रायपुर। जनता से रिश्ता के पाठक रोशन साहू 'मोखला' (राजनांदगांव) ने 23 जून अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस पर पंक्ति ई मेल किया है।
मिट गई मेरी माथ की लाली, टूट गईं री! चूड़ियाँ।
तिल-तिल मरती जाती,जब बढ़ती जाती दूरियाँ।।
कैसे बताऊँ कि मैं तुमको,इस पर मेरा जोर नहीं।
घुप अमावस काल रात्रि , लगता कोई भोर नहीं।।
पाँव इतने सबल नहीं कि,काल गति मोड़ सके।।
ठाँव कोई मिला नही ,जो अपनों से जोड़ सके।।
खुद को मैं निहारूँ कैसे, आईने भी तो तोड़ दिए।
समझाईश दे बंद कक्ष में,बस अकेली छोड़ दिए।।
सब कहते थे मेरे आने से,महक उठा था घर आंगन।
अब तो कोई थका नही, मेरे हिस्से अनगिन लांछन।।
मंगल सूत्र बिन मेहंदी गजरा, झुमका बाली काजल।
मांग टीका सूनी नथ बिंदी, टिकली बिछिया पायल।।
पहचानों के ही संग-संग,श्रृंगार छीन ली जाती है ।
इतना समझ पाई ये जग, रोती को ही रुलाती है।।
कोई भी शुभ मंगल बेला में, विधुर रहे तो भेद नही।
मेरे लिए ही सब भेद सही, तेरे लिए तो सभी सही।।