Bijapur. बीजापुर। “हर बहन के चेहरे पर मुस्कान, विष्णु भैया का यही अरमान।” यह भाव आज उन महिलाओं के जीवन में दिखाई दे रहा है, जिन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए शासन की योजनाएं सहारा दे रही हैं। बीजापुर के पनारापारा आंगनबाड़ी केंद्र की हितग्राही 45 वर्षीय कुमारी त्रिपाल की कहानी भी संघर्ष से स्वावलंबन तक के सफर की प्रेरणादायी मिसाल है। पति स्वर्गीय जनक त्रिपाल के निधन के बाद कुमारी त्रिपाल के सामने परिवार चलाने की बड़ी चुनौती थी। उनकी एक बेटी है, जिसका विवाह हो चुका है। घर में
कमाने वाला
कोई अन्य सदस्य नहीं होने के बावजूद उन्होंने परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी। उन्होंने मेहनत को अपना सहारा बनाया और छोटी-सी सब्जी की दुकान शुरू की। कुमारी त्रिपाल की दिनचर्या सुबह करीब 4 बजे शुरू होती है। वे मंडी जाकर सब्जियां खरीदती हैं और उन्हें अपनी दुकान तक लाकर दिनभर बिक्री करती हैं। सीमित आमदनी और बढ़ती महंगाई के बीच घर का खर्च चलाना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने मेहनत जारी रखी। इसी संघर्ष के बीच महतारी वंदन योजना उनके लिए आर्थिक संबल बनकर आई।

योजना के तहत उन्हें हर महीने 1000 रुपये की राशि सीधे बैंक खाते में प्राप्त हो रही है। इस राशि का उपयोग वे सब्जी खरीदने और व्यवसाय को सुचारू रूप से चलाने में कर रही हैं। कुमारी त्रिपाल भावुक होकर कहती हैं, “पति के जाने के बाद लगा था कि अब कोई सहारा नहीं है। लेकिन विष्णु भैया ने बड़े भाई की तरह साथ दिया। हर महीने मिलने वाले 1000 रुपये मेरे लिए बहुत बड़ा सहारा हैं। इससे मैं दुकान के लिए सब्जी ला पाती हूं और कुछ राशि बचा भी लेती हूं। इससे मुझे सम्मान के साथ अपना जीवन चलाने की हिम्मत मिली है।” आज कुमारी त्रिपाल अपनी मेहनत से सब्जी का व्यवसाय चला रही हैं और किसी के आगे हाथ फैलाए बिना आत्मसम्मान के साथ जीवन यापन कर रही हैं। महतारी वंदन योजना से मिली आर्थिक सहायता ने उनके संघर्ष को मजबूती दी है और उन्हें स्वावलंबन की राह पर आगे बढ़ने का अवसर दिया है। कुमारी त्रिपाल की कहानी यह संदेश देती है कि छोटी-सी आर्थिक सहायता भी यदि सही दिशा में उपयोग की जाए तो वह आत्मनिर्भरता की बड़ी शुरुआत बन सकती है। उनका संघर्ष और हौसला अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा है। “राखी का धागा, भरोसे का साथ-विष्णु भैया संग विकास की बात।” यही भाव महतारी वंदन योजना से जुड़ी उन महिलाओं की कहानियों में दिखाई देता है, जो अपने संघर्ष को अपनी ताकत बनाकर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही हैं। “बहनों की तरक्की, परिवार की शानकृविष्णु भैया का यही अभियान।”
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