Itanagar ईटानगर: राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित जियोथर्मल एनर्जी कार्यशाला में अरुणाचल प्रदेश की ऊर्जा क्षमता को लेकर महत्वपूर्ण चर्चा हुई। इस अवसर पर सेंटर फॉर अर्थ साइंसेज एंड हिमालयन स्टडीज (CESHS) के निदेशक ने राज्य का प्रतिनिधित्व किया और पूर्वोत्तर क्षेत्र में मौजूद प्राकृतिक ऊर्जा संसाधनों की संभावनाओं पर प्रकाश डाला।
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने जियोथर्मल ऊर्जा के उपयोग, इसकी तकनीकी संभावनाओं और सतत विकास में इसकी भूमिका पर विस्तृत चर्चा की। इस दौरान इस बात पर जोर दिया गया कि नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग बढ़ाकर पारंपरिक ऊर्जा पर निर्भरता को कम किया जा सकता है।
अरुणाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी और भौगोलिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में जियोथर्मल ऊर्जा को एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यहां प्राकृतिक रूप से उपलब्ध गर्म जल स्रोतों और भू-तापीय गतिविधियों का उपयोग ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है।
कार्यशाला में इस बात पर भी चर्चा हुई कि यदि जियोथर्मल ऊर्जा का सही तरीके से दोहन किया जाए तो यह न केवल स्थानीय ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकती है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में विकास को भी गति दे सकती है। इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
प्रतिनिधियों ने बताया कि पूर्वोत्तर भारत में ऊर्जा संसाधनों की अपार संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन अभी तक उनका पूरी तरह से उपयोग नहीं किया गया है। ऐसे में इस तरह की राष्ट्रीय कार्यशालाएं नीति निर्माण और तकनीकी सहयोग के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
सतत विकास के दृष्टिकोण से विशेषज्ञों ने कहा कि जियोथर्मल ऊर्जा पर्यावरण के अनुकूल है और इससे कार्बन उत्सर्जन को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह ऊर्जा स्रोत लंबे समय तक स्थिर और विश्वसनीय आपूर्ति प्रदान कर सकता है।
कार्यशाला में विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों, ऊर्जा विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं ने भाग लिया। सभी ने इस बात पर सहमति जताई कि नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां पारंपरिक ऊर्जा पहुंच सीमित है।
अरुणाचल प्रदेश के प्रतिनिधि ने अपने संबोधन में राज्य की भौगोलिक विशेषताओं और ऊर्जा संभावनाओं को विस्तार से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि राज्य में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां जियोथर्मल ऊर्जा परियोजनाएं शुरू की जा सकती हैं।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सहयोग बढ़ाकर इस क्षेत्र में अनुसंधान और निवेश को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि क्षेत्रीय विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में जियोथर्मल ऊर्जा भारत के ऊर्जा मिश्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, खासकर पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों में।