गुवाहाटी। असम की बोकाखाट विधानसभा सीट से चुनाव लड़ चुके युवा आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले भले ही चुनाव के दौरान सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए बड़ा राजनीतिक खतरा नहीं माने गए हों, लेकिन चुनाव के कुछ महीनों बाद उनका नेतृत्व असम सरकार के लिए चिंता का विषय बन गया। डोले ने पूर्वी असम के इंगले पाथर और आसपास के इलाकों में आदिवासी ग्रामीणों को संगठित कर एक प्रस्तावित लक्ज़री होटल परियोजना का विरोध शुरू किया है।
यह परियोजना उस क्षेत्र में प्रस्तावित है, जो काजीरंगा नेशनल पार्क एंड टाइगर रिजर्व (KNPTR) के नजदीक स्थित है। काजीरंगा अपनी जैव विविधता और एक सींग वाले गैंडों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है और इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है। ऐसे में इलाके में बड़े पर्यटन प्रोजेक्ट को लेकर स्थानीय लोगों की चिंताओं ने जमीन, मुआवजे और पर्यावरण से जुड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
डोले ने बोकाखाट सीट से चुनाव लड़ा था, जहां उनका मुकाबला असम गण परिषद (AGP) के अध्यक्ष और राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री अतुल बोरा से था। AGP लंबे समय से BJP के नेतृत्व वाले गठबंधन की सहयोगी रही है। चुनावी राजनीति में डोले को बड़ा प्रतिद्वंद्वी नहीं माना गया, लेकिन अब स्थानीय आदिवासी समुदायों के बीच उनके सक्रिय होने से मामला राजनीतिक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है।
विवाद का केंद्र इंगले पाथर क्षेत्र में प्रस्तावित एक लक्ज़री होटल परियोजना है। जानकारी के मुताबिक, असम टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने इस इलाके में एक लक्ज़री होटल के निर्माण के लिए जमीन जुनिपर होटल्स को उपलब्ध कराई है। जुनिपर होटल्स एक निजी हॉस्पिटैलिटी कंपनी है, जिसे सराफ ग्रुप और अमेरिका की हयात का समर्थन प्राप्त है।
प्रस्तावित होटल के अलावा सरकार ने इसी क्षेत्र में ‘टी ट्राइब्स म्यूज़ियम’ विकसित करने के लिए भी जमीन आवंटित की है। यह संग्रहालय चाय बागानों में काम करने वाले समुदायों के इतिहास और संस्कृति को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से प्रस्तावित बताया जा रहा है।
हालांकि, स्थानीय आदिवासी ग्रामीणों का दावा है कि जिस जमीन पर परियोजनाएं प्रस्तावित की गई हैं, उस पर उनका अधिकार है। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें जमीन के बदले उचित मुआवजा नहीं दिया गया। इसी मुद्दे को लेकर डोले और उनके कुछ सहयोगियों ने ग्रामीणों को संगठित किया।
28 जून को ग्रामीणों ने कथित तौर पर निर्माण कार्य रोक दिया। डोले के नेतृत्व में ग्रामीणों ने परियोजना स्थल पर पहुंचकर अपना विरोध दर्ज कराया। उनका कहना था कि जब तक जमीन से जुड़े अधिकार और मुआवजे के मुद्दे का समाधान नहीं होता, तब तक निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ना चाहिए।
स्थानीय लोगों का विरोध केवल होटल परियोजना तक सीमित नहीं है। ग्रामीण जमीन के स्वामित्व, विस्थापन और अपने पारंपरिक अधिकारों को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि विकास परियोजनाओं के नाम पर आदिवासी समुदायों की जमीन का इस्तेमाल करने से पहले उनके अधिकारों और हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
दूसरी ओर, क्षेत्र में प्रस्तावित पर्यटन परियोजनाओं को असम के पर्यटन विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। काजीरंगा हर साल बड़ी संख्या में देशी और विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करता है। इसके आसपास बेहतर होटल और पर्यटन सुविधाएं विकसित होने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलने तथा रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद रहती है।
लेकिन काजीरंगा के बेहद संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के कारण ऐसे प्रोजेक्ट पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। क्षेत्र में निर्माण गतिविधियों का वन्यजीवों और प्राकृतिक आवास पर क्या असर पड़ेगा, यह सवाल भी उठता रहा है। खासकर गैंडे और अन्य वन्यजीवों के लिए प्रसिद्ध इस क्षेत्र में विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण है।
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान असम की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक सींग वाले गैंडों की बड़ी आबादी के अलावा यहां कई अन्य वन्यजीव प्रजातियां भी पाई जाती हैं। इसलिए पार्क के आसपास पर्यटन बुनियादी ढांचे के विस्तार के दौरान पर्यावरणीय मानकों का पालन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
प्रणब डोले की सक्रियता ने इस पूरे विवाद को एक राजनीतिक आयाम भी दे दिया है। चुनाव में सीमित प्रभाव रखने वाले एक उम्मीदवार का कुछ ही महीनों बाद स्थानीय आदिवासी मुद्दे पर बड़ी संख्या में ग्रामीणों को संगठित करना सत्तारूढ़ व्यवस्था के लिए नई चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
डोले और ग्रामीणों का मुख्य जोर जमीन के अधिकार और उचित मुआवजे पर है। उनका दावा है कि प्रभावित समुदायों की सहमति और हितों को ध्यान में रखे बिना परियोजनाओं को आगे बढ़ाना उचित नहीं है। वे चाहते हैं कि जमीन से जुड़े दस्तावेजों और अधिकारों की निष्पक्ष जांच हो तथा प्रभावित लोगों को उनका उचित हक मिले।
अब इस मामले में सरकार और स्थानीय समुदाय के बीच संवाद महत्वपूर्ण हो गया है। यदि जमीन के स्वामित्व और मुआवजे से जुड़े विवाद का समाधान बातचीत के जरिए निकाला जाता है, तो परियोजना को लेकर तनाव कम किया जा सकता है। साथ ही पर्यावरणीय प्रभावों का भी गंभीरता से आकलन करना जरूरी होगा।
फिलहाल इंगले पाथर का विवाद असम में विकास, पर्यटन, आदिवासी अधिकार और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती को सामने ला रहा है। काजीरंगा के नजदीक प्रस्तावित परियोजनाओं पर स्थानीय विरोध ने सरकार के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि पर्यटन को बढ़ावा देते समय स्थानीय समुदायों के अधिकारों और क्षेत्र की संवेदनशील पारिस्थितिकी की रक्षा किस तरह सुनिश्चित की जाए।
आने वाले दिनों में सरकार, परियोजना से जुड़े पक्षों और ग्रामीणों के बीच बातचीत तथा जमीन के दावों की जांच इस विवाद की दिशा तय कर सकती है। वहीं, प्रणब डोले की अगुवाई में जारी ग्रामीणों की लामबंदी यह संकेत दे रही है कि यह मुद्दा केवल एक निर्माण परियोजना तक सीमित न रहकर आदिवासी अधिकारों और क्षेत्र के भविष्य से जुड़ा व्यापक आंदोलन बन सकता है।