छत्तीसगढ़ के ट्रांसजेंडर याचिकाकर्ताओं ने संशोधन अधिनियम 2026 को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती
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New Delhi/Raipur. नई दिल्ली/रायपुर। छत्तीसगढ़ के चार ट्रांसजेंडर व्यक्तियों ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है। याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर की है और कानून के कई प्रावधानों को असंवैधानिक बताया है। याचिकाकर्ताओं में आदर्श सोरी (ट्रांस पुरुष, कोंडागांव), शालू यादव (ट्रांस महिला, भीम नगर रायपुर), मीरा (किन्नर, अंबिकापुर) और आयशा (किन्नर, सरोना रायपुर) शामिल हैं। इन सभी ने मिलकर संशोधन अधिनियम 2026 की धारा 2(ii), 2(iii), 2(iv), 3, 4, 5, 7 और 18 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है।
याचिका में कहा गया है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह संशोधन समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार को प्रभावित करता है। याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 सुप्रीम कोर्ट के 2014 के ऐतिहासिक फैसले नालसा बनाम भारत संघ का उल्लंघन करता है, जिसमें ट्रांसजेंडर समुदाय को स्वयं अपनी लिंग पहचान चुनने का अधिकार दिया गया था। इसके साथ ही 2017 के पुट्टास्वामी मामले का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नया संशोधन इन स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत है और इससे ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उनका दावा है कि यह कानून उनकी पहचान, स्वतंत्रता और गरिमा को सीमित करता है, जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अमन प्रसाद पैरवी कर रहे हैं। अधिवक्ता अमन प्रसाद संविधान और आपराधिक कानून के विशेषज्ञ माने जाते हैं और उनका मूल स्थान भिलाई, छत्तीसगढ़ है।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट में 27 अप्रैल 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया है। माना जा रहा है कि यह मामला ट्रांसजेंडर अधिकारों और उनकी कानूनी व्याख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। याचिका दायर होने के बाद ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। सामाजिक संगठनों और अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इस मामले पर नजर बनाए रखी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है और वे चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस कानून की वैधता पर पुनर्विचार करे। मामले की सुनवाई को लेकर कानूनी हलकों में भी काफी रुचि देखी जा रही है।