Ambikapur. अंबिकापुर। सरगुजा जिले में आदिवासी जमीन के कथित फर्जीवाड़े और कूटरचित दस्तावेजों के जरिए नामांतरण से जुड़े मामले में आरोपी आजाद इराकी को जमानत मिलने के बाद नया विवाद खड़ा हो गया है। प्रकरण में कलेक्टर अजीत बसंत की ओर से प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को पत्र लिखकर जमानत आवेदन के निराकरण की प्रक्रिया और न्यायालयीन क्षेत्राधिकार से जुड़े मुद्दे उठाए गए हैं। पत्र में अभियोजन पक्ष को सुनवाई का अवसर नहीं मिलने और अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की संभावित धारा लागू होने का उल्लेख किया गया है। मामला अंबिकापुर शहर के प्रतीक्षा बस स्टैंड के पास स्थित रिंगबांध तालाब क्षेत्र की जमीन से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार खसरा क्रमांक 3714 की जमीन को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। प्रशासनिक जांच में जमीन से जुड़े दस्तावेजों में कथित कूटरचना और आदिवासी वर्ग की भूमि को गैर-आदिवासी के नाम पर स्थानांतरित करने के आरोप सामने आए थे। इस मामले में मुख्य आरोपी आजाद इराकी को पुलिस ने रायपुर से गिरफ्तार किया था।
प्रकरण में थाना मणिपुर में अपराध क्रमांक 168/2026 के तहत बीएनएस की धारा 318(4), 338, 336(3), 340(2) और 61(2) के तहत मामला दर्ज किया गया। आरोपी आजाद इराकी को 25 सितंबर 2026 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत में पेश किया गया, जहां उसके जमानत आवेदन पर सुनवाई हुई और उसे जमानत दे दी गई। कलेक्टर की ओर से लिखे गए पत्र में जिला अभियोजन निदेशालय की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि जमानत आवेदन पर सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष को प्रभावी रूप से सुना नहीं गया। पत्र के अनुसार न्यायालयीन आदेश में शासन की ओर से एडीपीओ की उपस्थिति का उल्लेख किया गया, जबकि जिला अभियोजन कार्यालय से प्राप्त जानकारी के मुताबिक संबंधित समय पर कोई अभियोजन अधिकारी जमानत आवेदन की सुनवाई में उपस्थित नहीं था। पत्र में यह भी कहा गया है कि आरोपी की ओर से प्रस्तुत जमानत आवेदन की प्रति भी अभियोजन पक्ष को प्राप्त नहीं हुई थी।
जिला अभियोजन निदेशालय ने उस दिन ड्यूटी पर मौजूद अभियोजन अधिकारियों से लिखित जानकारी ली, जिसके आधार पर यह स्थिति सामने आने का दावा किया गया। प्रशासन की ओर से सबसे महत्वपूर्ण आपत्ति जमीन की प्रकृति और उसके कथित हस्तांतरण से जुड़ी बताई गई है। जांच में दावा किया गया कि खसरा नंबर 3714, रकबा 0.231 हेक्टेयर, पुराने अधिकार अभिलेख में अनुसूचित जनजाति वर्ग के व्यक्ति के नाम दर्ज थी। आरोप है कि कूटरचित दस्तावेजों के माध्यम से जाति संबंधी प्रविष्टि हटाई गई और आपराधिक षडयंत्र के तहत जमीन का नामांतरण गैर-आदिवासी लोगों के नाम कराया गया। इसी आधार पर पत्र में कहा गया है कि प्रकरण में प्रथम दृष्टया अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(एफ) लागू होने का प्रश्न भी उठता है। पत्र में तर्क दिया गया कि यदि यह धारा लागू होती है तो मामले की सुनवाई विशेष न्यायालय के क्षेत्राधिकार से जुड़ सकती है। हालांकि किसी अपराध में कौन सी धाराएं अंतिम रूप से लागू होंगी और किस न्यायालय को अधिकारिता होगी, इसका निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होता है।
कलेक्टर के पत्र में जमानत आदेश के खिलाफ अपील या पुनरीक्षण की आवश्यकता का भी उल्लेख किया गया है। इसी बिंदु को लेकर प्रशासनिक और कानूनी हलकों में चर्चा शुरू हुई है कि किसी जमानत आदेश पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए उचित न्यायिक प्रक्रिया क्या होनी चाहिए और प्रशासन को किस माध्यम से अपना पक्ष रखना चाहिए। मामला केवल जमानत तक सीमित नहीं है। रिंगबांध तालाब क्षेत्र की जमीन को लेकर पहले भी प्रशासनिक और आपराधिक कार्रवाई हो चुकी है। प्रशासनिक जांच में कथित फर्जी दस्तावेजों और जमीन के हस्तांतरण को लेकर आपत्तियां सामने आने के बाद आरोपी आजाद इराकी समेत अन्य लोगों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किए गए थे। पुलिस ने 25 सितंबर के आसपास उसे रायपुर से गिरफ्तार किया था। इससे पहले नगर निगम द्वारा तालाब क्षेत्र से मिट्टी हटाने की कार्रवाई के दौरान भी विवाद सामने आया था।
आरोप था कि शासकीय काम में बाधा पहुंचाई गई और अधिकारियों-कर्मचारियों को धमकाया गया। उस मामले में भी आजाद इराकी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। बाद में अग्रिम जमानत को लेकर मामला अदालत तक पहुंचा था। जमीन से जुड़े एक अन्य जांच बिंदु में राजस्व अधिकारियों ने पुराने अभिलेखों की जांच की। आरोप है कि आदिवासी वर्ग की जमीन को दस्तावेजों में बदलाव कर गैर-आदिवासी के नाम खरीदा गया। जांच प्रतिवेदन के बाद 24 सितंबर 2026 को नया आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया और पुलिस ने आरोपी को रायपुर से गिरफ्तार किया। 25 सितंबर को आरोपी को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अरिंदम नेरल की अदालत में पेश किया गया, जहां जमानत आवेदन स्वीकार कर लिया गया। इसी आदेश और इसकी प्रक्रिया को लेकर बाद में जिला प्रशासन की ओर से आपत्तियां सामने आईं। अब इस पूरे मामले में दो अलग पहलू हैं। पहला, आदिवासी जमीन के कथित फर्जी हस्तांतरण और दस्तावेजों में कूटरचना की आपराधिक जांच। दूसरा, आरोपी को जमानत दिए जाने की प्रक्रिया को लेकर प्रशासन द्वारा उठाए गए सवाल। जमानत आदेश की वैधता या उस पर पुनरीक्षण का निर्णय सक्षम न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा। फिलहाल यह मामला प्रशासनिक और न्यायिक दोनों स्तर पर चर्चा में है। आगे अभियोजन पक्ष किस न्यायिक मंच पर जमानत आदेश को चुनौती देता है और जमीन से जुड़े मूल प्रकरण की जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं, इस पर नजर बनी हुई है।