पटना। बिहार के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में पहली बार किसी बाघ को दूसरे राज्य में स्थानांतरित किया गया है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व यानी VTR की एक बाघिन को पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व भेजा गया है। वन विभाग की विशेष टीम ने 29 सितंबर को बाघिन को सफलतापूर्वक ट्रैंकुलाइज किया, उसके स्वास्थ्य की जांच की और रेडियो कॉलर लगाने के बाद सुरक्षित परिवहन की प्रक्रिया शुरू की।

वाल्मीकि टाइगर रिजर्व बिहार का एकमात्र टाइगर रिजर्व है और पश्चिम चंपारण जिले में स्थित है। यह हिमालयी तराई वन क्षेत्र का हिस्सा है और बाघ संरक्षण के लिहाज से राज्य का सबसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्र माना जाता है।

बाघिन को पकड़ने की प्रक्रिया आसान नहीं थी। वन विभाग की टीम कई दिनों से उसकी निगरानी कर रही थी। विशेष टीम ने लगातार प्रयासों के बाद उसे ट्रैंकुलाइज करने में सफलता हासिल की। उसे सुरक्षित करने के बाद पशु चिकित्सकों ने स्वास्थ्य परीक्षण किया और यात्रा के दौरान उसकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए रेडियो कॉलर लगाया गया।

इसके बाद बाघिन को विशेष पिंजरे में रखकर सड़क मार्ग से गोरखपुर हवाई अड्डे की ओर ले जाया गया। आगे उसे विशेष विमान के जरिए पश्चिम बंगाल पहुंचाने की व्यवस्था की गई। बाद में उसे अलीपुरद्वार जिले स्थित बक्सा टाइगर रिजर्व में ले जाया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार विमान ने हासीमारा एयरफोर्स स्टेशन पर लैंड किया और वहां से बाघिन को राजाभातखावा वन क्षेत्र में तैयार किए गए सॉफ्ट एनक्लोजर में रखा गया।

यह पूरी प्रक्रिया केवल एक वन्यजीव को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य बक्सा टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या बढ़ाना और वहां फिर से स्थायी बाघ आबादी विकसित करना है।

बक्सा टाइगर रिजर्व में लंबे समय से बाघों की स्थायी मौजूदगी बड़ी चुनौती रही है। इसी वजह से वहां चरणबद्ध तरीके से बाघों को पुनर्स्थापित करने की योजना बनाई गई है। VTR से भेजी गई यह बाघिन उसी संरक्षण कार्यक्रम का हिस्सा है।

स्थानांतरण के लिए किसी भी बाघ को चुनने से पहले कई स्तरों पर अध्ययन किया जाता है। इसमें उसकी उम्र, स्वास्थ्य, शारीरिक क्षमता, स्वभाव और नए जंगल में जीवित रहने की संभावना का आकलन शामिल होता है।

इस बाघिन को भी विशेषज्ञों द्वारा संभावित स्थानांतरण के लिए चुनी गई कुछ बाघिनों में शामिल किया गया था। अंतिम चयन के बाद ट्रैंकुलाइजेशन और ट्रांसलोकेशन प्रक्रिया शुरू की गई।

रेडियो कॉलर की मदद से वन विभाग नई जगह पर बाघिन की गतिविधियों पर नजर रख सकेगा। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि वह किस दिशा में जा रही है, किस क्षेत्र को अपना इलाका बना रही है और नए वातावरण के साथ किस तरह तालमेल बैठा रही है।

बाघों के स्थानांतरण में शुरुआती कुछ दिन सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। नई जगह पर पहुंचने के बाद उन्हें सीधे खुले जंगल में छोड़ने के बजाय पहले नियंत्रित क्षेत्र में रखा जाता है।

इसी प्रक्रिया के तहत बक्सा में बाघिन को करीब एक एकड़ के सॉफ्ट एनक्लोजर में रखा गया है। यहां उसकी स्वास्थ्य स्थिति, भोजन और व्यवहार की निगरानी की जाएगी। विशेषज्ञों से अनुमति मिलने के बाद ही उसे रिजर्व के खुले वन क्षेत्र में छोड़ा जाएगा।

इस दौरान बक्सा टाइगर रिजर्व के कुछ हिस्सों में पर्यटन गतिविधियों पर भी अस्थायी प्रतिबंध लगाया गया है। 30 सितंबर से 3 अक्टूबर तक कुछ क्षेत्रों में पर्यटकों के प्रवेश को सीमित किया गया, ताकि बाघिन को नए वातावरण में ढलने के दौरान किसी तरह की परेशानी न हो।

वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए यह अभियान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बिहार और पश्चिम बंगाल के बीच अंतरराज्यीय वन्यजीव संरक्षण सहयोग का उदाहरण है।

बिहार के लिए इस अभियान की खास बात यह है कि राज्य से पहली बार किसी बाघ को दूसरे राज्य के टाइगर रिजर्व में संरक्षण उद्देश्य से भेजा गया है। इससे VTR की सफल बाघ संरक्षण व्यवस्था भी सामने आती है।

वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में पिछले वर्षों के दौरान बाघों की संख्या और उनके आवास संरक्षण पर लगातार काम किया गया है। यहां जंगल, घास के मैदान और शिकार प्रजातियों की उपलब्धता बाघों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है।

दूसरी ओर बक्सा टाइगर रिजर्व में बाघों की स्थायी आबादी को फिर विकसित करने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में VTR की बाघिन को वहां भेजना संरक्षण रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।

बाघों को एक रिजर्व से दूसरे रिजर्व में स्थानांतरित करने का उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं होता। इससे आनुवंशिक विविधता बढ़ाने, प्रजनन की संभावनाएं मजबूत करने और किसी जंगल में स्थायी बाघ आबादी विकसित करने में भी मदद मिल सकती है।

हालांकि ट्रांसलोकेशन के बाद सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बाघिन नए पर्यावरण के साथ कितनी जल्दी तालमेल बैठाती है। उसके लिए पर्याप्त शिकार, सुरक्षित जंगल और मानवीय दबाव से मुक्त क्षेत्र उपलब्ध होना जरूरी होगा।

वन विभाग की टीम आने वाले दिनों में रेडियो कॉलर से मिलने वाले डेटा की लगातार निगरानी करेगी। बाघिन के भोजन, गतिविधि और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान रखा जाएगा।

यदि बाघिन नए क्षेत्र में सफलतापूर्वक स्थापित हो जाती है तो भविष्य में अन्य बाघों के स्थानांतरण का रास्ता भी खुल सकता है।

फिलहाल वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से बक्सा टाइगर रिजर्व तक इस बाघिन की यात्रा को बिहार के वन्यजीव संरक्षण के लिए ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। पहली बार राज्य से किसी बाघ को दूसरे राज्य में संरक्षण और पुनर्वास के उद्देश्य से भेजकर वन विभाग ने अंतरराज्यीय बाघ संरक्षण की नई शुरुआत की है।

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