भागलपुर: बिहार के भागलपुर में नाबालिग लड़की के कथित अपहरण से जुड़े मामले में पुलिस की जांच और मेडिकल रिपोर्ट को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। बरामदगी के बाद हुई पहली मेडिकल जांच में लड़की को गर्भवती नहीं बताया गया था, जबकि दो दिन बाद कराई गई दूसरी जांच में गर्भावस्था की पुष्टि होने की बात सामने आई। दोनों रिपोर्ट में विरोधाभास देखकर अदालत ने नाराजगी जताई और जांच अधिकारी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। अदालत ने नाबालिग से जुड़े मामले में पॉक्सो एक्ट की धाराएं नहीं लगाने को लेकर भी जवाब मांगा है। मामला भागलपुर के तिलकामांझी थाना क्षेत्र से जुड़ा है। यहां एक नाबालिग लड़की के अपहरण की शिकायत दर्ज कराई गई थी। पुलिस ने 14 अगस्त 2026 को लड़की को बरामद किया था। इसके बाद जांच अधिकारी ने उसका मेडिकल परीक्षण कराया।
पहली मेडिकल रिपोर्ट में लड़की के गर्भवती नहीं होने की जानकारी दी गई। इसके आधार पर न्यायिक प्रक्रिया के तहत उसे बालिका गृह भेजने का आदेश दिया गया। बालिका गृह में प्रवेश से पहले नियमों के अनुसार दोबारा स्वास्थ्य परीक्षण कराया गया। इस बार आई मेडिकल रिपोर्ट में लड़की के गर्भवती होने की बात सामने आई।
दो दिनों में गर्भधारण नहीं, मेडिकल रिपोर्ट में विरोधाभास का मामला
दोनों मेडिकल रिपोर्ट अदालत में पहुंचने के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वितीय दीपक कुमार ने गंभीर नाराजगी जताई। अदालत ने सवाल उठाया कि पहली जांच में गर्भावस्था की पुष्टि नहीं हुई, जबकि दूसरी जांच में रिपोर्ट पॉजिटिव कैसे आ गई। न्यायालय ने इस विरोधाभास को लेकर जांच अधिकारी की भूमिका पर भी सवाल किए।
यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि मामला दो दिनों में गर्भधारण होने का नहीं, बल्कि दो दिनों के अंतराल पर आई मेडिकल रिपोर्ट के अलग-अलग निष्कर्षों का है। पहली रिपोर्ट गलत थी या दूसरी जांच में कोई अन्य परिस्थिति सामने आई, इसका स्पष्ट जवाब चिकित्सीय जांच और संबंधित रिकॉर्ड के परीक्षण से ही मिल सकेगा।
नाबालिग होने के बावजूद पॉक्सो एक्ट नहीं लगाया
इस मामले में पुलिस की एक और कथित लापरवाही सामने आई है। परिजनों ने अपनी शिकायत में लड़की की उम्र 17 वर्ष बताई थी। इसके बावजूद पुलिस ने शुरुआत में सामान्य अपहरण से संबंधित मामला दर्ज किया और पॉक्सो अधिनियम की धाराएं शामिल नहीं कीं। अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि नाबालिग लड़की से जुड़े मामले में यौन अपराध की आशंका और उपलब्ध तथ्यों की समुचित जांच क्यों नहीं की गई। पॉक्सो एक्ट की कौन-सी धाराएं लागू होंगी, इसका निर्धारण पीड़िता के बयान, चिकित्सीय साक्ष्यों और अन्य जांच सामग्री के आधार पर किया जाना है।
केस डायरी जमा करने में भी हुई देरी
अदालत ने जांच अधिकारी को केस डायरी प्रस्तुत करने और जांच की स्थिति स्पष्ट करने के लिए समय दिया था। इसके बावजूद निर्धारित समय पर आवश्यक दस्तावेज पेश नहीं किए गए। पूर्व में दो अवसर दिए जाने के बाद भी संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर अदालत ने अपर लोक अभियोजक को बुलाया और मामले को भागलपुर के वरीय पुलिस अधीक्षक के संज्ञान में लाने का निर्देश दिया।
अभियोजन पक्ष की ओर से एसएसपी को पत्र भेजकर मामले की गंभीरता से अवगत कराया गया। इसके बाद मंगलवार देर शाम जांच अधिकारी ने अदालत में केस डायरी प्रस्तुत की।
पॉक्सो की धाराएं जोड़ने पर मांगा मार्गदर्शन
अदालत में पॉक्सो एक्ट की धाराएं नहीं लगाने को लेकर सवाल उठने पर जांच अधिकारी ने बताया कि इस संबंध में वरिष्ठ अधिकारियों से मार्गदर्शन लेने के लिए प्रतिवेदन दिया जाएगा। इस मामले ने पुलिस की जांच प्रक्रिया के साथ मेडिकल रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। अब यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि दोनों रिपोर्ट में अंतर किस वजह से आया और मामले में आवश्यक कानूनी प्रावधानों का पालन किया गया या नहीं।
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