उच्च न्यायालय में ध्वनि प्रदूषण और लेजर लाइटिंग पर सुनवाई

छग

Update: 2025-11-17 18:57 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। प्रदेश में ध्वनि प्रदूषण को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई। सुनवाई की डिवीजन बेंच में मुख्य न्यायाधीश रमेश कुमार सिन्हा और न्यायाधीश विभु दत्त गुरु शामिल रहे। कोर्ट ने राज्य सरकार से यह पूछा कि ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण को लेकर उनका रोडमैप क्या है और कोलाहल नियंत्रण अधिनियम, 1985 में संशोधन कब किया जाएगा। महाधिवक्ता प्रफुल्ल एन भारत ने बताया कि ध्वनि प्रदूषण विनियमन एवं नियंत्रण नियम, 2000 के अनुरूप कोलाहल नियंत्रण अधिनियम, 1985 में आवश्यक संशोधन के लिए समिति गठित की गई है। समिति की बैठक हो चुकी है और जल्द ही अधिनियम में संशोधन किए जाएंगे।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने लेजर लाइटिंग के प्रभावों पर भी सवाल उठाया। याचिका में बताया गया कि लेजर लाइटिंग के कारण नागरिकों की आंखों को नुकसान हो रहा है, जिसमें रेटिना और कॉर्निया पर प्रतिकूल असर पड़ता है। हालांकि इस दावे के समर्थन में कोई वैज्ञानिक डेटा प्रस्तुत नहीं किया गया। न्यायालय ने इस विषय पर कहा कि यह मुद्दा पहले भी उठाया गया था, जैसा कि दिनांक 21 अक्टूबर 2024 के आदेश से स्पष्ट होता है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि त्योहारों और विवाह समारोहों में डीजे साउंड सिस्टम के साथ उपयोग की जाने वाली लेजर लाइट पर रोक लगाने के लिए क्या रोडमैप तैयार किया गया है।

इस पर प्रमुख सचिव (गृह) ने व्यक्तिगत शपथपत्र प्रस्तुत किया, लेकिन यह स्पष्ट हुआ कि लेजर लाइटिंग को रोकने के लिए कोई नियम या रेगुलेशन अभी तक नहीं बनाए गए हैं। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सरकार प्रायोगिक अध्ययन और वैज्ञानिक डेटा के आधार पर लेजर लाइटिंग के प्रभावों की जानकारी पेश करे। साथ ही, ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने हेतु कोलाहल नियंत्रण अधिनियम के संशोधन की स्थिति कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दिया। न्यायालय ने अगली सुनवाई की तारीख 12 दिसंबर 2025 निर्धारित की है। सुनवाई में यह
स्पष्ट किया
गया कि सरकार द्वारा उचित नियम और उपाय नहीं अपनाए गए तो त्योहारों और सार्वजनिक समारोहों में ध्वनि प्रदूषण और लेजर लाइटिंग के प्रभाव से नागरिकों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। उल्लेखनीय है कि यह मामला प्रदेश में बढ़ते ध्वनि प्रदूषण और अनियंत्रित लेजर लाइटिंग के खतरों पर न्यायालय की बढ़ती चिंता को दर्शाता है। कोर्ट ने दोनों मुद्दों पर स्पष्ट आदेश दिए हैं कि वैज्ञानिक अध्ययन और कानूनी सुधार सुनिश्चित किए जाएं ताकि नागरिक स्वास्थ्य की रक्षा हो सके और नियमन प्रभावी तरीके से लागू हो।
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