अरुणाचल:  नई दिल्ली में जल संसाधन संबंधी संसदीय स्थायी समिति की पहली बैठक हुई, जिसमें राज्यसभा सांसद ताई तागाक ने हिस्सा लिया। इस बैठक में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के खतरे, जलवायु परिवर्तन, बाढ़ प्रबंधन और टिकाऊ जल संरक्षण जैसे अहम मुद्दों पर प्रमुखता से चर्चा की गई।
संसद भवन के 'समन्वय' (Samanvay) में आयोजित इस बैठक की अध्यक्षता समिति के अध्यक्ष राजीव प्रताप रूडी ने की। इसमें समिति के सदस्यों के अलावा जल शक्ति मंत्रालय, जल संसाधन विभाग और अन्य संबंधित विभागों, संगठनों तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
बैठक के दौरान, समिति ने विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्र में GLOF से जुड़े बढ़ते खतरों का जायजा लिया। इस चर्चा में ग्लेशियरों के पिघलने, ग्लेशियल झीलों के बनने और उनके विस्तार, तथा ब्लैक कार्बन के जमा होने से जुड़ी चिंताओं पर गौर किया गया।
चर्चा में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि ऐसी आपदाओं का निचले इलाकों में रहने वाले समुदायों, बुनियादी ढांचे, जल सुरक्षा और आपदा प्रबंधन पर क्या गंभीर असर पड़ सकता है। सदस्यों ने GLOF से जुड़े खतरों को कम करने के लिए मजबूत निगरानी तंत्र, वैज्ञानिक आकलन, पूर्व-चेतावनी प्रणालियों और बेहतर तैयारियों की आवश्यकता पर जोर दिया।
बैठक में हिस्सा लेते हुए, तागाक ने जल संसाधन प्रबंधन और संरक्षण को मजबूत करने के महत्व पर जोर दिया, खासकर पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील हिमालयी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों के संदर्भ में। उन्होंने तेजी से हो रहे शहरीकरण के बीच स्टॉर्मवॉटर (बरसाती पानी) प्रबंधन, प्राकृतिक झरनों के जल प्रबंधन और बांधों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे उठाए। साथ ही, उन्होंने जल से जुड़ी नई चुनौतियों से निपटने के लिए तकनीकी हस्तक्षेप की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला।
समिति ने बार-बार आने वाली बाढ़, मौसमी जल संकट, बादल फटने की घटनाओं और भूस्खलन (landslides) के साथ-साथ इनसे बचाव और राहत उपायों पर भी चर्चा की। इसके अलावा, नदी के किनारों की सुरक्षा, बाढ़ के मैदानों (floodplain) के प्रबंधन, और अनियंत्रित बसावट व अतिक्रमण से पैदा होने वाली चुनौतियों पर भी विचार-विमर्श किया गया।
बैठक में जल संरक्षण और टिकाऊ सिंचाई के मुद्दों को भी प्रमुखता दी गई। समिति ने 'पर ड्रॉप मोर क्रॉप' (हर बूंद से अधिक फसल) पहल की समीक्षा की। इसमें सूक्ष्म सिंचाई (micro-irrigation) - जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम - के विस्तार, सिंचाई की दक्षता में सुधार और पानी के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया गया।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के तहत चल रही परियोजनाओं की राज्य और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर समीक्षा की गई। इस दौरान आधुनिक सिंचाई तकनीकों, पाइप-आधारित सिंचाई प्रणालियों, कमांड एरिया डेवलपमेंट (सिंचित क्षेत्र विकास) और उन इलाकों में कुशल जल प्रबंधन पर चर्चा हुई, जहां साल में तीन फसलें उगाई जाती हैं। समिति ने पूर्वोत्तर क्षेत्र में जल-संसाधन से जुड़ी चुनौतियों की भी समीक्षा की, जिनमें मृदा अपरदन, भूजल पुनर्भरण, प्रदूषण नियंत्रण और जल निकायों का प्रबंधन शामिल हैं। भारतीय हिमालयी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में जल निकायों के पुनरुद्धार पर भी चर्चा हुई, जिसमें शहरीकरण, जलविद्युत गतिविधियों, निर्माण कार्यों और अन्य मानवीय हस्तक्षेपों के बढ़ते दबाव को लेकर चिंता जताई गई।
सदस्यों ने मौजूदा जल-भंडारण, सिंचाई और बाढ़-प्रबंधन बुनियादी ढांचे की प्रभावशीलता पर भी विचार-विमर्श किया। इसके साथ ही, जलवायु परिवर्तन के कारण जल-चक्र (हाइड्रोलॉजिकल पैटर्न) में आए बदलावों और वर्तमान जल-संसाधन नियोजन ढांचे की पर्याप्तता पर भी चर्चा की गई।
बैठक में जल-संसाधन प्रबंधन के लिए एक एकीकृत और विज्ञान-आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। इसमें पूरे देश में जल संरक्षण, जलवायु के प्रति लचीलापन (क्लाइमेट रेजिलिएंस), आपदा तैयारियों और जल संसाधनों के टिकाऊ उपयोग को प्राथमिकता देने की बात कही गई।
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