ईटानगर: अरुणाचल प्रदेश में स्थानीय भाषा, लिपि और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने की दिशा में एक नई पहल सामने आई है। ARGSU स्कूलों के साइनबोर्ड पर भोटी लिपि जोड़ने का अभियान चला रहा है। इस पहल के तहत स्कूलों के नाम वाले साइनबोर्ड पर मौजूदा भाषाओं के साथ भोटी लिपि को भी जगह दी जा रही है। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को पारंपरिक लिपि से परिचित कराना और उसके उपयोग को बढ़ावा देना है।
आधुनिक शिक्षा और डिजिटल संचार के दौर में कई स्थानीय भाषाओं और लिपियों के इस्तेमाल में कमी को लेकर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है। ऐसे में सार्वजनिक और शैक्षणिक स्थानों पर पारंपरिक लिपि को दिखाई देने योग्य बनाना सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
स्कूलों से शुरू हुआ अभियान
स्कूल किसी भी भाषा या लिपि को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम होते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए ARGSU ने शैक्षणिक संस्थानों के साइनबोर्ड पर भोटी लिपि को शामिल करने की पहल की है।
साइनबोर्ड पर भोटी लिपि देखने से विद्यार्थियों में इसके अक्षरों और लिखावट के प्रति उत्सुकता बढ़ सकती है। इसके जरिए बच्चों को यह संदेश भी मिलेगा कि उनकी स्थानीय भाषाई और सांस्कृतिक विरासत शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने की कोशिश
किसी भी पारंपरिक भाषा या लिपि का अस्तित्व तभी लंबे समय तक बना रह सकता है, जब नई पीढ़ी उसका इस्तेमाल और महत्व समझे। केवल पुस्तकों या पुराने दस्तावेजों तक सीमित रहने वाली लिपियों का दैनिक जीवन में उपयोग धीरे-धीरे कम हो सकता है।
स्कूलों के बोर्ड, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सार्वजनिक स्थानों पर स्थानीय लिपि का प्रयोग बढ़ने से उसकी दृश्य पहचान मजबूत होती है। यह बच्चों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी बन सकता है।
भोटी लिपि का सांस्कृतिक महत्व
भोटी लिपि का उपयोग हिमालयी क्षेत्रों की बौद्ध सांस्कृतिक और साहित्यिक परंपराओं से जुड़ी विभिन्न भाषाओं के लेखन में किया जाता रहा है। धार्मिक ग्रंथों, पारंपरिक साहित्य और ऐतिहासिक दस्तावेजों में इसका विशेष महत्व है।
अरुणाचल प्रदेश के कुछ समुदायों के सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में भी इस लिपि से जुड़ी परंपराएं देखने को मिलती हैं। ऐसे में इसका संरक्षण केवल भाषा का मामला नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने से भी जुड़ा है।
दूसरे सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच सकती है पहल
स्कूलों में शुरू हुई इस पहल के बाद भविष्य में अन्य सार्वजनिक संस्थानों और स्थानों पर भी स्थानीय लिपियों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की मांग उठ सकती है। सरकारी कार्यालयों, सामुदायिक भवनों और सांस्कृतिक केंद्रों के साइनबोर्ड पर स्थानीय भाषा और लिपि को स्थान मिलने से उनकी पहचान और मजबूत हो सकती है।
हालांकि किसी भी आधिकारिक साइनबोर्ड में बदलाव संबंधित सरकारी नियमों और संस्थागत अनुमति के अनुसार किया जाना आवश्यक होगा।
भाषा संरक्षण को मिल सकती है मजबूती
ARGSU की यह पहल स्थानीय भाषाई पहचान को रोजमर्रा के सार्वजनिक जीवन में जगह देने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। यदि इसके साथ बच्चों को भोटी लिपि पढ़ने और लिखने के अवसर भी उपलब्ध कराए जाएं तो इसका प्रभाव और व्यापक हो सकता है।
स्कूलों के साइनबोर्ड पर भोटी लिपि जोड़ने का अभियान नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने और पारंपरिक लिपि के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास बन सकता है।
Tags: