मेकाहारा का पुरसाने हाल नहीं

डाक्टरों का गिरोह मरीजों को अपने निजी अस्पताल में भेजने किस हद तक जा सकते यहां भर्ती होकर देख लीजिए

Update: 2025-10-30 05:38 GMT
दो डाक्टरों के इगो ने मरीज को अस्पताल से बाहर निकलवा दिया
मेकाहारा के डीन और संचालक जानकर भी इस संबंध में बेखबर
मेकाहारा में नहीं थम रहा मरीजों की दुर्गति का सिलसिला
जूनियर डाक्टरों के कोप का शिकार होना मेकाहारा में आम बात
रायपुर। प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल को इगो हट का ग्रहण लग चुका है। इगो के चक्कर में डाक्टर अपने मूल कर्तव्य से ही भटक गए है। आपस में एक दूसरे को नीचा दिखाने की आदत डाक्टरों में इतनी घर कर गई है कि वो अब मरीजों से भी इसी तरह का ट्रीट कर रहे है। मेकाहारा में इलाज कराने जाने वाले मरीज और उनके परिजनों के साथ डाक्टरों का दुर्व्यवहार थमने का नाम नहीं ले ले रहा है।
मरीज को मारपीट कर बाहर खदेड़ा
प्रदेश शासन जब छत्तीसगढ़ की जनता के लिए स्वास्थ्य संबंधित सभी सुविधाएं मेकाहारा में उपलब्ध करा रही है उसके बावजूद डाक्टरों की लापरवाही से यहां के लोगों को फायदा नहीं मिल पा रहा है।सरकार की स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओ्ं के बारे में जिक्र कर दिया तोउसकी खैर नहीं देखा जा रहा है कि जूनियर डाक्टरों की उदंडता मेकाहारा में कम होने का नाम नहीं ले रहा है। आए दिन इस तरह की घटना प्रकाश में आ रही है। यह पहला मौका नहीं है जब मरीज को मारपीट कर बाहर खदेड़ा गया हो। अस्पताल प्रबंधन इस संबंध में शिकायत होने के बाद भी गरीब मरीजों की कोई सुनवाई नहीं कर रहा है। पिछले दिनों एक मरीज के साथ भी दुर्व्यवहार किया गया। पीडि़त मरीज और उसके परिजनों ने बताया कि शारीरिक पीड़ा और लगातार बीमार रहने के कारण कामकाज नहीं मिल रहा है। मेकाहारा से दुत्कार कर भगाने के बाद उन लोग रेलवे स्टेशन जाकर गरीबों को बांटने वाले भोजन से भूख शांत किए। उन्होंने कहा कि सरकार गरीबों के लिए नि:शुल्क और सुविधाजनक इलाज कराने का दावा करती है, लेकिन मेकाहारा में तो उल्टा ही हो रहा है। यहां तो मरीजों को आधी रात को लात मार कर बाहर खदेड़ा जा रहा है। आखिर गरीब किसके पास गुहार लगाए। मिलकर जानकारी देने की आस लगाए मरीज के परिजन स्वास्थ्य मंत्री के बंगले में भी गए, जहां उन्हें मंत्री जी से मिलने ही नहीं दिया गया। वहां के निजी स्टाफ ने इंसानियत दिखाते हुए इतना जरूर कहा कि आप मेकाहारा जाइए मैं वहां तुम्हारे इलाज का प्रबंध कर देता हूं लेकिन वहां फिर वही हाल,मरीजों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। आखिर डाक्टरों के सताये मरीज कहां जाएं कुछ समझ में नहीं आ रहा है।
ग्रामीण क्षेत्र के मरीजों केइलाज में घोर लापरवाही
बेहतर इलाज के आस में गांव से लोग राजधानी आते हैं लेकिन उन्हें क्या मालूम कि मेकाहारा खुद बीमार है। शहर के मरीज तो जैसे तैसे जान पहचान निकाल कर इलाज करा लेते हैं लेकिन ग्रामीणों का पुरसाने हाल नहीं है। दूर-दराज के ग्रामीण बेहतर इलाज के लिए रायपुर स्थित मेकाहारा आते हैं लेकिन उन्हें क्या पता कि यहां सुविधा के नाम पर असुविधाओं का सामना करना पड़ेगा। प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल मेकाहारा में शासन द्वारा अति आवश्यक दवाइयों का टोटा है। धन्वंतरि मेडिकल स्टोर्स में भी अधिकतर दवाइयां नहीं मिलने की शिकायत मिलती है। अस्पतालों में लगभग कई दवाइयाँ सूची में है लेकिन मिलती मात्र कुछ ही दवाइयां है। बाकी दवाइयां बाजार में ऊंचे दामों में खरीदने के लिए मरीज और उनके परिजन मजबूर होते हैं। एक तरफ भूपेश बघेल हैं जो गरीबो की भलाई के लिए दिन रात काम कर रहे हैं और दूसरी तरफ स्वास्थ्य विभाग है जो सरकारी और निजी अस्पतालों पर नकेल कसने में पीछे है।
स्वास्थ्य विभाग की दुर्गति की वजह?
