गंगा में मछली पकड़ने गए थे युवक जाल में फंसे बड़े जलीय जीव को देख उड़े होश
बिहार : भोजपुर जिले में गंगा नदी में मछली पकड़ने गए मछुआरे उस समय हैरान रह गए जब उनके जाल में एक बड़ा जलीय सरीसृप फंस गया। घटना बबुरा थाना क्षेत्र के कपूरदियारा गंगा घाट की बताई गई है। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार मछुआरों ने नदी में जाल डाला था। उसे खींचते समय वजन अधिक महसूस हुआ तो उन्हें लगा कि अच्छी संख्या में मछलियां फंसी हैं। लेकिन जाल बाहर आने पर उसमें मगरमच्छ जैसा जीव दिखाई दिया। घटना की जानकारी फैलते ही आसपास के लोग घाट पर पहुंच गए।
इस घटना से जुड़े दिए गए विवरण में जीव को लगभग छह फीट लंबा घड़ियाल बताया गया है। हालांकि, उपलब्ध स्थानीय समाचार रिपोर्ट में इसे मगरमच्छ कहा गया है। इसकी लंबाई और प्रजाति की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए वन विभाग की पहचान सामने आने तक इसे निश्चित रूप से छह फीट का घड़ियाल कहना जल्दबाजी होगी। घड़ियाल और मगरमच्छ अलग प्रजातियां हैं, जिनकी पहचान के लिए शरीर और विशेष रूप से थूथन की बनावट देखी जाती है।
स्थानीय समाचार के मुताबिक घटना की सूचना प्रशासन और वन विभाग को दी गई। इसके बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और जीव को सुरक्षित निकालने की प्रक्रिया शुरू की गई। रिपोर्ट में उसे वापस पानी में छोड़ने की तैयारी का उल्लेख है। हालांकि, बचाव अभियान पूरा होने और उसे छोड़े जाने की अंतिम पुष्टि उपलब्ध नहीं है। ऐसे में सुरक्षित रिहाई को पूरा हो चुका घटनाक्रम बताने के बजाय विभाग की कार्रवाई के अंतिम विवरण का इंतजार जरूरी है।
गंगा और उससे जुड़ी नदियां कई तरह के जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास हैं। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की जानकारी के अनुसार मगरमच्छ की मगर प्रजाति गंगा के जलग्रहण क्षेत्र में भी पाई जाती है। बिहार और झारखंड के मध्य गंगा क्षेत्र में इसकी मौजूदगी दर्ज है। इसलिए किसी नदी में ऐसे जीव का दिखाई देना अपने आप में उसके रास्ता भटकने या कहीं से छोड़े जाने का प्रमाण नहीं होता। इस घटना में भी जीव के वहां पहुंचने का कारण सामने नहीं आया है।
घड़ियाल की सबसे प्रमुख पहचान उसका लंबा और संकरा थूथन है। यह मुख्य रूप से मछलियां खाने के अनुकूल होता है। इसके मुकाबले मगरमच्छ की मगर प्रजाति का थूथन अपेक्षाकृत चौड़ा होता है। आम बोलचाल में दोनों नाम अक्सर एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल कर दिए जाते हैं, लेकिन खबर लिखते समय यह फर्क महत्वपूर्ण है। केवल आकार बड़ा होने या नदी में मिलने के आधार पर किसी जीव को घड़ियाल नहीं कहा जा सकता। पहचान स्पष्ट होने से उसके व्यवहार और संरक्षण की जरूरतों को भी बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
मछली पकड़ने के जाल जलीय सरीसृपों के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। जाल में उलझने से उनकी आवाजाही बाधित होती है और सांस लेने के लिए सतह तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन भी मछली पकड़ने के उपकरणों में उलझने और डूबने को इन जीवों के सामने मौजूद खतरों में गिनता है। इसलिए ऐसे मामले में बचाव का उद्देश्य आसपास मौजूद लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ जीव को भी अनावश्यक चोट से बचाना होना चाहिए।
ऐसी परिस्थिति में लोगों के लिए सबसे उपयोगी कदम सुरक्षित दूरी बनाए रखना और प्रशिक्षित बचाव दल को काम करने देना है। जीव को छूने, उसके जबड़े पकड़ने, रस्सी से खींचने या तस्वीर लेने के लिए करीब जाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। जाल में फंसे वन्यजीव की हरकतों का अनुमान लगाना कठिन हो सकता है। मौके पर भीड़ कम रहने से बचावकर्मियों के लिए स्थिति संभालना आसान होता है। किसी व्यक्ति को अपने स्तर पर पकड़ने या दूसरी जगह छोड़ने की कोशिश करने के बजाय स्थानीय वन विभाग को सूचना देनी चाहिए।
भोजपुर की घटना में अब वन विभाग के अंतिम विवरण से ही स्पष्ट होगा कि पकड़ा गया जीव किस प्रजाति का था और बचाव के बाद उसे कहां छोड़ा गया। फिलहाल पुष्ट स्थानीय जानकारी मछुआरों के जाल में एक बड़े जलीय जीव के फंसने और वन विभाग के हस्तक्षेप तक सीमित है। छह फीट लंबाई, घड़ियाल की पहचान और सफल रिहाई जैसे विवरणों की पुष्टि मिलने पर ही उन्हें अंतिम तथ्य के रूप में प्रकाशित करना उचित होगा।