बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में साफ किया है कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम-2007 के तहत गठित मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल (अतिरिक्त कलेक्टर ) को जरूरत पड़ने पर बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए उनके ही घर से बेटे या रिश्तेदार को बेदखल करने का अधिकार है। अदालत ने कहा कि यह कानून सिर्फ भरण-पोषण दिलाने के लिए नहीं, बल्कि बुजुर्गों को सुरक्षित और सम्मान के साथ रहने का अधिकार दिलाने के लिए बनाया गया है।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने रायगढ़ जिले के रामदयाल साहू की याचिका खारिज करते हुए मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल (अतिरिक्त कलेक्टर ) और अपीलीय प्राधिकरण के आदेश को सही ठहराया। रायगढ़ जिले के ग्राम कंचनपुर, तहसील घरघोड़ा निवासी रामदयाल साहू ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें अपनी मां हेमकुंवर के नाम पर बने मकान का कब्जा वापस करने और घर खाली करने के निर्देश दिए गए थे।
रिकार्ड के अनुसार हेमकुंवर के नाम खसरा नंबर 321/46, रकबा 299 वर्गमीटर की आबादी भूमि का पट्टा है। इसी जमीन पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उनके नाम से मकान बनाया गया था। जांच में पाया गया कि उस मकान पर रामदयाल साहू का कब्जा था। जांच रिपोर्ट के आधार पर मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल ने 12 नवंबर 2021 को आदेश देकर बुजुर्ग मां हेमकुंवर को मकान का कब्जा वापस दिलाने के निर्देश दिए थे। यह आदेश लागू नहीं होने पर उन्होंने दोबारा मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद ट्रिब्यूनल ने 15 मई 2024 को फिर आदेश जारी कर 2021 के आदेश को लागू करने और मकान का कब्जा हेमकुंवर को दिलाने के निर्देश दिए। इसके खिलाफ रामदयाल साहू ने अपील की, लेकिन 7 अगस्त 2024 को अपीलीय प्राधिकरण ने ट्रिब्यूनल का आदेश बरकरार रखा। साथ ही रामदयाल साहू और उनके दो भाइयों को अपनी मां को 1,500-1,500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का भी आदेश दिया। इस आदेश को रामदयाल साहू ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। उसने कोर्ट में कहा कि संपत्ति पैतृक है और उसके बंटवारे तथा स्वामित्व को लेकर सिविल सूट पहले से लंबित है। इसलिए ट्रिब्यूनल को बेदखली का आदेश देने का अधिकार नहीं था।
हाईकोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक कानून का उद्देश्य बुजुर्गों को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन देना है। यदि बेटा या रिश्तेदार उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा बनता है तो ट्रिब्यूनल उन्हें घर खाली करने का आदेश दे सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल संपत्ति के मालिकाना हक का फैसला नहीं करता। वह केवल बुजुर्ग की सुरक्षा और रहने के अधिकार की रक्षा करता है। इसलिए सिविल कोर्ट में लंबित मुकदमे से ट्रिब्यूनल की कार्रवाई प्रभावित नहीं होती। हाईकोर्ट ने कहा कि मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय प्राधिकरण ने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहकर आदेश पारित किया है। इसलिए उसमें हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति के मालिकाना हक और हिस्सेदारी का अंतिम फैसला सिविल कोर्ट ही करेगा।