Bilaspur. बिलासपुर। सूचना के अधिकार (RTI) कानून के तहत सरकारी कर्मचारियों की निजी जानकारी और सर्विस रिकॉर्ड को लेकर बिलासपुर हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी शासकीय कर्मचारी के व्यक्तिगत दस्तावेज जैसे जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, शैक्षणिक योग्यता संबंधी दस्तावेज, नियुक्ति के समय प्रस्तुत हलफनामा और सर्विस रिकॉर्ड निजी जानकारी के दायरे में आते हैं। इन्हें सामान्य परिस्थितियों में आरटीआई के माध्यम से सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी मामले में स्पष्ट और बड़ा जनहित साबित नहीं होता है।

जन सूचना अधिकारियों को ऐसी निजी जानकारियां साझा करने से बचना चाहिए। कोर्ट ने सूचना के अधिकार कानून में व्यक्ति की निजता के अधिकार को भी महत्वपूर्ण माना है। यह मामला रायगढ़ जिले के लैलूंगा तहसील में पदस्थ पटवारी रामनाथ सिंह से जुड़ा है। रामनाथ सिंह की नियुक्ति 7 मार्च 2024 को पटवारी के पद पर हुई थी। वर्तमान में वे पटवारी हल्का नंबर 30, कामरगा में पदस्थ हैं। नियुक्ति के बाद निजी संगठन क्राइम फ्री इंडिया फोर्स की ओर से अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व)-सह-जन सूचना अधिकारी, लैलूंगा के समक्ष आरटीआई आवेदन प्रस्तुत किया गया था। आवेदन में पटवारी रामनाथ सिंह से संबंधित कई निजी दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई थी।

आरटीआई आवेदन में उनके जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, शैक्षणिक योग्यता से जुड़े दस्तावेज, नियुक्ति के समय प्रस्तुत हलफनामा और सर्विस रिकॉर्ड की प्रतियां उपलब्ध कराने की मांग की गई थी। इस आवेदन के बाद पटवारी रामनाथ सिंह ने अपनी निजी जानकारी सार्वजनिक होने की आशंका जताते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने याचिका में कहा कि आरटीआई के तहत मांगे गए दस्तावेज पूरी तरह व्यक्तिगत प्रकृति के हैं और इनका किसी सार्वजनिक गतिविधि या व्यापक जनहित से कोई सीधा संबंध नहीं है। याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की निजी जानकारी को केवल इस आधार पर सार्वजनिक नहीं किया जा सकता कि वह सरकारी कर्मचारी है।

शासकीय पद पर कार्यरत होने के बावजूद कर्मचारी को निजता का अधिकार प्राप्त है। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने माना कि सरकारी कर्मचारियों के व्यक्तिगत दस्तावेजों का संबंध उनकी निजी जानकारी से होता है। ऐसे दस्तावेजों के सार्वजनिक होने से व्यक्ति की निजता प्रभावित हो सकती है। कोर्ट ने कहा कि सूचना का अधिकार कानून पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है, लेकिन इसका उपयोग किसी व्यक्ति की निजी जानकारी प्राप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता। आरटीआई अधिनियम के तहत भी व्यक्तिगत जानकारी को कुछ परिस्थितियों में संरक्षण प्राप्त है।

हाईकोर्ट ने जन सूचना अधिकारियों को निर्देश दिया कि किसी भी कर्मचारी या व्यक्ति की निजी जानकारी उपलब्ध कराने से पहले यह देखा जाए कि क्या उस जानकारी का कोई वास्तविक और व्यापक जनहित से संबंध है। केवल जिज्ञासा या निजी उद्देश्य के लिए ऐसी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा सकती। इस फैसले को सरकारी कर्मचारियों की निजता और व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कोर्ट के निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि सरकारी सेवा में होने मात्र से किसी कर्मचारी के सभी
दस्तावेज सार्वजनिक
रिकॉर्ड नहीं बन जाते। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला आरटीआई और निजता के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में अहम है। जहां आरटीआई कानून सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करता है, वहीं व्यक्ति की निजी जानकारी की सुरक्षा भी जरूरी है। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद सरकारी विभागों के जन सूचना अधिकारियों को भी आरटीआई आवेदनों पर अधिक सावधानी बरतनी होगी और निजी दस्तावेज उपलब्ध कराने से पहले जनहित की कसौटी पर विचार करना होगा।
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