स्वास्थ्य अमले का फेल होने का प्रमुख कारण राजनेता और रसूखदार अधिकारियों के पार्टनरशिप में निजी अस्पताल चलाना है । इनके धौंस या रसूख की वजह से स्वास्थ्य विभाग का चुप रहना मज़बूरी हो सकती है लेकिन प्रश्न ये उठता है कि क्या स्वास्थ्य मंत्री भी इनके धौंस के आगे घुटने टेकने मजबूर हैं? यह असंभव है लेकिन हालत यही बयान कर रहे हैं। पूरे छत्तीसगढ़ में इन अधिकारियो के स्वामित्व वाले या पार्टनरशिप में अस्पताल चल रहे हैं। क्या यही वजह है जिसके कारण निजी अस्पताल वाले खुली लूट मचा रखे हैं। एक बार अस्पताल में घुसे यानी जिंदगी भर की कमाई इन अस्पताल मालिकों के जेब में। यह भी देखा गया है की निजी अस्पताल वाले डाक्टर वही दवाई लिखते हैं जो उनके स्वामित्व वाले मेडिकल स्टोर में उपलब्ध रहते हैं। बाजार में जो इंजेक्शन 1500 की आती है। वही इंजेक्शन 2500 रूपये में इनके द्वारा संचालित मेडिकल स्टोर में मिलते हैं। मरीज की जान को खतरा बता कर बेतहाशा कमाई करने से ये पीछे नहीं रहते।
सरकार का नाम खऱाब कर रहा स्वास्थ्य अमला
प्रदेश सरकार का नाम खराब करने में स्वास्थ्य अमला कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखना चाहता मुख्यमंत्री की योजनाओं पर स्वास्थ्य अमला ने पतीला लगाया। सरकारी अस्पताल में मरीजों को जबरदस्ती इलाज के गफलत में रखकर निजी अस्पतालों के सुझाव दिए जाते हैं क्योकि शहर के कई निजी अस्पताल छुटभैय्या नेताओं और आईपीएस अधिकारियों के रिश्तेदारों के हैं। यही वजह है कि बड़े छुटभय्ये नेताओं की और बड़े अधिकारियों के अपने निजी अस्पतालों के होने से सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज सही ढंग से नहीं किया जाता।
अस्पताल खुद बीमार
सरकारी अस्पताल में मरीजों को किसी भी तरह का बहाना बताकर जैसे-तैसे उनको निजी अस्पतालों में भेजा जाता है। ऐसा प्रदेश के सभी सरकारी अस्पतालों का हाल हो गया है। राजधानी के सबसे बड़े अस्पताल मेकाहारा को अव्यवस्थाओं का मर्ज लग गया है। यही मर्ज मरीज और उनके परिजनों को दर्द दे रहा है। हद तो तब हो जाती है जब इमरजेंसी में आए मरीजों को स्ट्रेचर तक नहीं मिल पाते। जो स्ट्रेचर हैं भी वो टूटे-फूटे हैं। यहां न केवल शहर बल्कि दूरस्थ इलाकों से और छत्तीसगढ़ के नक्सली इलाकों तक के मरीज इलाज के लिए यहां आते हैं। लेकिन, जब से अस्पताल को मेडिकल कॉलेज में तब्दील किया गया है, व्यवस्थाएं चौपट होती दिख रही है। इनमें स्टे्चर व व्हील चेयर की कमी भी शामिल है। राजधानी के सबसे बड़े अस्पताल मेकाहारा की दुर्गति किसी से छुपी नहीं है। जहां स्ट्रेचर टूटे हुए है और मरीज़ों को दर बदर की ठोकरें खानी पड़ रही है। मरीज़ों के परिजनों का कहना है कि अस्पताल में समय पर सही उपचार नहीं मिलने से बीमारी गंभीर हो रही है। इलाज की पूरी जिम्मेदारी प्रशिक्षु डॉक्टरों पर है।
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