रायपुर। कचना स्थित अमलतास कैसल परिसर के 1008 श्री मुनि सुब्रतनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के अष्टम दिवस पर श्रद्धालुओं ने ‘उत्तम त्याग धर्म’ की भावपूर्ण आराधना की। प्रातःकाल नित्य अभिषेक, शांतिधारा एवं विधिवत पूजन के पश्चात दस लक्षण विधान संपन्न हुआ। मंदिर परिसर में दिनभर धार्मिक वातावरण बना रहा और श्रद्धालुओं ने भक्ति एवं संयम के साथ धर्माराधना की।जिन शासन की शोभा बढ़ा रहे एवं रायपुर में चौमासा कर रहे 108 श्री आगम सागर जी महाराज ससंघ के मंगल आशीर्वाद से अमलतास कैसल में पर्युषण महापर्व के दौरान व्रत एवं उपवास की साधना की पावन सरिता बह रही है। श्रद्धालु अपनी क्षमता एवं संकल्प के अनुसार उपवास, व्रत एवं संयम की साधना कर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं।
इसी क्रम में हर्षित जैन, अक्षत जैन, हिमांशु जैन, कुमारी अद्विका जैन एवं रीना जैन दस लक्षण व्रत की साधना में आनंदपूर्वक अग्रसर हैं। उनकी इस साधना से मंदिर परिसर में धर्म एवं तप की भावना को और बल मिल रहा है। उक्त जानकारी मंदिर के अध्यक्ष हिमांशु जैन ने दी।
मोह-ममता का त्याग ही आत्मशुद्धि का मार्ग
उत्तम त्याग धर्म की व्याख्या करते हुए भाई सुरेश मोदी ने कहा कि त्याग का अर्थ केवल भौतिक वस्तुओं को छोड़ देना नहीं है। वास्तविक त्याग तब होता है, जब मनुष्य अपने भीतर के मोह, ममता, लोभ, क्रोध, मान और अहंकार जैसे विकारों का त्याग करता है। बाहरी वस्तुओं का त्याग तभी सार्थक है, जब उसके साथ मन की आसक्तियों का भी क्षय हो। उन्होंने कहा कि जो त्याग मन को निर्मल करे, कषायों को शांत करे और आत्मा को परम शांति की ओर ले जाए, वही सच्चा त्याग धर्म है। मनुष्य को अपने जीवन में अनावश्यक संग्रह और आसक्ति से दूर रहते हुए संयम एवं संतोष को अपनाना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि दशलक्षण महापर्व के इस पावन अवसर पर प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर झांककर बुरे विचारों, अहंकार और अनावश्यक आसक्तियों का त्याग करने का संकल्प ले। यही आत्मशुद्धि का मार्ग है और यही उत्तम त्याग धर्म की वास्तविक भावना है।