रायपुर । हर बार प्रेस क्लब में चुनाव से पहले कोई न कोई कई विवाद चर्चा में आ ही जाता है । अब कार्यवाहक अध्यक्ष प्रफुल्ल ठाकुर के नए फरमान ने एक पत्रकारिता स्वभिमान आंदोलन को जन्म देने के लिए उकसाना शुरू कर दिया है। इस बार फिर संगठन के भीतर तनाव और असहमति को हवा में शुल्क का पेट्रोल और पुराने सदस्यों वरिष्ठ धमकी की आग में झोंकने की कोशिश की जा रही है। नए आदेश के मुताबिक, सदस्यता 15 अक्टूबर तक ली जा सकेगी। पुराने सदस्यों को ?50 की जगह ?500 का शुल्क देना होगा, जबकि नए सदस्यों के लिए ?1000 की राशि तय की गई है। यानी, सदस्यता शुल्क में 100 गुना वृद्धि कर दी गई है।
पंजीयक के आदेश को नजरअंदाज: सबसे खास बात यह है कि यह फैसला पंजीयक, फर्म्स एंड सोसायटी के उस आदेश को पूरी तरह नजरअंदाज कर लिया गया है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि नई सदस्यता पर रोक रहेगी और मौजूदा कार्यकारिणी केवल चुनाव की प्रक्रिया पूरी करेगी। अध्यक्ष का एकतरफा फरमान, महासचिव की उपेक्षा: इस पूरे प्रकरण में कार्यवाहक अध्यक्ष प्रफुल्ल ठाकुर ने अकेले हस्ताक्षर कर आदेश जारी किया है। जबकि महासचिव वैभव पांडे पहले ही सदस्यता को लेकर अलग आदेश जारी कर चुके थे, लेकिन उनके आदेश को न केवल नजरअंदाज कर दिया गया, बल्कि तानाशाही तरीके से नए फरमान को ‘अध्यक्ष का अधिकार’ बताकर लागू भी कर दिया गया। कैसा अधिकार जब पद से हटा दिया गया है मात्र कुछ दिनों के लिए कार्यवाहक है तो आदेश वाहक कैसे हो सकते है यह सवाल पत्रकारिता जगत में उठ रहा है। क्लब के कई वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि यह कदम लोकतांत्रिक परंपराओं के विपरीत है। वरिष्ठ सदस्यों ने दावा किया है कि इसके पीछे कौन है, जो प्रफुल्ल ठाकुर को अनाप-शनाप आदेश जारी करवा कर उसके कैरियर में बट्टा लगाना चाहता है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने तो यहां तक कह दिया कि जिस तरह उसने पूर्व अध्यक्षों को आरोपों के जरिए प्रेसक्लब की राजनीति से दूर कराया ठीक उसी तरह की साजिश प्रफुल्ल् के साथ हो रहा है पर प्रफुल्ल ठाकुर समझने को तैयार नहीं है वो एैसे अनाप-शनाप आदे जारी कर अपने लिए ही गड्ढा खोद रहा है। जो भविष्य में उसके लिए घातक साबित होगा । आगामी होने वाले प्रेसक्लब के चुनाव में पूरी तरह मटियामेट उसके कार्यकाल में हुए आर्थिक घोटाले पर किसी का ध्यान नहीं जाए सभी प्रफुल्ल ठाकुर को हटाने के लिए जोर आजमाइश करते रहें और वो साफ बच जाए।
उनका आरोप है कि "यह फैसला न तो कार्यकारिणी की बैठक में लिया गया, न ही किसी सर्वसम्मति से। सिर्फ अध्यक्ष के हस्ताक्षर से इसे लागू कर देना पूरी तरह से मनमानी और तुगलकी रवैया दर्शाता है।
पंजीयन विभाग के आदेश की अनदेखी: पंजीयन फर्म्स एंड सोसायटी ने 16 सितंबर 2025 को जो आदेश जारी किया था, उसमें साफ लिखा गया था कि मौजूदा कार्यकारिणी का कार्यकाल 17 फरवरी 2025 को समाप्त हो चुका है। इसके बाद अब कार्यकारिणी को केवल चुनाव की तैयारी और आयोजन करना था। ऐसे में नई सदस्यता खोलना या शुल्क में संशोधन करना पंजीयन के आदेश की अवहेलना है। कानूनी जानकारों के अनुसार, अगर यह आदेश लागू हुआ तो चुनाव प्रक्रिया ही विवादित और अवैध मानी जा सकती है। पंजीयन अधिकारी के सामने इसकी शिकायत दर्ज कराए जाने की भी तैयारी चल रही है।
