South Goa में 1.03 करोड़ वर्ग मीटर भूमि नो डेवलपमेंट ज़ोन घोषित

Update: 2026-06-27 04:47 GMT

GOA गोवा: गोवा सरकार ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए साउथ गोवा के साल्सेटे तालुका में 1.03 करोड़ वर्ग मीटर इकोलॉजिकल रूप से संवेदनशील भूमि को नो डेवलपमेंट ज़ोन (NDZ) के रूप में अधिसूचित किया है। इस निर्णय की जानकारी टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (TCP) मंत्री विश्वजीत राणे ने शुक्रवार को दी।

मंत्री के अनुसार, यह निर्णय रीजनल प्लान के तहत लिया गया है, जिसका उद्देश्य राज्य के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करना और अनियंत्रित निर्माण गतिविधियों पर नियंत्रण लगाना है। उन्होंने बताया कि अधिसूचित क्षेत्र में साल्सेटे तालुका के सात गांवों में फैले नमक के खेत, धान के खेत और अन्य पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील भूमि शामिल है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस अधिसूचना के तहत कुल 1.03 करोड़ वर्ग मीटर (लगभग 103.78 लाख वर्ग मीटर) भूमि को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। यह क्षेत्र विभिन्न गांवों में अलग-अलग हिस्सों में फैला हुआ है, जिनमें तलौलिम, माजोर्डा, सेराउलिम, लौटोलिम, उटोर्डा, ओरलिम और कैलाटा शामिल हैं।

इनमें सबसे बड़ा क्षेत्र तलौलिम गांव में है, जहां लगभग 29.13 लाख वर्ग मीटर भूमि को NDZ घोषित किया गया है। इसके बाद माजोर्डा में 17.64 लाख वर्ग मीटर, सेराउलिम में 16.81 लाख वर्ग मीटर, लौटोलिम में 16.71 लाख वर्ग मीटर, उटोर्डा में 9.92 लाख वर्ग मीटर, ओरलिम में 9.49 लाख वर्ग मीटर और कैलाटा में 4.08 लाख वर्ग मीटर भूमि शामिल है।

मंत्री विश्वजीत राणे ने कहा कि यह कदम गोवा के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने और तटीय क्षेत्रों के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से नमक के खेत, कृषि भूमि और जैव विविधता से जुड़ी अन्य संवेदनशील जमीनें शामिल हैं, जिन्हें संरक्षित रखना आवश्यक है।

सरकार का मानना है कि अनियंत्रित शहरीकरण और निर्माण गतिविधियों के कारण इन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ रहा था, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की आशंका थी। इसी को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है ताकि भविष्य में इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य सीमित या प्रतिबंधित किया जा सके।

अधिकारियों के अनुसार, NDZ घोषित किए जाने के बाद इन क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों पर कड़े नियम लागू होंगे। किसी भी प्रकार के विकास कार्य के लिए विशेष अनुमति और पर्यावरणीय मंजूरी की आवश्यकता होगी। इसका उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखना है।

विशेषज्ञों का कहना है कि गोवा जैसे तटीय राज्य में इस तरह के फैसले लंबे समय में पर्यावरण संरक्षण के लिए बेहद जरूरी हैं। समुद्री तटों, दलदली भूमि और कृषि क्षेत्रों की सुरक्षा से न केवल जैव विविधता बचती है, बल्कि जलवायु संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिलती है।

स्थानीय स्तर पर इस फैसले को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोग इसे पर्यावरण संरक्षण के लिए सकारात्मक कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ विकास परियोजनाओं पर इसके प्रभाव को लेकर चिंतित भी हैं। हालांकि सरकार का कहना है कि यह निर्णय दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखकर लिया गया है।

कुल मिलाकर, गोवा सरकार का यह फैसला राज्य के पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा और सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे साउथ गोवा के संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षित करने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में मदद मिलने की उम्मीद है।

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