बांका। शिक्षा केवल किताबों का ज्ञान देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में बदलाव लाने की एक बड़ी ताकत भी है। बिहार के बांका जिले के बिदायडीह गांव की प्रधान शिक्षिका खुशबू कुमारी ने अपने प्रयासों से इस बात को साबित किया है। सीमित संसाधनों और सामाजिक चुनौतियों के बीच उन्होंने सरकारी विद्यालय में शिक्षा की ऐसी व्यवस्था विकसित की, जिसने बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने के साथ सामाजिक समरसता को भी बढ़ावा दिया। उनकी गतिविधि आधारित शिक्षण पद्धति, नवाचार और सामुदायिक सहभागिता को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। शिक्षक दिवस के अवसर पर 5 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 से सम्मानित किया। इस उपलब्धि से बांका जिले के शिक्षा जगत में खुशी का माहौल है।

राष्ट्रपति के हाथों मिला राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार

खुशबू कुमारी बांका जिले के कटोरिया प्रखंड स्थित उर्दू प्राथमिक विद्यालय बिदायडीह में प्रधान शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं।

उन्हें बच्चों को रोचक तरीके से पढ़ाने, विद्यालय में उपस्थिति बढ़ाने और सामाजिक सहभागिता को प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया।

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए बिहार से दो शिक्षिकाओं का चयन किया गया था। इनमें बांका की खुशबू कुमारी और गोपालगंज की पुष्पा प्रसाद शामिल थीं।

इस सम्मान के साथ खुशबू कुमारी की शिक्षण पद्धति को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।

गांव की सामाजिक चुनौतियों को बनाया बदलाव का अवसर

बिदायडीह गांव में शिक्षा के साथ कई सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां भी मौजूद थीं।

रिपोर्टों के अनुसार, गांव में आर्थिक रूप से कमजोर और विभिन्न समुदायों से जुड़े परिवार रहते हैं।

ऐसे माहौल में बच्चों को नियमित विद्यालय भेजना और उनमें शिक्षा के प्रति रुचि विकसित करना महत्वपूर्ण चुनौती थी।

खुशबू कुमारी ने इन परिस्थितियों को समझते हुए केवल कक्षा में पढ़ाने तक अपनी जिम्मेदारी सीमित नहीं रखी।

उन्होंने अभिभावकों से संवाद किया और उन्हें बच्चों की शिक्षा के महत्व के बारे में जागरूक किया।

इसके साथ ही विद्यालय को ऐसा वातावरण देने का प्रयास किया, जहां सभी बच्चे बिना भेदभाव के एक साथ पढ़ सकें।

गतिविधियों से पढ़ाई को बनाया आसान

खुशबू कुमारी की शिक्षण शैली की सबसे बड़ी विशेषता गतिविधि आधारित पढ़ाई है।

उन्होंने बच्चों को केवल पाठ्यपुस्तकों से पढ़ाने के बजाय खेल, गीत और शारीरिक गतिविधियों का उपयोग किया।

बच्चों को उंगलियों की सहायता से पहाड़े याद कराना और शरीर की गतिविधियों के माध्यम से हिंदी की मात्राएं समझाना उनकी शिक्षण पद्धति का हिस्सा है।

इस तरीके से कठिन विषयों को सरल और मनोरंजक बनाने का प्रयास किया गया।

उनकी कक्षाओं में बच्चों की सक्रिय भागीदारी पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

शिक्षण के इन नवाचारों ने विद्यार्थियों में सीखने के प्रति रुचि बढ़ाने में मदद की।

स्कूल नहीं आने वाले बच्चों के घर पहुंचीं शिक्षिका

खुशबू कुमारी ने विद्यालय में विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने को भी प्राथमिकता दी।

रिपोर्टों के अनुसार, जो बच्चे स्कूल नहीं आते थे, उनके अभिभावकों से वह स्वयं संपर्क करती थीं।

जरूरत पड़ने पर शाम के समय विद्यार्थियों के घर जाकर उनकी अनुपस्थिति का कारण जानने का प्रयास करती थीं।

उनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि आर्थिक या पारिवारिक परिस्थितियों के कारण किसी बच्चे की पढ़ाई प्रभावित न हो।

उन्होंने मजदूरी करने वाले परिवारों से भी संपर्क किया और उन्हें बच्चों को नियमित विद्यालय भेजने के लिए प्रेरित किया।

इन प्रयासों से विद्यालय में बच्चों की उपस्थिति और शैक्षणिक गतिविधियों में भागीदारी बेहतर हुई।

बच्चों के पहनावे और अनुशासन पर भी ध्यान

विद्यालय में शिक्षा के साथ बच्चों के आत्मविश्वास और अनुशासन को बढ़ावा देने के लिए भी प्रयास किए गए।

खुशबू कुमारी ने अभिभावकों को बच्चों को साफ-सुथरी स्कूल यूनिफॉर्म में भेजने के लिए प्रेरित किया।

रिपोर्टों के अनुसार, उनके प्रयासों के बाद विद्यालय के विद्यार्थी निर्धारित ड्रेस, टाई, बेल्ट, जूते-मोजे और पहचान पत्र के साथ विद्यालय आने लगे।

इस बदलाव ने बच्चों में विद्यालय के प्रति अपनापन और आत्मसम्मान की भावना विकसित करने में मदद की।

विद्यालय का वातावरण सुधारने के प्रयासों को अभिभावकों का सहयोग भी मिला।

सामाजिक समरसता की भी बनी मिसाल

खुशबू कुमारी के कार्यों का एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना रहा है।