?50 से ?500 तक – बिना संविधान संशोधन के छलांग: रायपुर प्रेस क्लब में सदस्यता शुल्क 2008 से ?50 तय है। इसे बढ़ाने का कोई औपचारिक संविधान संशोधन नहीं हुआ, फिर भी वर्तमान कार्यकारिणी ने इसे ?500 तक बढ़ा दिया है। यानी 100 गुना वृद्धि बिना विधिवत प्रक्रिया अपनाए कर दी गई। इतना ही नहीं 2018 से अब तक किसी सदस्य से सदस्यता शुल्क नहीं वसूला गया था। ऐसे में अब सदस्यों को पांच साल की बकाया सदस्यता भी नए रेट से देनी पड़ सकती है। इससे कई सदस्यों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा और असंतोष गहराने की संभावना है। एक सदस्य ने तो यह भी कहा कि 2018 से प्रेस क्लब की सदस्य्ता फीस नहीं ली गई है जो आज तक बढकर कुल 4000 रूपये होता है। इतनी बड़ी रकम देना हर किसी पत्रकार के लिए संभव नहीं है। प्रफुल्ल ठाकुर यही चाहते भी हैं। क्लब में भ्रम और असमंजस का माहौल: इन दो विरोधाभासी आदेशों के बाद क्लब में भ्रम की स्थिति बन गई है।एक ओर महासचिव का आदेश है जो नई सदस्यता को रोकने की बात कहता है, दूसरी ओर अध्यक्ष का आदेश है जो नई सदस्यता की तारीख और शुल्क तय करता है। कई सदस्यों का कहना है कि "यह सब जानबूझकर किया जा रहा है ताकि पुराने और निष्पक्ष मतदाताओं का प्रभाव कम किया जा सके। वहीं कुछ सदस्यों ने इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार दिया है।
अब सवाल कई... जवाब कोई नहीं: क्या कार्यकाल समाप्त कार्यकारिणी सदस्यता शुल्क बढ़ा सकती है?क्या पंजीयन विभाग के आदेश की अनदेखी वैध है?क्या यह फैसला आगामी चुनाव को प्रभावित करने की साजिश है?और क्या इस पर प्रशासन दखल देगा या फिर एक और विवाद की पटकथा लिखी जा चुकी है?फिलहाल इतना तय है कि रायपुर प्रेस क्लब का चुनाव शुरू होने से पहले ही विवादों की बाढ़ में फंस गया है। लोकतंत्र, पारदर्शिता और संगठन के मर्यादित संचालन के बीच अब ‘मनमर्जी का शासन’ साफ दिखने लगा है।
नए और पुराने सदस्यों में मतभेद पैदा कर चुनाव जीतने की साजिश
प्रेसक्लब में नए सदस्यों को लेकर पुराने और वरिष्ठ सदस्यों ने कहना है कि नए सदस्यों का कोई विरोध नहीं है न ही कोई नाराजगी नहीं है।उनका स्वागत है। पहले भी सदस्यता नियम कानून से बनाए जाते थे, पांच साल बाद उन्हें वोटिंग का अधिकार दिया जाता था, लेकिन प्रफुल्ल ठाकुर ने जो चाल चली है कि पुराने सदस्यों को हटा कर नए सदस्यों को सीधे वोटिंग लाभ के लिए किया है। जो न्यासंगत न होकर पूरी तरह असंवैधानिक है । एक दर्जन से अधिक वरिष्ठ पत्रकार जनता से रिश्ता कार्यालय में पहुंचे और नए सदस्यों के बारे में अपने विचार रखे। जबकि वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि चुनाव के बाद नए और पुराने सदस्यों को विधिवत सदस्यता दी जाएगी लेकिन वोट के लिए प्रेसक्लब को राजनीतिक अखाड़ा बनाया जा रहा है।
रायपुर प्रेस क्लब की नई कार्यकारिणी के चुनाव का रास्ता अंतत: अब साफ नजर आने लगा है पंजीयक फर्म एंड सोसाइटी ने वर्तमान प्रेस क्लब के अध्यक्ष और उनकी कार्यकारिणी को 60 दिनों के भीतर चुनाव कराने का निर्देश दिए हैं ।और अभी एक माह पूर्ण होने जा रहा है। बताया जाता है की वर्तमान कार्यकारिणी का कार्यकाल समाप्त हुए एक साल पांच माह से अधिक हो गया है इसके बाद भी निर्धारित समय पर चुनाव नहीं कराए जाने व चुनावी कागजी फाड़े जाने से प्रेस क्लब के वरिष्ठ सदस्यों /सदस्यों ने अपनी नाराजगी जताई है। सदस्यों से 1000/500 की राशि लिए जाने की शिकायत पंजीयक फर्म एंड सोसाइटी में चुनौती दी थी। जिसकी सुनवाई के बाद पंजीयक सोसाइटी ने अवैध रूप से ली जा रही सदस्यता फीस पर रोक लगा दी थी, उसके बाद भी फीस लेने की अंतिम तारीख की घोषणा भी कर दी,और सदस्यों से ये कहना कि जो भी सदस्य / सदस्यता फीस जमा नहीं करेगा उसकी सदस्यता समाप्त कर दी जाएगी। इन्होंने फर्म एंड सोसायटी के नियमों की अवहेलना की है। अवैध रूप से सदस्यता शुल्क लिए जाने से सीधा-सीधा सदस्यों के साथ छल कपट किया जा रहा है। सभी सदस्यों से विनम्रतापूर्वक आग्रह है कि माननीय फर्म एंड सोसायटी के रजिस्टार के नए आदेश को पढ़ें और स्वयं भी पालन करें और दूसरे को भी पालन करने के लिए कहे । फर्म एंड सोसायटी ने वर्तमान पूर्व अध्यक्ष और उनकी कार्यकारिणी द्वारा बनाए गए नए नियम प्रक्रिया , संविधान, नए मतदाता सूची, सामान्य सभा को निरस्त कर 60 दिनों के भीतर चुनाव करने का निर्देश दिया है ।