गिद्धों की वापसी की उम्मीद, जमुई में सुरक्षित आहार की व्यवस्था
नागी-नकटी के जंगल में गिद्धों के लिए बनेगा विशेष भोजन केंद्र
जमुई: बिहार के जमुई जिले में गिद्धों के संरक्षण के लिए विशेष भोजन केंद्र स्थापित करने की तैयारी है। झाझा प्रखंड में नागी और नकटी जलाशयों के बीच स्थित कठबजरा जंगल में बनने वाले इस केंद्र को ‘गिद्ध रेस्टोरेंट’ कहा जाएगा। यहां गिद्धों को ऐसा भोजन उपलब्ध कराने की योजना है, जिसमें उनके लिए हानिकारक पशु चिकित्सा दवाओं के अवशेष न हों। परियोजना से जुड़ी रिपोर्ट में इसे देश का नौवां गिद्ध रेस्टोरेंट बताया गया है। हालांकि, इस क्रम की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
प्रभारी जिला वन पदाधिकारी मनीष कुमार वर्मा के अनुसार, पिछले वर्ष मौसम बदलने के दौरान नागी-नकटी के आसपास हिमालयन ग्रिफॉन गिद्धों का बड़ा झुंड देखा गया था। इसके बाद सुरक्षित भोजन केंद्र की पहल की गई। योजना में स्थानीय पशुपालकों से समन्वय कर मृत मवेशियों के शव जुटाना, पशु चिकित्सकों की निगरानी में तीन स्तर पर जांच कराना और उपयुक्त भोजन रखना शामिल है। पक्षियों की गतिविधियों की निगरानी के लिए टैग लगाने की भी तैयारी बताई गई है। केंद्र खुलने की निश्चित तारीख सामने नहीं आई है।
‘गिद्ध रेस्टोरेंट’ मनुष्यों के भोजनालय की तरह कोई व्यावसायिक प्रतिष्ठान नहीं होता। यह संरक्षण की एक व्यवस्था है, जिसमें खुले वातावरण में रहने वाले गिद्धों के लिए जांचा हुआ भोजन रखा जाता है। इसका प्रमुख उद्देश्य भोजन के जरिए उन तक पहुंचने वाले खतरनाक दवा अवशेषों का जोखिम घटाना है। एशियाई गिद्धों पर प्रकाशित शोध में ऐसे केंद्रों को पूरक सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराने के उपाय के रूप में अध्ययन किया गया है। भोजन केंद्र संरक्षण का एक हिस्सा हैं, पूरी समस्या का अकेला समाधान नहीं।
गिद्धों के लिए सबसे चर्चित खतरों में पशुओं के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दर्द निवारक दवा डाइक्लोफिनेक शामिल रही है। उपचार के बाद मरने वाले पशु के शरीर में इस दवा के अवशेष रह सकते हैं। ऐसा मांस खाने से संवेदनशील गिद्धों के गुर्दों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। संरक्षण अनुसंधान ने दक्षिण एशिया में कई गिद्ध प्रजातियों की संख्या में भारी गिरावट को इस विषाक्तता से जोड़ा है। इसलिए सुरक्षित भोजन का अर्थ केवल पर्याप्त मांस उपलब्ध कराना नहीं, उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी है।
डाइक्लोफिनेक के अलावा कुछ अन्य गैर-स्टेरॉयडल सूजनरोधी दवाएं भी गिद्धों के लिए हानिकारक पाई गई हैं। प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण से संबंधित अंतरराष्ट्रीय संस्था की जानकारी के अनुसार, अलग-अलग दवाओं की सुरक्षा का वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी है। किसी पशु दवा का अन्य जीवों के लिए उपयोगी होना अपने आप में गिद्धों के लिए सुरक्षित होने का प्रमाण नहीं है। यही कारण है कि भोजन केंद्रों में पशु चिकित्सा संबंधी जानकारी और विशेषज्ञ निगरानी महत्वपूर्ण होती है। केवल देखने से मांस में दवा अवशेषों का पता नहीं लगाया जा सकता।
गिद्ध मृत पशुओं का मांस खाकर प्राकृतिक सफाई की प्रक्रिया में योगदान देते हैं। उनकी कमी का असर मृत पशुओं के निस्तारण की व्यवस्था पर भी पड़ता है। संरक्षण संगठनों के अनुसार, गिद्ध घटने के बाद कई क्षेत्रों में लोगों को पशु शवों के निस्तारण के दूसरे तरीके अपनाने पड़े हैं। इस दृष्टि से इन पक्षियों का संरक्षण जैव विविधता के साथ स्थानीय पर्यावरण प्रबंधन से भी जुड़ा है। उनकी भूमिका को समझना ग्रामीण समुदायों और संरक्षण कार्यक्रमों के बीच सहयोग का आधार बन सकता है।
सुरक्षित भोजन केंद्र के आसपास का व्यापक क्षेत्र भी महत्वपूर्ण है। गिद्ध भोजन की तलाश में लंबी दूरी तय करते हैं, इसलिए किसी एक स्थान पर सुरक्षित आहार उपलब्ध होने के बावजूद वे दूसरी जगह असुरक्षित मांस खा सकते हैं। संरक्षण कार्यक्रमों में इसी वजह से ‘गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र’ की अवधारणा अपनाई गई है। इसमें भोजन के साथ आसपास पशु चिकित्सा दवाओं के इस्तेमाल और अन्य खतरों पर भी ध्यान दिया जाता है। भोजन केंद्र और क्षेत्रीय स्तर की जागरूकता एक-दूसरे के पूरक उपाय हैं।
नागी और नकटी का क्षेत्र पहले से पक्षी संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। दोनों पक्षी अभयारण्यों को अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों की रामसर सूची में शामिल किए जाने की घोषणा जून 2024 में हुई थी। ये जलाशय सिंचाई के लिए विकसित किए गए थे और समय के साथ पक्षियों के महत्वपूर्ण आवास बने। इस पृष्ठभूमि में गिद्धों के लिए प्रस्तावित पहल क्षेत्र में अलग-अलग प्रकार के पक्षियों की जरूरतों पर ध्यान देने का अवसर देती है। जलपक्षियों का आवास और गिद्धों का भोजन प्रबंधन अलग संरक्षण आवश्यकताएं हैं।
ऐसे केंद्र की सफलता केवल उद्घाटन या भोजन रखने से नहीं आंकी जा सकेगी। नियमित रूप से आने वाले गिद्धों की संख्या, भोजन की सुरक्षा और पक्षियों की गतिविधियों का रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होगा। टैगिंग जैसी निगरानी विधियों से उनकी आवाजाही समझने में मदद मिल सकती है। साथ ही स्थानीय पशुपालकों को हानिकारक दवाओं और सुरक्षित पशु चिकित्सा विकल्पों के बारे में जानकारी देना आवश्यक है। जमुई की प्रस्तावित पहल से उम्मीद है कि सुरक्षित आहार, वैज्ञानिक निगरानी और समुदाय के सहयोग को एक साथ आगे बढ़ाया जा सकेगा।