बिलासपुर बैंक घोटाले में बड़ा खुलासा, मुख्य आरोपी विश्वजीत भौमिक न्यायिक अभिरक्षा में

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Update: 2026-07-02 15:44 GMT
Raipur/Bilaspur. रायपुर/बिलासपुर। राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ईओडब्ल्यू-एसीबी) ने बैंक ऑफ बड़ौदा में हुए बहुचर्चित बैंक घोटाले के मुख्य आरोपी विश्वजीत भौमिक को पूछताछ के बाद न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया है। आरोपी को 14 दिन की पुलिस रिमांड में पूछताछ के बाद अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेजने के आदेश दिए गए। यह कार्रवाई लगभग छह वर्ष पुराने मामले की विस्तृत जांच के बाद की गई है। आरोपी विश्वजीत भौमिक (56 वर्ष), निवासी विवेकानंद नगर मोपका, वर्तमान पता विनोबा नगर गायत्री मंदिर के पास, बिलासपुर को 18 जून 2026 को गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471, 120-बी तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 12 एवं 13(2) के तहत मामला दर्ज है।

बैंक लोन में फर्जीवाड़े का आरोप
ईओडब्ल्यू की जांच में सामने आया कि आरोपी ने वर्ष 2018 से 2019 के बीच बैंक ऑफ बड़ौदा, राजकिशोर नगर शाखा से ओवरड्राफ्ट, टर्म लोन, बैंक गारंटी और कैश क्रेडिट लिमिट के नाम पर बड़े पैमाने पर ऋण स्वीकृत कराया। जांच में यह तथ्य सामने आया कि लगभग ₹5.04 करोड़ की राशि फर्जीवाड़े और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर स्वीकृत कराई गई थी। आरोपी पर आरोप है कि उसने अपनी पत्नी और स्वयं के नाम पर कई शेल (फर्जी) फर्में बनाकर बैंक से ऋण लिया और उस राशि का दुरुपयोग किया।

फर्जी दस्तावेजों का नेटवर्क
जांच एजेंसी के अनुसार, विश्वजीत भौमिक वित्तीय सलाहकार और बैंक लोन उपलब्ध कराने के नाम पर लोगों का विश्वास जीतता था। वह ग्राहकों से आधार कार्ड, पैन कार्ड, जीएसटी दस्तावेज और संपत्ति से जुड़े कागजात प्राप्त करता था। इसके बाद उन्हीं दस्तावेजों का उपयोग अन्य फर्जी फर्मों के लोन में गारंटर या गिरवी के रूप में किया जाता था। कई मामलों में एक ही संपत्ति को अलग-अलग ऋण खातों में गिरवी दिखाया गया, जिससे बैंक को वास्तविक स्थिति का पता नहीं चल सका।

बैंक अधिकारियों की मिलीभगत का आरोप
ईओडब्ल्यू की जांच में यह भी सामने आया कि इस पूरे घोटाले में कुछ बैंक अधिकारियों की मिलीभगत भी रही। आरोप है कि ऋण स्वीकृति के बदले में उन्हें अनुचित लाभ पहुंचाया गया। इसके बाद फर्जी फर्मों के खातों में ऋण राशि डायवर्ट कर दी जाती थी। जांच में यह भी पाया गया कि खाताधारकों और गारंटरों से खाली चेक बुक पर हस्ताक्षर करवा लिए जाते थे, जिससे पूरे वित्तीय लेन-देन पर आरोपी का नियंत्रण रहता था। कई बार जानबूझकर खातों में छोटी राशि छोड़ी जाती थी ताकि ब्याज और किश्तों का भुगतान नियमित दिखे और बैंक को शक न हो। जांच टीम द्वारा किए गए निरीक्षण में किसी भी फर्म का वास्तविक व्यवसायिक अस्तित्व नहीं पाया गया। सभी फर्में केवल कागजों पर संचालित हो रही थीं और उनका उपयोग बैंक से ऋण लेने के लिए किया गया था।

न्यायिक अभिरक्षा में आरोपी
14 दिन की पुलिस रिमांड में पूछताछ के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आने के बाद आरोपी को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया। ईओडब्ल्यू ने कहा है कि मामले की जांच अभी जारी है और अन्य संलिप्त लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। अधिकारियों के अनुसार, यह मामला बैंकिंग सिस्टम में हुए बड़े स्तर के वित्तीय घोटाले का है, जिसमें संगठित तरीके से फर्जी कंपनियों और दस्तावेजों का उपयोग किया गया।
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