी परीक्षण जारी होने की पुष्टि करती है, लेकिन इन्हें आधिकारिक रूप से अंतिम चरण घोषित किए जाने या विक्रांत पर नियमित तैनाती शुरू होने का स्पष्ट विवरण सामने नहीं आया है। नौसेना के लिए अगली महत्वपूर्ण उपलब्धि परीक्षणों के निष्कर्षों के आधार पर आवश्यक बदलाव पूरे करना और विमान के सुरक्षित संचालन की तैयारी आगे बढ़ाना होगी।