बेटे को खोकर भी माता-पिता ने दिखाई इंसानियत, तीन मरीजों को मिला नया जीवन
पटना के मोनू का महादान
पटना: बिहार की राजधानी पटना से इंसानियत और अंगदान की एक भावुक कर देने वाली कहानी सामने आई है। महज 16 साल के मोनू कुमार की सड़क दुर्घटना के बाद मौत हो गई, लेकिन उनके परिवार के एक साहसिक फैसले ने तीन जरूरतमंद मरीजों को नई जिंदगी दे दी। मोनू के परिजनों ने उनका लिवर और दोनों किडनी दान करने का निर्णय लिया। इस अंगदान के जरिए तीन मरीजों का सफल प्रत्यारोपण किया गया। इस घटना की खास बात यह भी है कि बिहार में पहली बार राज्य सरकार की आर्थिक सहायता से लिवर प्रत्यारोपण कराया गया है। सरकार ने इसके लिए 15 लाख रुपये की मदद उपलब्ध कराई। इस उपलब्धि को राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं और अंगदान अभियान के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, मोनू कुमार 19 अक्टूबर 2026 को सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। हादसे में उनके सिर पर गंभीर चोट आई थी। उन्हें इलाज के लिए पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में भर्ती कराया गया।
चिकित्सकों ने उपचार के दौरान निर्धारित परीक्षण और प्रक्रिया पूरी करने के बाद मोनू को ब्रेन डेड घोषित कर दिया। परिवार के लिए यह बेहद कठिन समय था। बेटे को खोने के दुख के बीच परिजनों ने एक ऐसा निर्णय लिया, जिसने दूसरे परिवारों के जीवन में उम्मीद की नई किरण जगा दी।
मोनू के परिवार ने उनके अंगदान की सहमति दी। इसके बाद चिकित्सकों की टीम ने आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी कर लिवर और दोनों किडनी के प्रत्यारोपण की व्यवस्था की।
मोनू का लिवर पटना के अनीसाबाद की रहने वाली 19 वर्षीय युवती को प्रत्यारोपित किया गया। यह ऑपरेशन आईजीआईएमएस में पांच नवंबर को किया गया। वहीं, एक किडनी का प्रत्यारोपण आईजीआईएमएस में दूसरे मरीज को किया गया।
मोनू की दूसरी किडनी पटना के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में एक अन्य जरूरतमंद मरीज को प्रत्यारोपित की गई। इस प्रकार एक किशोर के अंगदान से तीन मरीजों को जीवन की नई उम्मीद मिली।
जानकारी के अनुसार, आईजीआईएमएस से एम्स पटना तक किडनी पहुंचाने के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया था। इसके जरिए अंग को लगभग 16 मिनट में अस्पताल पहुंचाया गया। अंग प्रत्यारोपण जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में समय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
लिवर प्रत्यारोपण की प्रक्रिया आईजीआईएमएस के गैस्ट्रो सर्जरी एवं लिवर ट्रांसप्लांट विभाग के प्रमुख डॉ. मनीष मंडल के नेतृत्व में संपन्न हुई। अस्पताल के निदेशक डॉ. बिंदे कुमार और विभिन्न विभागों की चिकित्सा टीमों ने भी आवश्यक व्यवस्थाओं में भूमिका निभाई।
इस मामले में बिहार सरकार ने भी महत्वपूर्ण पहल की। स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार को मामले की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने अस्पताल प्रशासन को अंगदान और प्रत्यारोपण के लिए आवश्यक वित्तीय तथा अन्य व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
सरकार की पूर्व घोषित सहायता व्यवस्था के तहत लिवर प्रत्यारोपण के लिए प्रति पात्र मरीज 15 लाख रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है। आईजीआईएमएस प्रशासन के अनुसार, यह राज्य सरकार की वित्तीय सहायता से संपन्न बिहार का पहला लिवर प्रत्यारोपण है। इससे उन मरीजों के लिए नई उम्मीद पैदा हुई है, जो महंगे उपचार के कारण प्रत्यारोपण नहीं करा पाते। स्वास्थ्य मंत्री ने मोनू के परिजनों के निर्णय की सराहना करते हुए इसे मानवता की सेवा का प्रेरणादायक उदाहरण बताया। उन्होंने इस उपलब्धि में योगदान देने वाले चिकित्सकों और अस्पताल कर्मियों की भी प्रशंसा की।
अंगदान के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाएं लंबे समय से लोगों को जागरूक करने का प्रयास कर रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रेन स्टेम डेथ के बाद निर्धारित कानूनी और चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत अंगदान से कई गंभीर मरीजों की जान बचाने में मदद मिल सकती है। मोनू कुमार की कहानी बताती है कि अंगदान का एक फैसला कितने परिवारों के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है। एक परिवार ने अपना बेटा खो दिया, लेकिन उसी परिवार की सहमति से तीन दूसरे परिवारों को अपने प्रियजनों के बेहतर भविष्य की उम्मीद मिली। मोनू भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके अंगदान से लाभान्वित मरीजों के जीवन में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।