उन्होंने अलग-अलग सामाजिक और धार्मिक पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों को एक साथ सीखने का अवसर देने पर जोर दिया।

उनके लिए विद्यालय ऐसा स्थान है, जहां बच्चों की पहचान उनकी सीखने की क्षमता और प्रतिभा से होनी चाहिए।

इसी सोच के साथ उन्होंने विद्यार्थियों के बीच सहयोग और आपसी सम्मान की भावना विकसित करने का प्रयास किया।

बिदायडीह में शिक्षा के माध्यम से सामाजिक दूरी कम करने की इस पहल को भी राष्ट्रीय पुरस्कार के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया।

विद्यालय तक पहुंच की परेशानी भी दूर कराई

बच्चों की शिक्षा में केवल पढ़ाई का तरीका ही नहीं, विद्यालय तक सुरक्षित पहुंच भी महत्वपूर्ण होती है।

बिदायडीह में कुछ विद्यार्थियों को स्कूल आने के रास्ते में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।

स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, खुशबू कुमारी ने बच्चों की आवाजाही आसान बनाने के लिए नदी पर डायवर्सन बनवाने की पहल की।

इससे विद्यार्थियों के विद्यालय पहुंचने में होने वाली परेशानी कम करने का प्रयास किया गया।

यह पहल दर्शाती है कि उन्होंने शिक्षा से जुड़ी व्यावहारिक समस्याओं को भी प्राथमिकता दी।

12 वर्षों के शिक्षण अनुभव को मिली पहचान

खुशबू कुमारी लंबे समय से शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हैं।

उन्होंने लगभग 11 वर्ष तक कटोरिया प्रखंड के मध्य विद्यालय कठौन में शिक्षक के रूप में सेवाएं दीं।

इसके बाद बिदायडीह विद्यालय में प्रधान शिक्षिका के रूप में जिम्मेदारी संभाली।

इस दौरान उन्होंने बच्चों को पढ़ाने के लिए नए तरीके अपनाने और विद्यालय के शैक्षणिक वातावरण को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया।

उनके करीब 12 वर्षों के शिक्षण अनुभव और प्रयासों को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के माध्यम से सम्मान मिला।

वर्ष 2024 में भी उनके शिक्षण कार्य को राज्यस्तरीय सम्मान प्राप्त हुआ था।

परिवार का भी मिला सहयोग

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार मिलने के बाद खुशबू कुमारी ने अपनी सफलता का श्रेय केवल व्यक्तिगत मेहनत को नहीं दिया।

उन्होंने अपने परिवार और विद्यालय से जुड़े लोगों के सहयोग को भी महत्वपूर्ण बताया।

विशेष रूप से अपने पति मनीष कुमार आनंद के सहयोग का उल्लेख किया।

मनीष कुमार आनंद भी बांका जिले में प्रधान शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं।

खुशबू कुमारी के अनुसार, परिवार के सहयोग और बच्चों के प्रति जिम्मेदारी ने उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर बेहतर काम करने के लिए प्रेरित किया।

बांका जिले की पहली महिला शिक्षिका को मिला सम्मान

खुशबू कुमारी राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार प्राप्त करने वाली बांका जिले की पहली महिला शिक्षिका बनी हैं।

उनकी इस उपलब्धि को जिले के शिक्षा जगत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलने से सरकारी विद्यालयों में काम करने वाले अन्य शिक्षकों को भी प्रेरणा मिल सकती है।

खुशबू कुमारी ने दिखाया कि संसाधनों की सीमाओं के बावजूद शिक्षण में नवाचार और अभिभावकों की भागीदारी से विद्यालय का वातावरण बदला जा सकता है।

उनकी सफलता सरकारी शिक्षा व्यवस्था में समर्पित शिक्षकों की भूमिका को भी सामने लाती है।

राष्ट्रीय पुरस्कार से बढ़ी जिम्मेदारी

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार मिलने के बाद खुशबू कुमारी ने कहा कि सम्मान मिलने से खुशी के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है।

उनके लिए यह पुरस्कार शिक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रयासों को आगे जारी रखने की प्रेरणा है।

बच्चों के लिए बेहतर शिक्षण वातावरण तैयार करना और पढ़ाई को आनंददायक बनाना उनके कार्यों की प्राथमिकता रही है।

उनका अनुभव बताता है कि शिक्षक की भूमिका केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित नहीं होती।

विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, अनुशासन और सामाजिक सहयोग की भावना विकसित करना भी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

शिक्षा से समाज बदलने की प्रेरक कहानी

बांका जिले के बिदायडीह गांव की प्रधान शिक्षिका खुशबू कुमारी की उपलब्धि ग्रामीण शिक्षा में सकारात्मक बदलाव का उदाहरण है।

उन्होंने गतिविधि आधारित शिक्षण, अभिभावकों से संवाद, बच्चों की नियमित उपस्थिति और सामाजिक समरसता को प्राथमिकता दी।

उनके प्रयासों को शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 से सम्मानित किया।

खुशबू कुमारी की

यह उपलब्धि बताती है कि समर्पण, नवाचार और सामुदायिक सहयोग से एक सरकारी विद्यालय को बच्चों के लिए बेहतर शिक्षण केंद्र बनाया जा सकता है। उनके कार्यों ने न केवल बिदायडीह विद्यालय, बल्कि पूरे बांका जिले को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है।

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