बूथ लूटने की कोशिश गंभीर अपराध, आरोप पत्र रद्द करने से हाईकोर्ट का इनकार

छग

Update: 2026-05-28 15:19 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। बिलासपुर स्थित Chhattisgarh High Court ने पंचायत चुनाव के दौरान बूथ में घुसकर उत्पात मचाने और चुनाव कार्य में बाधा डालने के मामले को गंभीर अपराध मानते हुए आरोप पत्र रद्द करने की मांग खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि 100 से 150 लोगों की भीड़ के साथ मतदान केंद्र में घुसना, ताले तोड़ना और चुनाव सामग्री छीनने की कोशिश करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला गंभीर मामला है। यह फैसला जस्टिस P. P. Sahu और जस्टिस B. D. Guru की डिवीजन बेंच ने सुनाया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पीठासीन अधिकारी और चुनाव ड्यूटी में लगे अन्य कर्मचारी शासकीय सेवक हैं, ऐसे में उनके द्वारा दुर्भावनावश झूठी शिकायत दर्ज कराने का तर्क इस स्तर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
मामला पंचायत चुनाव के दौरान बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के रामचंद्रपुर गांव के मतदान केंद्र क्रमांक 115 से जुड़ा है। शिकायतकर्ता खिलेश्वर राम ने 5 मार्च 2025 को पुलिस थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि मतदान कार्य के दौरान मोहम्मद बक्स और उसके साथ 100-150 लोग मतदान केंद्र पहुंचे और जबरन बूथ में घुस गए। शिकायत के अनुसार आरोपियों ने मतदान केंद्र के दो ताले तोड़ दिए, चुनाव ड्यूटी में लगे कर्मचारियों को गालियां दीं और चुनाव सामग्री छीनने का प्रयास किया। इस घटना से चुनाव कार्य बाधित हुआ और सरकारी कर्मचारियों को अपने कर्तव्य निभाने में परेशानी हुई।
इसी शिकायत के आधार पर पुलिस ने मोहम्मद बक्स और अन्य लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं, सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम 1984 तथा छत्तीसगढ़ स्थानीय प्राधिकरण (चुनावी अपराध) अधिनियम 1964 के तहत मामला दर्ज किया। जांच के दौरान पुलिस ने गवाहों के बयान दर्ज किए और साक्ष्य जुटाने के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी रामानुजगंज की अदालत में आरोप पत्र पेश किया। इसके बाद 13 अक्टूबर 2025 को अदालत ने मामले में संज्ञान लिया। याचिकाकर्ता मोहम्मद बक्स ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर एफआईआर, आरोप पत्र और निचली अदालत द्वारा लिए गए संज्ञान को रद्द करने की मांग की थी। उनका कहना था कि पंचायत चुनाव में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण उन्हें झूठा फंसाया गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता Amarnath Pandey ने कोर्ट को बताया कि मोहम्मद बक्स लगातार दो बार जनपद पंचायत रामचंद्रपुर के सदस्य चुने गए थे। वर्ष 2025 के पंचायत चुनाव में उन्होंने सत्ताधारी दल के उम्मीदवार को हराया था, जिसके कारण राजनीतिक विरोधियों ने पीठासीन अधिकारी के साथ मिलकर उनके खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि घटना के 10 दिन बाद एफआईआर दर्ज की गई, जबकि थाना घटनास्थल से मात्र 500 मीटर दूर था। इस देरी को आधार बनाते हुए कहा गया कि एफआईआर तत्काल दर्ज नहीं हुई, बल्कि सोच-विचार के बाद तैयार की गई कहानी है।
वहीं राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता Ashish Shukla ने कहा कि शिकायत चुनाव ड्यूटी में लगे पीठासीन अधिकारी द्वारा दर्ज कराई गई थी और जांच के बाद पर्याप्त साक्ष्य मिलने पर आरोप पत्र पेश किया गया। निचली अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद ही संज्ञान लिया है। सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट होता है कि चुनाव ड्यूटी में लगे अधिकारियों के काम में बाधा पहुंचाने और मतदान केंद्र में जबरन प्रवेश करने के आरोप गंभीर हैं। शिकायत में यह भी स्पष्ट रूप से दर्ज है कि याचिकाकर्ता ने 100-150 लोगों के साथ मतदान केंद्र में घुसकर नियमों का उल्लंघन किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता एक व्याख्याता हैं और चुनाव ड्यूटी में लगे अन्य कर्मचारी भी शिक्षक और सरकारी कर्मचारी हैं।
ऐसे में केवल राजनीतिक द्वेष का हवाला देकर शिकायत को दुर्भावनापूर्ण नहीं माना जा सकता। डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आपराधिक मामलों में कार्यवाही रद्द करने के चरण में हाई कोर्ट को मिनी ट्रायल नहीं करना चाहिए। इस स्तर पर अदालत का काम केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया अपराध बनता है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर, जांच में जुटाए गए साक्ष्य और आरोप पत्र में ऐसे तथ्य मौजूद हैं जो अपराध की ओर संकेत करते हैं। ऐसे मामलों में साक्ष्यों का मूल्यांकन ट्रायल कोर्ट द्वारा किया जाएगा। अदालत ने कहा कि आरोप पत्र और निचली अदालत के संज्ञान आदेश को रद्द करने का कोई ठोस आधार नहीं है। इसी टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। इस फैसले को चुनावी प्रक्रिया की सुरक्षा और सरकारी कर्मचारियों के कर्तव्य निर्वहन को संरक्षण देने वाले महत्वपूर्ण आदेश के रूप में देखा जा रहा है। अदालत की टिप्पणी से स्पष्ट संकेत मिला है कि चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालने, बूथ में घुसकर हंगामा करने और चुनाव सामग्री छीनने जैसी घटनाओं को न्यायालय गंभीरता से देखता है। कानूनी जानकारों के अनुसार हाई कोर्ट के इस आदेश से चुनावी हिंसा और बूथ कब्जाने जैसे मामलों में सख्त संदेश गया है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले मामलों में अदालतें नरमी नहीं बरतेंगी।
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